- मध्यप्रदेश के बुरहानपुर जिले की महिलाओं ने केले के तनों से रेशे निकालकर पर्यावरण-संरक्षित राखियां तैयार की.
- ये राखियां पूरी तरह प्राकृतिक हैं और प्लास्टिक तथा कृत्रिम सामग्री की राखियों की तुलना में अधिक टिकाऊ हैं.
- प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, कृषि मंत्री और सैनिकों को भेजने के लिए विशेष रूप से राखियों का निर्माण किया है.
रक्षाबंधन पर जहां बाजार रंग-बिरंगी राखियों से सजे हैं, वहीं मध्यप्रदेश के बुरहानपुर जिले की महिलाओं ने अपनी मेहनत और नवाचार से एक अलग पहचान बनाई है. शाहपुर की स्वयं सहायता समूह की महिलाएं केले के बेकार समझे जाने वाले तनों से रेशे निकालकर ईको-फ्रेंडली राखियां तैयार कर रही हैं. इन राखियों की खासियत यह है कि ये पूरी तरह प्राकृतिक और पर्यावरण के अनुकूल हैं. महिलाओं की ओर से तैयार की गई विशेष राखियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और देश की सुरक्षा में तैनात सैनिकों को भी भेजी जाएंगी. यह पहल महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण और आत्मनिर्भरता का सुंदर उदाहरण बनकर सामने आई है.
शारिक अख्तर दुररानी की रिपोर्ट...
केले के तनों से तैयार हो रही खूबसूरत राखियां
बुरहानपुर जिले के शाहपुर क्षेत्र में स्वयं सहायता समूह की महिलाएं घर बैठे केले के रेशों से आकर्षक राखियां बना रही हैं. आमतौर पर बेकार समझे जाने वाले केले के तनों से रेशा निकालकर उसे उपयोगी उत्पाद में बदल दिया है. महिलाओं की यह पहल न केवल नए रोजगार का माध्यम बनी है, बल्कि कृषि अपशिष्ट के बेहतर उपयोग का भी उदाहरण पेश कर रही है.
पर्यावरण संरक्षण का संदेश
केले के रेशों से बनाई जा रही ये राखियां पूरी तरह प्राकृतिक हैं और पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचातीं. प्लास्टिक और कृत्रिम सामग्री से बनने वाली राखियों की तुलना में ये राखियां अधिक टिकाऊ और प्रकृति के अनुकूल मानी जा रही हैं. महिलाओं का कहना है कि रक्षाबंधन जैसे त्योहार को पर्यावरण संरक्षण के संदेश के साथ जोड़ने का प्रयास किया है.
प्रधानमंत्री और सैनिकों को भेजेंगी विशेष राखियां
तेजश्री सामाजिक विकास समूह से जुड़ी महिलाओं ने इस बार खास राखियां तैयार की हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और देश की सीमाओं पर तैनात वीर जवानों को भेजा जाएगा. महिलाओं का मानना है कि यह केवल राखी नहीं, बल्कि सम्मान, कृतज्ञता और देशभक्ति का प्रतीक है.

स्व सहायता समुह की महिलाएं केले के रेशों से राखी बना रही हैं.
ऑनलाइन मिल रहे ऑर्डर, बढ़ रही पहचान
महिलाओं द्वारा बनाई गई इन ईको-फ्रेंडली राखियों को अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है. स्थानीय बाजार के साथ-साथ इन्हें ऑनलाइन भी बेचा जा रहा है. महाराष्ट्र, गुजरात समेत कई राज्यों से इन राखियों के ऑर्डर मिल रहे हैं. बढ़ती मांग ने महिलाओं के इस नवाचार को नई पहचान दिलाई है.
इस पहल से समूह की महिलाओं की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो रही है. महिलाओं के अनुसार केले के रेशों से राखियां बनाकर उन्हें प्रतिदिन 300 से 400 रुपये तक की आय हो रही है. इससे घर की आमदनी बढ़ने के साथ-साथ महिलाओं का आत्मविश्वास भी बढ़ा है.
'वोकल फॉर लोकल' को मिल रही ताकत
यह पहल 'एक जिला, एक उत्पाद' अभियान और प्रधानमंत्री के 'वोकल फॉर लोकल' के आह्वान को भी मजबूती दे रही है. स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर तैयार किए जा रहे उत्पाद आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं. ग्रामीण महिलाओं का यह प्रयास दिखाता है कि छोटे स्तर पर शुरू की गई पहल भी बड़ी सफलता का आधार बन सकती है.

केले के रेशों से बनने वाली राखी में उपयोग होने वाली सामग्री.
प्रेम, समर्पण और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक
विधायक अर्चना चिटनीस ने महिलाओं के इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों की दीदियों द्वारा बनाई गई ये राखियां केवल एक धागा नहीं हैं, बल्कि प्रेम, समर्पण और राष्ट्र सेवा की भावना का प्रतीक हैं. उन्होंने कहा कि महिलाओं का यह नवाचार पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणा का विषय है और इससे महिला सशक्तिकरण को नई दिशा मिलेगी.
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