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MP की सरकारी योजनाओं में 2100 करोड़ का NPA: कर्ज लेकर भूल गए लोग, पर लाड़ली बहनों ने पेश कर दी मिसाल

Ladli Behna Loan Success: मध्यप्रदेश की सरकारी योजनाओं में इस समय एक बड़ा असंतुलन देखने को मिल रहा है. ताजा रिपोर्ट के अनुसार, जहां ग्रामीण महिलाएं अपना कर्ज चुकाने में सबसे आगे हैं, वहीं कई बड़ी सरकारी योजनाएं बैंकों के लिए भारी घाटे का सौदा साबित हो रही हैं.

MP की सरकारी योजनाओं में 2100 करोड़ का NPA: कर्ज लेकर भूल गए लोग, पर लाड़ली बहनों ने पेश कर दी मिसाल

MP Govt Schemes: मध्यप्रदेश में इस समय सरकारी योजनाओं की तस्वीर दो हिस्सों में बंटी हुई दिख रही है. एक तरफ वे आंकड़े हैं जो सफलता की कहानी कहते हैं, तो दूसरी तरफ वही आंकड़े एक गहरे वित्तीय संकट की ओर इशारा कर रहे हैं. 25 मार्च को जारी हुई ताजा रिपोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि राज्य में कर्ज देने की रफ्तार तो तेज है, लेकिन उसे वापस लाने की ताकत कमजोर पड़ती जा रही है. हालांकि इन सबके बीच पॉजिटिव बात ये है कि प्रदेश की लाडली बहनें सबसे ज्यादा ईमानदार बन कर सामने आई हैं. उनका NPA सिर्फ 2.4% है. 

लाड़ली बहनों की ईमानदारी: सिस्टम के लिए बड़ा संदेश

इस पूरी कहानी में लाड़ली बहनें सबसे मजबूत कड़ी बनकर उभरती हैं. जहां बड़े-बड़े सरकारी कार्यक्रम डगमगा रहे हैं, वहीं ग्रामीण महिलाओं के स्वयं सहायता समूह (SHG) पूरी ईमानदारी से अपने कर्ज चुका रहे हैं. इन समूहों ने 3570 करोड़ रुपये का कर्ज लिया है, लेकिन उनका एनपीए (NPA) सिर्फ 2.4% है. यह आंकड़ा सिर्फ अच्छा नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम के लिए एक संदेश है कि जिम्मेदारी और अनुशासन आज भी जमीन पर जिंदा है.

मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास मिशन: सबसे बड़ा जोखिम

इसके उलट, ग्रामीण आवास की तस्वीर काफी चिंताजनक है. मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास मिशन, जिसे गरीबों को घर देने के लिए शुरू किया गया था, अब बैंकों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुका है. इस योजना के तहत दिए गए 1670 करोड़ रुपये में से 67.9% रकम एनपीए में बदल चुकी है. यानी हर 100 रुपये में से करीब 68 रुपये वापस नहीं आ रहे. पांच साल पहले यह आंकड़ा 46% था, जो अब बढ़कर लगभग 68% तक पहुंच गया है. 

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स्वरोजगार योजनाओं का हाल भी बेहाल

स्वरोजगार योजनाओं की स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं है. मुख्यमंत्री उद्यम क्रांति योजना और अन्य स्वरोजगार योजनाओं ने कागजों पर तो 127% लक्ष्य हासिल किया है, लेकिन वास्तविकता यह है कि 422 करोड़ रुपये यानी 42.9% कर्ज डूब चुका है. जब इन सभी योजनाओं को मिलाकर देखा जाए, तो करीब 2100 करोड़ रुपये का कर्ज एनपीए बन चुका है, जो धीरे-धीरे बैंकिंग सिस्टम पर भारी दबाव डाल रहा है.

बैंकों की मजबूरी तो अलग ही है

बैंकों की मुश्किलें इसलिए भी बढ़ जाती हैं क्योंकि वे चाहकर भी इस स्थिति से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं. सरकार के साथ हुए समझौतों के कारण बैंक इन खातों को बंद नहीं कर सकते और न ही 'वन-टाइम सेटलमेंट' का रास्ता अपना सकते हैं. इसका मतलब यह है कि कर्ज फंसा हुआ है और समाधान के रास्ते बेहद सीमित हैं.
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जरूरतमंदों तक पहुंच अब भी है बड़ी चुनौती

इस पूरे परिदृश्य में सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिन वर्गों के लिए विशेष योजनाएं बनाई गई थीं, वे अब भी इससे पूरी तरह जुड़ नहीं पाए हैं. विमुक्त, घुमंतू और अर्धघुमंतू जनजातियों के लिए बनी योजनाओं में केवल 11.8% लक्ष्य ही पूरा हो पाया है. तांत्या मामा योजना में 5000 के लक्ष्य के मुकाबले केवल 2743 आवेदन ही मंजूर हुए हैं. यह दिखाता है कि जहां जरूरत सबसे ज्यादा है, वहां पहुंच अब भी कमजोर है.

जन धन खातों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी

यही भरोसा और अनुशासन वित्तीय समावेशन की अन्य योजनाओं में भी दिखता है. प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत राज्य में खातों की संख्या 1.19 करोड़ से बढ़कर 4.66 करोड़ हो चुकी है. इन खातों में 18,318 करोड़ रुपये जमा हैं और औसत बैलेंस 445 रुपये से बढ़कर 3931 रुपये तक पहुंच गया है. खास बात यह है कि इनमें से 55% खाते महिलाओं के नाम पर हैं.

निजी बैंकों की दूरी और सरकारी बैंकों पर बोझ

पूरे सिस्टम का बोझ फिलहाल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर है, जो अपने लक्ष्य से कई गुना अधिक काम कर रहे हैं. इसके विपरीत निजी बैंक इस दिशा में बहुत ही सीमित भागीदारी दिखा रहे हैं. यही कारण है कि कर्ज डूबने का बड़ा जोखिम सरकारी बैंकों पर ही केंद्रित हो गया है. मध्यप्रदेश की यह कहानी अब केवल आंकड़ों की नहीं, बल्कि भरोसे और व्यवहार की कहानी बन चुकी है. इसमें सबसे मजबूत किरदार लाड़ली बहनें हैं, जो साबित कर रही हैं कि कर्ज लेना आसान है, लेकिन उसे ईमानदारी से चुकाना ही असली परीक्षा है.
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