धार से 19वीं सदी में अंग्रेजों द्वारा लंदन ले जाई गई 11वीं सदी की वाग्देवी (मां सरस्वती) की दुर्लभ प्रतिमा को वापस लाने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है. मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में आयोजित चार दिवसीय ब्रिक्स (BRICS) संस्कृति कार्यसमूह और संस्कृति मंत्रियों की बैठक के दौरान भारत औपनिवेशिक दौर में विदेशों में ले जाई गई सांस्कृतिक धरोहरों की वापसी का मुद्दा प्रमुखता से उठा रहा है. मई 2026 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा भोजशाला परिसर को सरस्वती मंदिर मानते हुए प्रतिमा की वापसी के निर्देश देने के बाद, केंद्र सरकार राजनयिक माध्यमों से ब्रिटिश म्यूजियम के साथ लगातार पत्राचार कर इसे स्वदेश लाने की कोशिश में जुटी है. हालांकि ये मामला उतना आसान नहीं है
कहानी बहुत पुरानी है, धार में कभी राजा भोज का नगर था. विद्या, शास्त्र और संस्कृति की चर्चा होती थी उसी स्मृति से जुड़ी वाग्देवी की एक प्राचीन प्रतिमा थी. फिर अंग्रेजों का दौर आया प्रतिमा धार से निकली, समुद्र पार गई और लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में पहुंच गई।
राज बदलते गए ... सरकारें बदलती गईं ...पर वाग्देवी वापस नहीं लौटीं
अब इस पुरानी कहानी का नया अध्याय भोपाल में लिखा जा रहा है, चार दिनों तक चलने वाली ब्रिक्स संस्कृति कार्यसमूह और संस्कृति मंत्रियों की बैठक में विदेशों में चोरी, तस्करी या औपनिवेशिक दौर में ले जाई गई मूर्तियों, शिल्प और पुरावशेषों की वापसी पर चर्चा हो रही है. इस अंतरराष्ट्रीय विमर्श के बीच मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा सवाल है क्या भोजशाला से जुड़ी वाग्देवी की प्रतिमा लंदन से वापस धार लाई जा सकेगी? केंद्रीय संस्कृति सचिव विवेक अग्रवाल के अनुसार इस दिशा में प्रयास अदालत के आदेश से काफी पहले शुरू हो चुके थे. उन्होंने कहा, “केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के सचिव का पदभार संभालने के तुरंत बाद मध्य प्रदेश सरकार ने हमें ब्रिटिश म्यूजियम में रखी वाग्देवी की प्रतिमा की वापसी के लिए लिखा था. तब से हम लगातार राजनयिक चैनलों और संग्रहालय स्तर पर इस मामले पर काम कर रहे हैं.”. अग्रवाल के मुताबिक ब्रिटेन में भारतीय राजनयिक माध्यमों से कई लिखित संवाद भी किए जा चुके हैं. उन्होंने कहा, “प्रतिमा को धार वापस लाने के लिए ब्रिटेन में विशेष रूप से राजनयिक चैनलों के जरिए कई पत्राचार किए गए हैं. इस मांग को मई 2026 में नया बल मिला, जब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भोजशाला-कमाल मौला परिसर को सरस्वती मंदिर माना और केंद्र सरकार से वाग्देवी की प्रतिमा की वापसी के प्रयास करने को कहा.
कहानी इतनी सीधी भी नहीं है
लेकिन कहानी सीधी नहीं है. भारत में इसे भोजशाला की वाग्देवी या सरस्वती की प्रतिमा माना जाता है. ब्रिटिश म्यूजियम इसे जैन परंपरा से जुड़ी अंबिका की प्रतिमा बताता है. संग्रहालय के रिकॉर्ड के अनुसार 11वीं शताब्दी की यह संगमरमर की प्रतिमा 1875 में धार के अवशेषों से मिली थी और बाद में ब्रिटेन ले जाई गई. 1909 में इसे औपचारिक रूप से ब्रिटिश म्यूजियम के संग्रह में शामिल किया गया. यहीं से विवाद जन्म लेता है. भारत इसे अपनी सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा मानता है. ब्रिटिश म्यूजियम इसे अपने संग्रह की ऐतिहासिक वस्तु के रूप में देखता है.
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लेकिन भारत अब खाली हाथ तर्क नहीं कर रहा.
विवेक अग्रवाल के अनुसार 2014 के बाद भारत दुनिया के विभिन्न देशों से करीब 650 चोरी या तस्करी की गई मूर्तियां, शिल्प और सांस्कृतिक धरोहरें वापस ला चुका है. इसके पहले यह संख्या केवल 13 थी. उन्होंने कहा, “चोरी या तस्करी कर विदेश ले जाई गई मूर्तियों, शिल्प और अन्य पुरावशेषों की वापसी ब्रिक्स संस्कृति कार्यसमूह और संस्कृति मंत्रियों की बैठक में चर्चा का एक महत्वपूर्ण विषय होगा.” हाल के वर्षों में अमेरिका से दुर्लभ हिंदू और बौद्ध मूर्तियां वापस लाई गई हैं. ऑस्ट्रेलिया ने भी तमिलनाडु के मंदिरों से चोरी हुई भद्रकाली त्रिशूल, नंदी और कार्तिकेय की प्राचीन प्रतिमाएं लौटाने पर सहमति दी है. बैठक में केवल मूर्तियों की वापसी पर बात नहीं होगी ब्रिक्स देशों के कलाकारों और सांस्कृतिक संस्थानों का साझा डेटाबेस बनाने, पांडुलिपियों और पुरातात्विक दस्तावेजों के संरक्षण तथा साझा विरासत को यूनेस्को में संयुक्त रूप से नामांकित करने जैसे मुद्दे भी एजेंडे में हैं. फिर भी भोपाल की बैठक पर धार की वह प्रतिमा छाई हुई है, जो एक सदी से अधिक समय से लंदन में है.
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