Patna Gardani Bagh Name History: बिहार की राजधानी पटना का गर्दनीबाग इन दिनों हर किसी की जुबान पर छाया हुआ है. हजारों की संख्या में छात्र अपने भविष्य को लेकर यहां डटे हुए हैं और सरकार से अपनी मांगें मनवाने पर अड़े हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि धरने और प्रदर्शनों के लिए मशहूर पटना की इस जगह का नाम आखिर गर्दनीबाग ही क्यों पड़ा. इस नाम का क्या मतलब है. इसके पीछे बगीचों की खूबसूरती से लेकर खूंखार डाकुओं तक की एक ऐसी कहानी है, जो आपको हैरान कर देगी. आइए जानते हैं गर्दनीबाग का पूरा इतिहास और इसके नाम की दिलचस्प कहानी.
गर्दनीबाग में क्यों डटे हैं छात्र
बुधवार को लगातार दूसरे दिन भी गर्दनीबाग में छात्रों का प्रदर्शन चल रहा है. दरअसल, छात्रों के अल्टीमेटम और शिक्षा मंत्री के आवास घेरने की चेतावनी के बाद भी BPSC ने 32,388 पदों के लिए (TRE-4) नोटिफिकेशन जारी कर दिया है, जिसके फॉर्म 1 सितंबर से भरे जाएंगे. छात्र सिंगल एग्जाम सिस्टम की मांग कर रहे हैं. साथ ही उनकी मांग है कि निगेटिव मार्किंग पूरी तरह हटाई जाए, BSSC की रुकी हुई परीक्षाओं की डेट तुरंत आए और संविदा वालों को मिलने वाले एक्स्ट्रा नंबर बंद हों. छात्र नेता दिलीप ने इस आंदोलन को और बड़ा करने की अपील की है. तेजस्वी यादव और दीपांकर भट्टाचार्य जैसे बड़े नेता भी छात्रों का सपोर्ट करने यहां पहुंच चुके हैं.
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गर्दनीबाग का नाम कैसे पड़ा, क्या है इतिहास
आज का यह वीआईपी इलाका कभी खौफ का दूसरा नाम हुआ करता था. पुराने समय में पटना के इस हिस्से में बड़े-बड़े और घने बगीचे हुआ करते थे. इसी वजह से इसके नाम में बाग जुड़ गया. कहा जाता है कि इस इलाके में पहले आदिवासियों का डेरा था. यहां 'गर्दनिया' नाम के डाकुओं का एक ग्रुप रहता था. ये डाकू यहां से गुजरने वाले मुसाफिरों को लूटते थे और बेरहमी से उन्हें मौत के घाट उतार देते थे. इन्हीं गर्दनिया डाकुओं के नाम और काफी बाग होने से इस इलाके का नाम गर्दनीबाग पड़ गया.
अंग्रेजों के जमाने से लेकर बापू टावर तक का सफर
वक्त के साथ गर्दनीबाग की सूरत पूरी तरह बदल गई और यह इलाका खौफ से निकलकर सत्ता का केंद्र बन गया. ब्रिटिश काल में अंग्रेजों ने अपने सरकारी कर्मचारियों और अफसरों के रहने के लिए यहां बेहद सिस्टेमेटिक बस्तियां बसाईं. आज भी गर्दनीबाग को उसके 'रोड नंबरों' से ही पहचाना जाता है. इसके पास ही में ऐतिहासिक सचिवालय और उसका मशहूर घंटाघर बना. यहां बनाई गईं बिल्डिंग्स इतनी मजबूत थीं कि 1934 के भयानक भूकंप के झटके भी इनका कुछ नहीं बिगाड़ सके. आज यहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की याद में एक शानदार और भव्य बापू टावर बनाया गया है, जो इस इलाके को एक नई पहचान दे रहा है.
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