- कर्नल सीमा सिंह ने भारतीय सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन और समान अवसर दिलाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी
- फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को स्थायी कमीशन और कमांडिंग अवसर देने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया
- सीमा सिंह ने सेना की ऑर्डिनेंस शाखा में कमांडिंग ऑफिसर के रूप में नेतृत्व की भूमिका सफलतापूर्वक निभाई
भारतीय सेना में महिलाओं के लिए स्थायी कमीशन और समान अवसरों की लड़ाई का एक महत्वपूर्ण अध्याय 1 अक्टूबर 2026 को समाप्त हो गया. कर्नल सीमा सिंह भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हो गईं. वे उन महिला अधिकारियों में शामिल रहीं, जिन्होंने न केवल खाकी वर्दी पहनकर नेतृत्व किया, बल्कि अदालत में अधिकारों की लड़ाई लड़कर भारतीय सेना में महिलाओं के लिए बदलाव के नए रास्ते भी खोले.
कर्नल सीमा सिंह का नाम उन महिला अधिकारियों में लिया जाता है, जिन्होंने शॉर्ट सर्विस कमीशन महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने की मांग को लेकर लंबा कानूनी संघर्ष किया. यह लड़ाई कई वर्षों तक चली और आखिरकार फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के साथ महिलाओं के पक्ष में महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंची.

भारतीय सेना के खिलाफ नहीं था संघर्ष
उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद की रहने वाली कर्नल सीमा सिंह ने एनडीटीवी से बातचीत में बताया कि उनका संघर्ष कभी भी भारतीय सेना या अपने साथी अधिकारियों के खिलाफ नहीं था. उनका उद्देश्य उन नीतियों और व्यवस्थाओं में बदलाव की मांग करना था, जिनकी वजह से महिला अधिकारियों को अपने पुरुष समकक्षों के मुकाबले भेदभाव और असमान अवसरों का सामना करना पड़ता था.

कर्नल सीमा सिंह हुईं रिटायर: कमांडिंग ऑफिसर भी रहीं, बदलाव की आवाज भी बनीं
जब अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा
बता दें कि भारतीय सेना में महिला अधिकारियों का कहना था कि उन्हें पुरुष अधिकारियों की तुलना में सीमित अवसर मिल रहे हैं और करियर में आगे बढ़ने के रास्ते बंद हो जाते हैं. इसी मुद्दे को लेकर सीमा सिंह समेत कई अधिकारियों ने कानूनी लड़ाई शुरू की. साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने 11 महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारियों को सेवा में बहाल करने का आदेश दिया था. इनमें उस समय की मेजर सीमा सिंह भी शामिल थीं. इसके बाद भी मामला आगे बढ़ता रहा और अंततः 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को स्थायी कमीशन तथा कमांड संबंधी अवसरों पर बड़ा फैसला सुनाया. फैसले के बाद सीमा सिंह ने इसे सेना में लैंगिक समानता की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया था. उनका कहना था कि महिलाओं की मांग किसी विशेष सुविधा की नहीं, बल्कि पुरुष अधिकारियों के समान अवसरों की थी.

सिर्फ अदालत नहीं, मैदान में भी साबित किया नेतृत्व
कर्नल सीमा सिंह की पहचान केवल कानूनी संघर्ष तक सीमित नहीं रही. उन्होंने सेना की ऑर्डिनेंस शाखा में कमांडिंग ऑफिसर के रूप में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं. अपने नेतृत्व में उन्होंने एक यूनिट का सफल संचालन किया और सैनिकों के बीच एक सक्षम कमांडर के रूप में पहचान बनाई. सेवानिवृत्ति के अवसर पर जारी विदाई संदेशों में बताया गया कि उनके कार्यकाल के दौरान यूनिट को दो प्रशस्ति-पत्र मिले. यह उपलब्धि उनके नेतृत्व और कार्यकुशलता की गवाही मानी जा रही है.

बदलाव की प्रतीक रही उनकी यात्रा
मेजर से कर्नल तक का सीमा सिंह का सफर भारतीय सेना में महिलाओं की बदलती भूमिका का भी प्रतीक है. जिस दौर में महिलाओं के लिए कई दरवाजे बंद थे, उसी दौर में उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर बदलाव की आवाज उठाई. वर्षों तक अदालतों में लड़ाई लड़ने के साथ-साथ उन्होंने अपनी सैन्य जिम्मेदारियां भी पूरी निष्ठा से निभाईं. यही वजह है कि उनका करियर केवल एक सैन्य अधिकारी की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय सेना में महिलाओं के सशक्तीकरण के इतिहास का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया.

एक ऐसी विरासत, जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा
सेवानिवृत्ति के बाद कर्नल सीमा सिंह भले ही सक्रिय सैन्य सेवा से रिटायर हो गई हों, लेकिन उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों की महिला अधिकारियों को प्रेरित करता रहेगा. उन्होंने यह साबित किया कि बदलाव की लड़ाई संस्थाओं के भीतर रहकर भी लड़ी जा सकती है और धैर्य, साहस व प्रतिबद्धता से बड़े परिवर्तन संभव हैं. वर्दी को अलविदा कहने के साथ कर्नल सीमा सिंह के जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ है, लेकिन भारतीय सेना में महिलाओं को बराबरी के अधिकार दिलाने की कहानी में उनका नाम हमेशा सम्मान के साथ याद किया जाएगा.
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