Supreme Court On Alternative Death Penalty Methods : भारत में मौत की सजा का नाम आते ही सबसे पहले फांसी का ख्याल आता है. लेकिन क्या हमेशा से भारत में मौत की सजा इसी तरह दी जाती थी? ऐसा नहीं है. देश के पुराने इतिहास में मृत्युदंड देने के कई तरीके मिलते हैं और हर दौर में इसके नियम एक जैसे नहीं थे. ब्रिटिश शासन के दौरान आपराधिक कानूनों को एक तय ढांचे में लाया गया और फांसी धीरे-धीरे मौत की सजा देने का कानूनी तरीका बन गई. आजादी के बाद भी यह व्यवस्था जारी रही. अब एक बार फिर इस पुराने तरीके पर सवाल उठा है. सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की जगह लेथल इंजेक्शन से मौत की सजा देने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है. हालांकि, अदालत ने भविष्य में नए वैज्ञानिक और मेडिकल सबूत आने पर इस तरीके की समीक्षा की गुंजाइश छोड़ी है.
अंग्रेजों से पहले कैसे दी जाती थी मौत की सजा?
अंग्रेजों से पहले भारत में मृत्युदंड देने का कोई एक तय तरीका नहीं था. अलग-अलग राजसत्ताओं में इसके अलग तरीके मिलते हैं. मुगल दौर में सिर कलम करने और हाथियों के पैरों तले कुचलकर मौत देने की सजा का उल्लेख मिलता है, जबकि तोप के मुंह से बांधकर उड़ाने की सजा भी मुगल शासन में इस्तेमाल होती थी. मराठा इतिहास में भी हाथी से कुचलकर मौत देने का उदाहरण मिलता है. बाद में अंग्रेजों ने भी तोप से उड़ाने की इसी प्रथा को अपनाया. यानी फांसी भारत में मृत्युदंड देने का अकेला पुराना तरीका नहीं थी.सजा का तरीका शासक, अपराध और उस समय के कानून या परंपरा पर निर्भर करता था.
फिर फांसी कैसे बनी मौत की सजा का तय तरीका?
इस कहानी में बड़ा बदलाव ब्रिटिश शासन के दौरान आया. ईस्ट इंडिया कंपनी के इलाकों में लंबे समय तक आपराधिक मामलों में स्थानीय और इस्लामी कानूनों के साथ ब्रिटिश नियमों का मिश्रण चलता रहा. बाद में अंग्रेजों ने आपराधिक कानून को ज्यादा व्यवस्थित और एक जैसा बनाने की कोशिश शुरू की. इसी दौर में फांसी को कानून में स्पष्ट जगह मिली.
ब्रिटिश दौर में फांसी को मौत की सजा देने का तय कानूनी तरीका बना दिया गया. 1861 में बने कानून में साफ कहा गया कि मौत की सजा पाने वाले व्यक्ति को फांसी देकर मौत की सजा दी जाएगी. बाद में 1898 के कानून में भी यही व्यवस्था जारी रही.
आजादी के बाद भी क्यों नहीं बदला तरीका?
भारत आजाद हुआ तो देश ने अपना संविधान और अपना कानूनी ढांचा बनाया, लेकिन पुराने कई कानूनों को तुरंत खत्म नहीं किया गया. संविधान के अनुच्छेद 372 के तहत आजादी से पहले के कानून तब तक जारी रह सकते थे, जब तक उन्हें बदला या खत्म न किया जाए. इसलिए फांसी वाला प्रावधान भी नए कानून में बना रहा.
फांसी के जरिए मौत की सजा देने पर सवाल नया नहीं है. 1967 में विधि आयोग ने फांसी की जगह दूसरे तरीकों पर विचार किया था, लेकिन उस समय इसे बदलने की सिफारिश नहीं की. फिर 1983 में सुप्रीम कोर्ट ने भी फांसी को क्रूर या असंवैधानिक बताने वाली चुनौती खारिज कर दी. अदालत ने उस समय उपलब्ध वैज्ञानिक और विशेषज्ञ राय के आधार पर माना कि फांसी संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं करती.
लेथल इंजेक्शन की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
अब इसी पुराने सवाल ने फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. वकील ऋषि मल्होत्रा ने फांसी को क्रूर और अमानवीय तरीका बताते हुए इसकी जगह लेथल इंजेक्शन जैसे विकल्प पर विचार करने की मांग की थी. उनका दावा था कि फांसी में मौत होने में ज्यादा समय लग सकता है, जबकि लेथल इंजेक्शन से यह प्रक्रिया कम समय में पूरी हो सकती है. उन्होंने इसे कम पीड़ादायक तरीका बताते हुए संवैधानिक और अंतरराष्ट्रीय मानकों का भी हवाला दिया.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने 1983 के उस फैसले को बड़ी बेंच के पास भेजने से इनकार कर दिया, जिसमें फांसी के तरीके को संवैधानिक माना गया था. यानी फिलहाल भारत में मौत की सजा देने का मौजूदा कानूनी तरीका नहीं बदला है.
क्या आगे कभी बदल सकती है फांसी?
सुप्रीम कोर्ट ने इस संभावना को पूरी तरह बंद नहीं किया है. अदालत ने कहा कि अगर आगे चलकर नए वैज्ञानिक, मेडिकल या दूसरे ठोस सबूत सामने आते हैं, तो इस सवाल पर फिर विचार किया जा सकता है. केंद्र सरकार भी कानून, फॉरेंसिक मेडिसिन, न्यूरोसाइंस और दूसरे क्षेत्रों के विशेषज्ञों की मदद से मौजूदा तरीके की समीक्षा कर सकती है.
यानी भारत में फांसी की कहानी सिर्फ एक पुराने दंड के तरीके की कहानी नहीं है. यह उस दौर से शुरू हुई, जब अलग-अलग तरह की सजाओं से होते हुए ब्रिटिश शासन में इसे कानून का तय हिस्सा बनाया गया. आज भी यही तरीका कायम है, लेकिन लेथल इंजेक्शन वाली याचिका ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि भविष्य में मौत की सजा देने का तरीका भी बदलेगा या नहीं.
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