Ebola Virus: दुनिया में कई ऐसे वायरस हैं, जिनका नाम सुनते ही लोगों के मन में डर पैदा हो जाता है. इबोला भी उन्हीं खतरनाक वायरसों में से एक माना जाता है. इसकी पहचान बेहद तेज संक्रमण और जानलेवा असर की वजह से होती है. जब भी दुनिया में किसी नए वायरस या महामारी की चर्चा होती है, इबोला का नाम जरूर सामने आता है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि आखिर इस वायरस को 'इबोला' नाम क्यों दिया गया था. इसका संबंध किसी वैज्ञानिक या लैब से नहीं, बल्कि अफ्रीका की एक नदी से जुड़ा हुआ है. इसकी कहानी साल 1976 से शुरू होती है, जब पहली बार इस रहस्यमयी बीमारी का पता चला था.
कैसे पड़ा इबोला नाम
विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO के मुताबिक इबोला वायरस पहली बार 1976 में अफ्रीका में सामने आया था. उस दौरान इस बीमारी के मामले दो अलग-अलग इलाकों में लगभग एक साथ मिले थे. एक मामला आज के दक्षिण सूडान इलाके में मिला था, जबकि दूसरा मामला डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो के एक गांव के पास सामने आया था.
जिस जगह पर ये बीमारी फैली थी, उसके पास इबोला नाम की एक नदी बहती थी. वैज्ञानिकों ने इसी नदी के नाम पर वायरस का नाम 'इबोला' रख दिया. ऐसा इसलिए भी किया गया ताकि उस गांव का नाम दुनिया भर में बदनामी का कारण न बन जाए और वहां रहने वाले लोगों पर गलत असर न पड़े.
क्यों इतना खतरनाक माना जाता है इबोला
WHO के अनुसार इबोला एक बेहद गंभीर और कई बार जानलेवा बीमारी साबित होती है. ये वायरस इंसानों के साथ कुछ जानवरों को भी संक्रमित कर सकता है. संक्रमित व्यक्ति के खून, बॉडी फ्लूइड्स या सीधे संपर्क में आने से ये तेजी से फैलता है. इस बीमारी में तेज बुखार, शरीर में कमजोरी, मांसपेशियों में दर्द, उल्टी और दस्त जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. कई गंभीर मामलों में अंदरूनी और बाहरी ब्लीडिंग भी होने लगती है. समय पर इलाज और मेडिकल सपोर्ट न मिलने पर मरीज की जान भी जा सकती है.
फिर बढ़ा खतरा
इबोला का खतरा समय-समय पर फिर सामने आता रहता है. अफ्रीका के कुछ हिस्सों में इसके नए मामले लगातार मिलते रहते हैं. हाल ही में WHO ने कांगो और युगांडा में फैले इबोला के एक दुर्लभ स्ट्रेन को लेकर ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी घोषित की थी. हालांकि अब लोगों में जागरूकता पहले से ज्यादा बढ़ी है, लेकिन इबोला आज भी दुनिया की सबसे खतरनाक संक्रामक बीमारियों में गिना जाता है.
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