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दुनिया के खतरनाक वायरस जिनका डेथ रेट 90% तक, इबोला-निपाह भी शामिल

इबोला और निपाह वायरस ने लोगों के बीच में दहशत मचा रखी हैं. लेकिन ऐसे और भी कई वायरस हैं जो इनसे भी कहीं ज्यादा खतरनाक हैं. यहां देखिए ऐसे ही 5 वायरसों के बारे में यहां.

दुनिया के खतरनाक वायरस जिनका डेथ रेट 90% तक, इबोला-निपाह भी शामिल
यहां देखें 5 खतरनाक वायरस, जो हैं बेहद खतरनाक. ( Image Unsplash)

इबोला, कोरोना, हंतावायरस जैसे ना जाने कितने ही वायरस हैं जिन्होंने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है. बीते कुछ दिनों से इबोला और निपाह वायरस का नाम सुनते ही लोग कांप जाते हैं. लेकिन क्या आपको पता है कि इनसे भी ज्यादा खतरनाक कुछ वायरस है जिनके सामने इबोला और निपाह भी फीके पड़ जाते हैं. 

वैज्ञानिकों और कुछ रिसर्च में भी इस बात की पुष्टि की गई है कि धरती पर कुछ वायरस इनसे भी ज्यादा खतरनाक हैं. उनका फैलना मिनटों में तबाही मचा सकता है. वहीं इनका डेथ रेट 90% से भी ज्यादा है, जिनका अभी तक कोई वैक्सीन और पक्का इलाज तक नहीं मिल पाया है. WHO ने ऐसे वायरस को "हाई रिस्क पैथोजन" की लिस्ट में रखा है. 

The NEHU Journal में पब्लिश एक पेपर में इन वायरस की लिस्ट शेयर की गई है. तो चलिए जानते हैं दुनिया के खतरनाक वायरस कौन से हैं. 

1. मारबर्ग वायरस ( Marburg Virus)

मारबर्ग को सबसे खतरनाक वायरसों में गिना जाता है. मारबर्ग वायरस हेमरेजिक फीवर वायरस ही है. इबोला की तरह यह वायरस भी शरीर में ब्लीडिंग, दौरे और अंगो को नुकसान पहुंचा सकता है. इसकी मृत्यु दर 88 प्रतिशत तक देखी गई है. 

ये एक बेहद संक्रामक रोग जो रक्तस्रावी बुखार का कारण बनता है,  यह वायरस एक एकल-स्ट्रैंडेड आरएनए वायरस है, जिसकी पहली रिपोर्ट 1967 में सामने आई थी, जब जर्मनी में लैब में काम करने वालों कर्मचारियों में दिख थे, जो युगांडा से आने वाले इंफेक्टेड बंदर के संपर्क में आए थे.

2. इबोला (Ebola)

इबोलावायरस की छह प्रजातियां हैं, जिनमें से अधिकांश का नाम अफ्रीका के उन क्षेत्रों के नाम पर रखा गया है जहां इन्हें पहली बार पहचाना गया था. इनमें जैरे, सूडान, ताई फोरेस्ट, बुंडीबुग्यो और बोम्बाली और रेस्टन हैं. बता दें कि रेस्टन का नाम वर्जीनिया के रेस्टन शहर के नाम पर रखा गया है, यहीं पर पहली बार 1989 में पाया गया था. वहीं इन सबमें सबसे ज्यादा खतरनाक जैरे इबोलावायरस माना जाता है. अलग-अलग प्रकोपों में इसकी मृत्यु दर 25% से 90% तक रही है. वैज्ञानिकों का मानना है कि फल खाने वाले चमगादड़ (फ्लाइंग फॉक्स) ने इन्हें दूसरे शहरों में पहुंचाया है.

3. रेबीज 

रेबीज लाइसावायरस, जिसे पहले रेबीज वायरस कहा जाता था, एक ऐसा वायरस है जो मनुष्यों और जानवरों में रेबीज का कारण बनता है. रेबीज किसी संक्रमित जानवर के काटने से फैलता है.  इसके लक्षण दिखने के बाद इसका कोई इलाज नहीं है.

3. हंतावायरस ( Hantavirus)

हंटावायरस कई तरह के वायरसों का एक ग्रुप है. इसका नाम कोरिया की हंटान नदी के नाम पर रखा गया है, जहां 1950 में कोरियाई युद्ध के दौरान अमेरिकी सैनिकों के पहली बार हंतावायरस से संक्रमित होने की आशंका जताई गई थी. यह संक्रमण फेफड़ों की गंभीर बीमारी, तेज बुखार और किडनी फेल होने जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है.

4. बर्ड फ्लू वायरस ( Bird Flu Virus)

बर्ड फ्लू के कई स्ट्रेन हैं जो अक्सर लोगों के बीच दहशत फैलाते हैं, जो शायद जायज भी है क्योकि इसकी मृत्यु दर 70 प्रतिशत है. इसका H5N1 सबसे ज्यादा खतरनाक माना जाता है. हालांकि यह संक्रमण केवल मुर्गियों के सीधे संपर्क में आने से ही हो सकता है. कहा जाता है कि इसी कारण अधिकांश मामले एशिया में दिखाई देते हैं, जहाँ लोग अक्सर मुर्गियों के पास रहते हैं.

5. लासा वायरस ( Lassa Fever)

नाइजीरिया की एक नर्स लासा वायरस से संक्रमित होने वाली पहली इंसान थीं. ये वायरस चूहों द्वारा फैलता है. इसके मामले स्थानिक हो सकते हैं, जिसका मतलब है कि वायरस किसी स्पेसफिक रीजन, जैसे पश्चिमी अफ्रीका में मौजूद होता है, और वहां कभी भी दोबारा फैल सकता है. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि पश्चिमी अफ्रीका में 15 प्रतिशत चूहों में यह वायरस पाया जाता है.

6. निपाह वायरस ( Nipah Virus)

निपाह वायरस (एनआईवी) एक पशुजनित संक्रमण है जिसकी पहचान सबसे पहले 1999 में मलेशिया और सिंगापुर में सुअर पालकों के बीच हुए प्रकोप के बाद हुई थी. यह प्राकृतिक रूप से चमगादड़ों (जीनस प्टेरोपस ) द्वारा फैलता है और संक्रमित जानवरों के सीधे संपर्क, दूषित भोजन या निकट संपर्क के माध्यम से मनुष्यों में फैल सकता है. इस वायरस को अत्यधिक घातक माना जाता है, और पिछले प्रकोपों ​​में मृत्यु दर निगरानी और देखभाल के आधार पर लगभग 40% से 75% तक रही है.

किसी वायरस को खतरनाक कहना आसान नहीं है. वायरस कितना घातक है ये केवल उसके डेथ रेट से नहीं बल्कि वो कितनी तेजी से फैलता है, उसका इलाज और इससे संक्रमित लोगों की संख्या पर निर्भर करता है.

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अस्वीकरण: यह रिसर्च और पब्लिश पेपर ेस उपलब्ध जानकारी पर तैयार किया गया लेख है. NDTV इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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