Kerala News in Hindi: केरल के ड्रग्स बाजार में इन दिनों खलबली मची है. 23 अप्रैल 2026 को पंथीरंकावु टोल प्लाजा पर आबकारी विभाग ने जब एक कार की घेराबंदी की, तो वहां एक सीक्रेट चेंबर में से करीब 3.5 किलो MDMA और 56 ग्राम नशीली गोलियां बरामद हुईं. अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत 3 करोड़ रुपये आंकी गई है. पुलिस ने मौके से दो लोगों को दबोचा. पहली- 20 साल की सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर फातिमा नसरीन, जिसके इंस्टाग्राम पर 25,000 फॉलोअर्स हैं. दूसरा- 29 वर्षीय पी.के. शफीक. ये लोग राजस्थान से ड्रग्स लेकर आए थे. चश्मदीद पत्रकारों के मुताबिक, फातिमा के चेहरे पर पकड़े जाने का जरा भी मलाल नहीं था. कैमरा चालू होने के बावजूद वह बिना किसी शर्मिंदगी के बेखौफ खड़ी रही.
पकड़े जाने के बाद भी अपराध कैसे कर रहा तस्कर
यह कहानी सिर्फ एक गिरफ्तारी की नहीं, बल्कि सिस्टम की सुस्ती की भी है. रिटायर्ड असिस्टेंट एक्साइज कमिश्नर अनिलकुमार टी बताते हैं कि पकड़ा गया शफीक इस धंधे का पुराना खिलाड़ी है. 2023-24 में जब उसे वायनाड के मनंथावडी में घेरने की कोशिश की गई थी, तब वह एक बोलेरो जीप के सीक्रेट चैंबर में गांजा छिपाकर ले जा रहा था. उस वक्त पुलिस से बचने के लिए उसने 15 लाख रुपये कैश एक कुएं में फेंक दिए और फरार हो गया था. हैरानी की बात यह है कि वह कानून की गिरफ्त से बच निकला और अब गांजे के बजाय और भी खतरनाक सिंथेटिक ड्रग्स (MDMA) के साथ वापस लौटा है.
तस्करों ने क्यों बदला अपना 'प्रोडक्ट'?
जांच में खुलासा हुआ कि तस्करों ने अब गांजे के बजाय MDMA पर फोकस करना शुरू कर दिया है. इसके पीछे की मुख्य वजह आंध्र प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में नक्सलियों का कमजोर पड़ना है, जो पहले गांजे की खेती को संरक्षण देते थे. अब 10-11 जिलों में गांजे की फसल नष्ट होने से इसकी तस्करी जोखिम भरी हो गई है. अनिल कुमार कहते हैं कि गांजा भारी होता है और उसे छिपाना मुश्किल है, जबकि MDMA की छोटी सी मात्रा में भी मोटा मुनाफा है. जो तस्कर पहले 50 किलो गांजा बेचकर कमाता था, अब वही कमाई वह मात्र 2-3 किलो MDMA से कर लेता है.
टारगेट पर लंबे नाखूनों वाली युवतियां
ड्रग्स माफिया अब लड़कियों को 'कूरियर' के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं. तस्कर दो तरह की युवतियों को निशाना बनाते हैं. पहली वो जिन्हें ऐश-ओ-आराम के लिए जल्दी पैसा चाहिए (जैसे शीतल शिवदास, जो 11.83 ग्राम MDMA के साथ पकड़ी गई), और दूसरी वो जो फातिमा नसरीन की तरह बेहद गरीब हैं. इन लड़कियों का इस्तेमाल इसलिए किया जाता है क्योंकि चेकपॉइंट्स पर महिलाओं की जांच कम होती है. तस्करी का नया तरीका और भी शातिर है. ये महिलाएं अपने लंबे नाखूनों के नीचे पारदर्शी पन्नी में ड्रग्स छिपाकर ले जाती हैं, जिसे पकड़ पाना लगभग नामुमकिन होता है.
मालाबार कॉरिडोर
केरल में ड्रग्स का सबसे बड़ा अड्डा 'मालाबार क्षेत्र' और कोझिकोड बन चुका है. बेंगलुरु-मैसूर कॉरिडोर के करीब होने के कारण यहां से माल की सप्लाई आसान है. बेंगलुरु में बैठी लैब में ड्रग्स तैयार होती है, दिल्ली से डिस्ट्रीब्यूटर कंट्रोल करते हैं और केरल में सिर्फ खुदरा विक्रेता पकड़े जा रहे हैं.
ओमान तक फैला तस्करी का जाल
पिछले 18 महीनों में एक भयावह पैटर्न दिखा है. जनवरी 2025 में मट्टनचेरी से आयशा (39) पकड़ी गई जिसके तार ओमान से जुड़े थे. मार्च 2025 में मैगी आश्ना को 1 लाख रुपये प्रति ट्रिप के लालच में ओमान से तस्करी के लिए लाया गया था. वहीं त्रिशूर की दीक्षिता और कोच्चि की फिल्म प्रमोटर कल्याणी पीएस की गिरफ्तारी यह साबित करती है कि यह सिंडिकेट अब हर प्रोफेशनल सेक्टर में घुस चुका है.
जांच-पड़ताल शुरुआती कड़ी तक क्यों रुक जाती है?
इतनी गिरफ्तारियों के बावजूद यह धंधा थम नहीं रहा है. अनिल कुमार का आरोप है कि अधिकारी ड्रग्स कंट्रोल के बजाय प्रशासनिक राजनीति में उलझे रहते हैं. कानून के मुताबिक गिरफ्तारी के 180 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल होनी चाहिए, लेकिन इसमें देरी का फायदा उठाकर तस्कर जेल से बाहर आ जाते हैं और फिर उसी धंधे में लग जाते हैं. जब तक राज्य के बाहर बैठे मुख्य सप्लायरों और बेंगलुरु में सक्रिय नाइजीरियाई गिरोहों पर सीधा प्रहार नहीं होगा, तब तक केरल की सड़कों पर यह मौत का सामान बिकता रहेगा.
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