राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के देश और दुनिया में करोड़ों कार्यकर्ता हैं. इसी साल संगठन ने अपनी 100 वर्षों की यात्रा पूर्ण की है. RSS को कोई मायनों में अनूठा संगठन माना जाता है और उनमें से एक बात यह भी है कि संघ में गुरु की परंपरा तो है, लेकिन वह कोई व्यक्ति नहीं है. संघ में गुरु भगवा ध्वज को माना गया है, जो हर महत्वपूर्ण कार्यक्रम और रोज सुबह-शाम लगने वाली शाखाओं में फहराया जाता है. यह दिलचस्प तथ्य है कि संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार या फिर संगठन की विचारधारा में अहम भूमिका अदा करने वाले माधव सदाशिव गोलवलकर को गुरु नहीं माना गया है. गोलवलकर को आदर के साथ गुरुजी कहा जाता है, लेकिन उन्हें गुरु का दर्जा प्राप्त नहीं है.
भगवा ध्वज को ही गुरु मानने की परंपरा को लेकर हमने आरएसएस के एक वरिष्ठ प्रचारक से बात की. वह कहते हैं कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि डॉ. हेडगेवार का यह मत था कि हमें किसी व्यक्ति को गुरु मानने की बजाय भगवा ध्वज को यह दर्जा देना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि व्यक्ति में उसके जीते जी कुछ दोष उत्पन्न हो सकते हैं या उसके प्रति धारणा विपरीत हो सकती है. कई बार किसी व्यक्ति के गुजर जाने के बाद भी उसे लेकर मतभिन्नता की स्थिति आ सकती है. ऐसे में भगवा ध्वज को गुरु के रूप में रखना ज्यादा उपयुक्त होगा. इसके अलावा भगवा ध्वज को प्रतीक के रूप में भी माना गया है. हिंदू धर्म में भगवा ध्वज की पवित्रता है और उसका अपना एक महत्व है.
इसलिए आरएसएस ने भगवा ध्वज को ही गुरु के रूप में स्वीकार किया है. संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का मानना था कि कोई भी मनुष्य पूरी तरह दोषमुक्त या अमर नहीं होता। व्यक्ति के मन में समय के साथ कमजोरी या परिवर्तन आ सकता है, लेकिन एक पावन प्रतीक और विचार हमेशा अडिग रहता है। इसी विचार के साथ भगवा ध्वज को ही गुरु मान लेने की शुरुआत हुई है. अब प्रश्न था कि हमारा गुरु भगवा ध्वज है और हम उसके प्रति अपना समर्पण कैसे दिखाएं? इसके लिए प्रति वर्ष गुरु पूर्णिमा पर गुरु दक्षिणा उत्सव की शुरुआत हुई.
हर साल गुरु को दक्षिणा देते हैं स्वयंसेवक
आरएसएस के कुल 6 उत्सव माने जाते हैं, जिन्हें वह सार्वजनिक तौर पर मनाता है और कार्यक्रमों के आयोजन होते हैं. इनमें से एक गुरु पूर्णिमा भी है. गुरु पूर्णिमा के दिन सभी शाखाओं पर देश भर में कार्यक्रम आयोजित होते हैं. इनमें स्वयंसेवक गुरुदक्षिणा के रूप में कुछ राशि भगवा ध्वज के समक्ष समर्पित करते हैं. ये कार्यक्रम गुरु पूर्णिमा वाले दिन के अलावा भी एक या दो सप्ताह तक चलते हैं. ऐसा इसलिए ताकि छूटे हुए सभी स्वयंसेवकों का गुरु के प्रति समर्पण कराया जा सके. आरएसएस का कहना है कि गुरु दक्षिणा में प्राप्त राशि से ही उनकी साल भर की गतिविधियों का संचालन होता है. इसके अलावा संघ की विचारधारा को प्रसारित करने के लिए निकले हजारों प्रचारकों की दिनचर्या का व्यय भी इसी से निकलता है.
व्यक्ति पूजा को क्यों महत्व नहीं देता आरएसएस
भगवा ध्वज को ही गुरु मानने का कारण संघ के पदाधिकारी यह भी बताते हैं कि इससे व्यक्ति पूजा की स्थिति नहीं बनती. आरएसएस मानता है कि संगठन, उद्देश्य और विचारधारा अहम हैं. व्यक्ति पूजा की स्थिति में इनसे भटकाव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है. इसके अतिरिक्त किसी एक व्यक्ति को ही बहुत अहमियत दिए जाने से उसके पक्ष और विपक्ष में खेमेबंदी हो सकती है. किंतु भगवा ध्वज के प्रति ऐसा कोई भाव उत्पन्न नहीं होता क्योंकि वह कोई व्यक्ति नहीं है, जिसके गुण एवं दोषों की विवेचना की जा सके. ऐसे में भगवा ध्वज को ही गुरु मान लिया गया और बीते 100 सालों की यात्रा में आरएसएस के लोग उसके प्रति हर साल गुरु दक्षिणा देकर अपना समर्पण जताते आए हैं.
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