राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार को कहा कि भारत में ‘धर्म' की अवधारणा पश्चिमी देशों में प्रचलित ‘रिलिजन' की धारणा से अलग है और देश ने विभिन्न मत-पंथों के बीच कभी भेदभाव नहीं किया. भागवत उज्जैन में करीब 1,700 ‘जेन जी' प्रतिभागियों को ‘युवा धर्म संसद' में संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि उन्हें खुशी है कि ऐसे समय में युवा ‘धर्म' पर चर्चा कर रहे हैं, जब कुछ लोग इसे बुजुर्गों का विषय मानते हैं.
भागवत ने कहा कि ‘धर्म' त्याग और दान से फलता-फूलता है. उन्होंने भौतिक तथा आध्यात्मिक जीवन में संतुष्टि के लिए त्याग के महत्व को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि धन कमाने पर कोई रोक नहीं है, लेकिन व्यक्ति को अपने लिए उतना ही रखना चाहिए जितनी आवश्यकता है और बाकी दूसरों के साथ साझा करना चाहिए. उन्होंने कहा, ‘‘आपका जीवन इस तरह आगे बढ़ना चाहिए कि दूसरों का जीवन भी आगे बढ़े.''
आरएसएस प्रमुख ने इस बात पर जोर दिया कि किसी व्यक्ति की आजीविका दूसरों के लिए कष्ट का कारण नहीं बननी चाहिए. उन्होंने कहा, 'सूरज को ही ले लीजिए, आप इसके बारे में कुछ नहीं कर सकते. यदि आप इसमें विश्वास नहीं करते, तो भी कोई बात नहीं, फिर भी यह उगेगा और डूबेगा ही.”
भागवत ने कहा, “एक व्यक्ति, अपने अहंकार के कारण, यह मानता है कि सब कुछ उसके अधिकार के अनुसार चलता है और वह सब कुछ नियंत्रित कर सकता है. इस वजह से, वह इस गलतफहमी को पाल लेता है कि ऐसी चीजें भी उसकी इच्छा के अनुसार ही चलनी चाहिए. लेकिन बात ऐसी नहीं है. हमारे यहां राज्य की परंपरा हमेशा समावेशी रही है. वह अपने लोगों में भेदभाव नहीं करता. हमारे लिए पंथ-निरपेक्षता का यही अर्थ है.''

भागवत ने कहा कि पश्चिमी देशों में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा शासकों और धार्मिक प्राधिकारों के बीच संघर्ष से विकसित हुई और इसलिए इसे भारतीय संदर्भ में उस तरह नहीं लिया जा सकता. उन्होंने कहा कि भारत में परंपरागत रूप से जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक पहलुओं को अलग-अलग देखने के बजाय एक साथ देखा गया है. धर्म और ‘रिलिजन' में अंतर बताते हुए भागवत ने कहा कि दोनों को समानार्थी नहीं माना जाना चाहिए.
उन्होंने कहा कि धर्म ‘रिलिजन' से ऊपर है और जहां ‘रिलिजन' बांधता है, वहीं धर्म मुक्ति और मोक्ष की ओर ले जाता है. अंग्रेजी भाषा में भारतीय अवधारणा के लिए कोई सटीक समानार्थी शब्द नहीं है और पश्चिमी लोगों को समझाने के लिए ऐतिहासिक रूप से ‘रिलिजन' शब्द का इस्तेमाल किया जाता रहा है.
भागवत ने कहा कि धर्म से अलग होने पर ‘रिलिजन' संप्रदायवाद का रूप ले सकता है. उन्होंने धर्म को सत्य, करुणा, पवित्रता और आत्म-अनुशासन पर आधारित बताया. उन्होंने कहा, ‘‘धर्म ऐसी चीज नहीं जिसे खोजा जाए... उसे पहचाना और आचरण में उतारा जाना चाहिए.''
आरएसएस प्रमुख ने धर्म को ऐसा सिद्धांत बताया जो दुनिया को बनाए रखता है, सभी के विकास को बढ़ावा देता है और प्रत्येक जीव तथा वस्तु की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए कर्तव्यों का निर्धारण करता है. धर्म मनुष्य के आचरण में दिखाई देता है. उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि यदि वे धर्म को समझना चाहते हैं, तो उन्हें पूर्वाग्रहों को छोड़ना होगा.
भागवत ने धर्म को पर्यावरण संरक्षण से भी जोड़ा और कहा कि प्रकृति की रक्षा करना मनुष्य का कर्तव्य है तथा जंगलों का विनाश और पर्यावरण का क्षरण अधर्म है. उन्होंने युवाओं से कहा कि वे अपनी परंपराओं के प्रति प्रतिबद्ध रहते हुए उपासना के दूसरे तरीकों का भी सम्मान करें.
भागवत ने कहा कि भारत की परंपरा लोगों को बांटने के बजाय उन्हें जोड़ने की रही है और देश ने ऐतिहासिक रूप से उन लोगों की भी मदद करने का प्रयास किया है जो उससे अलग रहे या उसके लिए मुश्किलें पैदा करते रहे.
न्यूयॉर्क, टोरंटो और लंदन की अपनी हालिया यात्राओं का उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा कि वहां उद्यमी इस बात को लेकर चिंतित थे कि उनके कारोबार से केवल खुशी ही नहीं बल्कि कष्ट भी पैदा हो रहा है. उन्होंने कहा कि अधिक धन कमाने की होड़ में पारिवारिक जीवन की कीमत चुकाना उचित नहीं है. उन्होंने ऐसे लोगों का उदाहरण दिया जो सुबह पांच बजे घर से निकलते हैं और अधिक कमाई के लिए आधी रात को लौटते हैं, लेकिन उनके बच्चे उन्हें मुश्किल से पहचानते हैं. उन्होंने कहा कि विकास में इस तरह का असंतुलन स्वस्थ नहीं है.
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