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चुपचाप काम, अमित शाह के विश्वासपात्र, पश्चिम बंगाल में बीजेपी के शिल्पकार, जानिए कौन हैं सुनील बंसल

बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी की प्रचंड जीत के पीछे कई शिल्पकार हैं. इसमें सुनील बंसल का भी नाम शामिल है. वो पर्दे के पीछे चुपचाप पार्टी की जीत के लिए काम करते रहे.

चुपचाप काम, अमित शाह के विश्वासपात्र, पश्चिम बंगाल में बीजेपी के शिल्पकार, जानिए कौन हैं सुनील बंसल
बीजेपी नेता सुनील बंसल (फाइल फोटो)
नई दिल्ली:

भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में ऐतिहासिक जीत हासिल की है. पार्टी प्रचंड बहुमत की ओर बढ़ रही है. इस जीत की कहानी लिखने में पार्टी के कई नेताओं का हाथ है. इनमें से एक नाम राष्ट्रीय महासचिव सुनील बंसल का भी है. 57 वर्ष के सुनील बंसल को पर्दे के पीछे के खिलाड़ी के रूप में जाना जाता है. मीडिया की सुर्खियों से दूर बंसल चुपचाप संगठन का काम करने वाले नेताओं में से जाने जाते हैं.

ABVP से की शुरुआत 

उत्तर प्रदेश में बीजेपी की चार लगातार जीत, ओडिशा और तेलंगाना में बेहतरीन प्रदर्शन और अब पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक जीत के पीछे बंसल की भूमिका भी चर्चा होती है. आरएसएस के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले बंसल राजस्थान के रहने वाले हैं. वे 1989 में  राजस्थान यूनिवर्सिटी के महासचिव चुने गए. इसके बाद आरएसएस से जुड़ गए. 1990 में आरएसएस प्रचारक के तौर पर काम शुरू किया. बाद में, उन्होंने बीजेपी के सदस्य के तौर पर सक्रिय राजनीति में कदम रखा.

अमित शाह की योजनाओं को जमीन पर उतारा 

2014 के चुनाव से पहले आरएसएस ने उन्हें बीजेपी में भेजने का फैसला किया. वे उत्तर प्रदेश के सह संगठन मंत्री बनाए गए. इस दौरान अमित शाह राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर उत्तर प्रदेश के प्रभारी थी. तब बंसल को शाह के साथ नजदीक से काम करने का अवसर मिला. उन्होंने अपनी संगठन क्षमता और अनुशासन से शाह को प्रभावित किया. विभिन्न क्षेत्रीय दलों को साथ लाना और बूथ तक पार्टी को मजबूत करने की शाह की योजनाओं को बंसल ने क्रियान्वित करने में भूमिका निभाई. पन्ना  प्रमुख की शाह की रणनीति को जमीन पर उतारा. मेरा बूथ सबसे मजबूत कार्यक्रम को लागू किया.

तीन राज्यों के बने प्रभारी 

2014 में बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन किया और राज्य की 80 में से 73 लोक सभा सीटें जीतीं. इसके  बाद बंसल को प्रमोट करते हुए यूपी का संगठन मंत्री बना दिया गया. 2017 के विधानसभा चुनाव में मिली प्रचंड जीत का सेहरा बंसल के सिर भी बांधा गया. इसके बाद 2019 और 2022 के चुनाव में भी यूपी में पार्टी को जीत दिलाने में उनकी भूमिका रही. वे लगातार आठ साल तक यूपी में संगठन मंत्री रहे. इस दौरान योगी सरकार से संगठन के तालमेल की जिम्मेदारी भी संभालते रहे. 2022 में योगी सरकार की वापसी के बाद उन्हें दिल्ली लाया गया. वे जे पी नड्डा की टीम में राष्ट्रीय महासचिव बनाए गए. उन्हें ओडिशा, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल जैसे महत्वपूर्ण राज्यों का प्रभारी बनाया गया.

ओडिशा में तोड़ा नवीन का किला 

बंसल ने ओडिशा का प्रभारी रहते हुए नवीन पटनायक का किला ठीक वैसे ही तोड़ा जैसा कि अब पश्चिम बंगाल का प्रभारी रहते हुए ममता बनर्जी के किले को ध्वस्त कर दिया. उन्होंने ओडिशा में पार्टी के संगठन को मजबूत बनाया. बीजेपी को ओडिशा में लोक सभा चुनाव में शानदार कामयाबी मिली. 2024 के लोक सभा चुनाव में बीजेपी ने 21 में से 20 लोक सभा सीटें जीतीं और विधानसभा में पूर्ण बहुमत हासिल कर राज्य में पहली बार सरकार बनाई.


बंगाल में लोकसभा चुनाव में बीजेपी नहीं दोहरा पाई थी 19 वाला प्रदर्शन 

तेलंगाना में भी बंसल का संगठन कौशल काम आया. उनकी रणनीति ने चुनावी सफलता दिलाई और बीजेपी को राज्य की 17 में से 8 सीटों पर जीत हासिल हुई. हालांकि उनके प्रभारी रहते हुए 2024 लोक सभा चुनाव में बीजेपी पश्चिम बंगाल में 2019 का प्रदर्शन नहीं दोहरा सकी थी.  तब बीजेपी को 40.64 प्रतिशत वोटों के साथ 18 सीटें मिली थीं. लेकिन 2024 में उसका प्रदर्शन गिरा और 38.73 प्रतिशत वोटों के साथ वह 12 सीटें ही जीत सकी. 


विधानसभा चुनाव में कुछ यूं लहराया जीत का परचम 

इसके बाद बंसल ने 2026 के विधानसभा चुनाव के लिए कमर कसी. मुद्दों की पहचान की। केंद्रीय नेतृत्व के साथ प्रदेश संगठन का तालमेल बेहतर किया। हाशिए पर गए नेताओं को साथ लिया। पार्टी को एकजुट किय. बूथ स्तर तक अभियान चला कर पार्टी को मजबूत किया गया. एसआईआर में संगठन को सक्रिय किया.  डेटा और माइक्रो मैनेजमेंट का काम किया. हर विधानसभा के जातिगत समीकरणों, स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवारों की लोकप्रियता का गहरा विश्लेषण किया गया. आरएसएस के साथ भी तालमेल बैठाया और उम्मीदवार चयन में फीडबैक लिया. शाह के पंद्रह दिनों के राज्य प्रवास में उनके साथ नजदीक से तालमेल किया. उनके निर्देशों को अमलीजामा पहनाया. नाराज नेताओं को मनाना और चुनाव लड़ने में आ रही दिक्कतों को दूर करने की जिम्मेदारी भी संभाली.

बीजेपी के 'इलेक्शन इंजीनियर' हैं बंसल 

बंसल ने राज्य के चुनाव प्रभारी केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और सह प्रभारियों त्रिपुरा के पूर्व सीएम बिप्लब देब और आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय के साथ मिल कर पश्चिम बंगाल की जीत की अमित शाह की रणनीति को जमीन पर उतारने का काम किया. यही कारण है कि पार्टी को ऐतिहासिक सफलता हासिल हुई. सुनील बंसल की कार्यशैली शांत रहकर संगठन को मजबूत करने की है. उन्हें भाजपा का वह 'इलेक्शन इंजीनियर' माना जाता है. वे कठिन राज्यों में भी पार्टी के सांगठनिक ढांचे को खड़ा करने और उसे चुनावी मशीनरी में बदलने में माहिर हैं.

2027 में बीजेपी के सामने बड़ा लक्ष्य 

दिलचस्प बात यह है कि उनका नाम जे पी नड्डा के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के लिए भी लिया जाता था. हालांकि अब यह जिम्मेदारी नितिन नवीन को दी गई है. इसी तरह राजस्थान में सरकार बनने पर मुख्यमंत्रियों के संभावित नामों में बंसल का नाम भी शामिल था. हालांकि इसमें भजन लाल शर्मा बाजी मार ले गए. अगले साल फरवरी में पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा तथा नवंबर-दिसंबर में दो राज्यों गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव होने हैं. इनमें पंजाब और हिमाचल प्रदेश को छोड़ कर बाकी सभी राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं. पार्टी के सामने चुनौती अपनी सरकारें बचाने के साथ ही पंजाब और हिमाचल प्रदेश में सरकार बनाने की भी है. अब देखना होगा कि बंसल को पार्टी क्या जिम्मेदारी देती है.

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