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ISI में क्या बदलने जा रही सरकार कि मचा है बवाल, 95 साल पुरानी संस्था की ऑटोनॉमी पर क्यों उठ रहा है सवाल?

केंद्र सरकार के इंडियन स्टेटिस्टिकल इंस्टीट्यूट (ISI) बिल को लेकर विवाद हो रहा है. यह 1931 में बना संस्थान है. सरकार का कहना है कि आज की जरूरत के हिसाब से नया कानून जरूरी है.

ISI में क्या बदलने जा रही सरकार कि मचा है बवाल, 95 साल पुरानी संस्था की ऑटोनॉमी पर क्यों उठ रहा है सवाल?
सोमवार को लोकसभा में ISI बिल पेश किया गया था.
ISI Kolkata

संसद के मॉनसून सत्र में सरकार ने एक ऐसा बिल पेश किया है, जिस पर विवाद खड़ा हो गया है. इसे केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने सोमवार को पेश किया था. इंडियन स्टेटिस्टिकल इंस्टीट्यूट (ISI) के ढांचे में बदलाव करने वाले इस बिल को संसदीय समिति में भेजने की मांग हो रही है.

पिछले साल सितंबर में केंद्र सरकार ने ISI बिल का ड्राफ्ट पेश किया था, जिसमें ISI के गवर्नेंस स्ट्रक्चर में बदलाव का प्रस्ताव दिया था. उस समय भी कोलकाता कैंपस के छात्रों, फैकल्टी और कर्मचारियों ने बिल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था. 

ISI को 1931 में कोलकाता में मशहूर स्टेटिशियन प्रशांत चंद्र महालनोबिस ने की थी. यही वह संस्थान है, जिसने भारत की पंचवर्षीय योजनाओं से लेकर नेशनल सैंपल सर्वे तक हर चीज को तैयार किया है. 

अब जब मॉनसून सत्र में सरकार फिर इस बिल को लेकर आई है तो इस पर विवाद हो गया है. अगर यह बिल दोनों सदनों से पास हो जाता है तो यह 1959 के पुराने कानून की जगह लेगा. इस बिल में ISI के 95 साल के इतिहास में सबसे बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव का प्रस्ताव है. 

क्या है ISI बिल?

इस बिल में ISI के प्रशासनिक ढांचे में बदलाव का प्रस्ताव है. मंत्रालय के मुताबिक, इसका मकसद ISI के गवर्नेंस को मजबूत करना, जवाबदेही बेहतर करना, रिसर्च को बढ़ावा देना और टेक्नोलॉजी और फाइनेंशियल सेक्टर के लिए जरूरी स्टैटिस्टिशियन और डेटा साइंटिस्ट की अगली पीढ़ी को तैयार करने में मदद करना है.

प्रस्तावित बिल में कहा गया है कि ISI अब तक पश्चिम बंगाल सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1961 के तहत एक सोसायटी के रूप में चल रहा था, लेकिन यह राष्ट्रीय महत्व का संस्थान है, इसलिए इसकी भूमिका बढ़ानी की जरूरत है.

बिल में इसका मकसद बताते हुए कहा गया है कि भारत की बढ़ती और डेटा-ड्रिवन इकनॉमी की जरूरत को ध्यान में रखते हुए इसके ढांचे में बदलाव करना जरूरी है.

इस बिल में ISI को 'बॉडी कॉर्पोरेट' बनाने का प्रस्ताव है और विवाद की सबसे बड़ी वजह यही है. सरकार का कहना है कि इससे ISI को कानूनी रूप से एक स्वतंत्र संस्थान का दर्जा मिलेगा. सरकार के मुताबिक, इससे ISI के प्रशासन को बेहतर किया जा सकेगा, रिसर्च को बढ़ावा मिलेगा और इसे आज की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम बनाया जा सकेगा.

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लेकिन इन सबकी जरूरत क्यों?

सरकार का कहना है कि नया कानून लाने का मकसद इसके गवर्नेंस फ्रेमवर्क को बेहतर बनाना है, ताकि इसे राष्ट्रीय महत्व वाले दूसरे संस्थानों के बराबर लाया जा सके. 

MOSPI की ओर से जारी FAQ में कहा गया कि ISI काउंसिल का बड़ा होना, इसमें बहुत ज्यादा 'इंटरनल रिप्रेजेंटेशन' होना और बड़ी संख्या में 'चुने गए सदस्य' फैसले लेने में रुकावट डालते हैं. सरकार का तर्क है कि 1959 का कानून आज की जरूरत के हिसाब से गवर्नेंस, एडमिनिस्ट्रेशन, फाइनेंस और जवाबदेही से जुड़े मामलों को ठीक से नहीं संभाल पाता है.

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बिल से कैसे बदलेगा पूरा ढांचा?

इस बिल में संस्थान को एक 'स्टैच्युटरी बॉडी कॉर्पोरेट' बनाने का प्रावधान है. इसका मतलब है कि यह अब सिर्फ एक सोसायटी नहीं, बल्कि संसद के एक एक्ट से बनी संस्था होगी. इससे इसके कामकाज का ढांचा भी बदल जाएगा और यह IIT-IIM जैसे संस्थानों जैसा हो जाएगा.

इसमें प्रस्ताव है कि राष्ट्रपति इसके 'विजिटर' होंगे. संस्थान में एक 'गवर्नेंस बोर्ड' होगा, जिसमें केंद्र सरकार की सिफारिश पर 'विजिटर' की ओर से नॉमिनेट किए गए चेयरपर्सन, केंद्र के प्रतिनिधि, केंद्र से नॉमिनेट किए गए लोग, संस्थान के डायरेक्टर और अन्य प्रतिनिधि शामिल होंगे.

यह 'गवर्नेंस बोर्ड' प्रशासनिक मामलों पर फैसला करेगा, डिग्रियां देगा, एकेडमिक और अन्य पदों पर नियुक्तियां करेगा. संस्थान के नियम और रेगुलेशन बनाने का काम भी यही बोर्ड करेगा.

बिल में एक 'एकेडमिक काउंसिल' बनाने का प्रावधान भी है, जिसमें डिविजन और सेंटर के प्रमुख शामिल होंगे. इसकी अध्यक्षता डायरेक्टर करेंगे और यह काउंसिल बोर्ड को सुझाव देगी.

संस्थान के डायरेक्टर की नियुक्ति गवर्नेंस बोर्ड के चेयरमैन करेंगे. केंद्र सरकार की ओर से बनाई कमेटी एक पैनल की सिफारिश करेगी. बिल 'विजिटर' यानी राष्ट्रपति को डायरेक्टर को हटाने और संस्थान के कामकाज की जांच और समीक्षा के आदेश देने का अधिकार देता है. 

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विरोध की वजह क्या है?

इस बिल के विरोध की सबसे बड़ी वजह इसकी ऑटोनॉमी को लेकर है. विरोध करने वालों का तर्क है कि इससे संस्थान पर केंद्र का कंट्रोल बढ़ेगा और इसकी ऑटोनॉमी यानी स्वायत्तता कम हो जाएगी. 

इसके खिलाफ दूसरा तर्क यह है कि संस्थान की काउंसिल, बोर्ड और डायरेक्टर की नियुक्ति में केंद्र की भूमिका बढ़ जाएगी. सबकुछ केंद्र सरकार के हिसाब से होगा, जिससे संस्थान की स्वायत्तता कम होगी.

CPI(ML) सांसद राजा राम सिंह ने इस बिल संसद की स्थायी समिति के पास भेजने की मांग की है. उनका कहना है कि ISI जैसे संस्थान में किसी भी सुधार के लिए बहुत सावधानी की जरूरत होती है. उनका कहना है कि इससे ISI की ऐतिहासिक विरासत कमजोर होगी और कानूनी और प्रशासनिक अड़चनें पैदा होने का खतरा है.

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