- पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले मतदाता सूची में करीब इक्यानवे लाख नामों को विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत हटाया गया था
- प्रमुख जिलों जैसे मुर्शिदाबाद और उत्तर चौबीस परगना में सबसे ज्यादा वोटर नामों की कटौती हुई थी
- जिन क्षेत्रों में अधिक वोटर नाम हटाए गए, वहां विपक्षी दलों को चुनाव में अधिक फायदा मिला है
West Bengal Elections 2026: पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों में जिस तरीके से ऐतिहासिक परिवर्तन दिखा है....उसे लेकर कई तरह की चर्चा सियासी गलियारों में हो रही है. उसमें एक चर्चा ये भी है क्या असली 'खेला' उन 91 लाख नामों ने कर दिया, जो चुनाव से ठीक पहले वोटर लिस्ट से गायब हो गए थे. दरअसल, चुनाव आयोग ने चुनाव से पहले मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) किया था, जिसके तहत राज्य भर में करीब 91 लाख नाम हटाए गए थे. सबसे ज्यादा नाम मुर्शिदाबाद, उत्तर 24 परगना, मालदा, नदिया और दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों से कटे. जब नतीजे आए, तो इन कटे हुए नामों और सीटों की जीत-हार के बीच एक दिलचस्प कनेक्शन देखने को मिला. पढ़िए इस रिपोर्ट में.
आंकड़ों के आईने में देखेंगे तो ये संकेत मिलता है कि जहां जितने ज्यादा वोट कटे, वहां विपक्ष को उतना ही फायदा हुआ.

इसका मतलब क्या है?
बीजेपी और अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि यह 'लोकतंत्र की जीत' है. उनका आरोप है कि बरसों से फर्जी वोटरों के सहारे जनादेश को प्रभावित किया जा रहा था, जिसे SIR ने बेनकाब कर दिया. कई जानकारों का मानना है कि जब 91 लाख नाम हटते हैं, तो यह केवल संख्या नहीं होती, बल्कि यह पूरे चुनावी ईकोसिस्टम को बदल देता है. कई सीटों पर हार-जीत का अंतर 2 से 5 हजार के बीच होता है, ऐसे में 25 हजार नामों का हटना काफी हद तक गेमचेंजर साबित हुआ. दूसरे शब्दों में कहें तो वोटर लिस्ट से 'दोहरे' या 'फर्जी' नामों का हटना सीधे तौर पर बूथ स्तर के प्रबंधन पर भारी पड़ा. यह केवल नाम कटने की बात नहीं थी, बल्कि इसने उन संगठित वोट बैंकों को प्रभावित किया जो दशकों से एकतरफा वोटिंग के लिए जाने जाते थे. आंकड़ों में यह साफ है कि SIR की इस 'सफाई' ने बंगाल की सत्ता की चाबी पलटने में किसी भी अन्य फैक्टर से ज्यादा बड़ी और खामोश भूमिका निभाई है.
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