- पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने टीएमसी को बड़े अंतर से पछाड़कर पुराने किले को ध्वस्त कर दिया है
- मालदा, मुर्शिदाबाद और दक्षिण 24 परगना जैसे मुस्लिम क्षेत्रों में बीजेपी की बढ़त बंगाल की राजनीति बदली
- धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि यह नतीजा टीएमसी के कुशासन, भय और भ्रष्टाचार की राजनीति के खिलाफ जनादेश है
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों में इस बार बड़ा उलटफेर होता दिख रहा है, क्योंकि दोपहर तक के रुझानों में बीजेपी ने बड़े अंतर से टीएमसी को पछाड़ दिया है. इन रुझानों से साफ है कि बीजेपी ने तृणमूल कांग्रेस के मजबूत किले को हढा दिया है. खासतौर पर वे इलाके, जिन्हें अब तक टीएमसी का सुरक्षित वोट बैंक माना जाता था. मालदा, मुर्शिदाबाद और दक्षिण 24 परगना जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में बीजेपी की अप्रत्याशित बढ़त ने बंगाल की राजनीति की दिशा ही बदल दी है. एनडीटीवी से बातचीत में केंद्रीय मंत्री और बंगाल चुनाव के प्रमुख रणनीतिकार धर्मेंद्र प्रधान ने साफ कहा कि यह नतीजा किसी एक वर्ग या समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि टीएमसी के कुशासन, भय और भ्रष्टाचार की राजनीति के खिलाफ जनादेश है.
Union Minister Dharmendra Pradhan (@dpradhanbjp) speaks to NDTV on trends showing BJP leading in West Bengal #ResultsWithNDTV pic.twitter.com/F0yArosB4V
— NDTV (@ndtv) May 4, 2026
“बंगाल की जनता ने डर की राजनीति को नकार दिया”
धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि टीएमसी लंबे समय तक भय दिखाकर, चुनावों में निष्पक्षता खत्म कर और घुसपैठियों को संरक्षण देकर सत्ता में बनी रही. उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली सरकारें डर और रिगिंग के सहारे जीतती रहीं, लेकिन इस बार चुनाव आयोग द्वारा कराए गए निष्पक्ष चुनाव ने जनता की हकीकत सामने ला दी. “यह जीत बीजेपी की नहीं, बल्कि बंगाल की जनता की आकांक्षाओं की जीत है. मालदा, मुर्शिदाबाद तक, दार्जिलिंग की पहाड़ियों से लेकर गंगासागर तक, हर इलाके ने निर्णायक जनादेश दिया है.”
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मुस्लिम इलाकों में बदलाव का बड़ा कारण क्या रहा?
जब एनडीटीवी ने सवाल किया कि मुस्लिम‑बहुल इलाकों में बीजेपी कैसे आगे निकली, तो धर्मेंद्र प्रधान ने इसे वोट‑स्प्लिट या रणनीतिक बंटवारे का नतीजा मानने से इनकार किया. उनका कहना था कि मुस्लिम मतदाताओं ने भी इस बार भय, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ वोट किया. प्रधान के मुताबिक, युवाओं को नौकरी नहीं मिली, शिक्षा भर्ती घोटाले सामने आए, मंत्रियों के ठिकानों से नकदी बरामद हुई. महिलाओं पर अत्याचार के मामलों को सत्ता के अहंकार से दबाया गया. इन सब बातों ने विश्वास का गंभीर संकट पैदा कर दिया, जिससे टीएमसी का पारंपरिक समर्थन दरक गया.
महिलाओं का वोट: निर्णायक बदलाव
बातचीत में महिलाओं के वोट को लेकर भी अहम टिप्पणी हुई. धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि यह जीत “मातृशक्ति की विजय” है. टीएमसी सरकार ने जिस तरह गंभीर घटनाओं पर संवेदनहीनता दिखाई, उससे खासकर बंगाल की महिलाओं में गहरा असंतोष पैदा हुआ. “यह अहंकार की पराजय है, महिलाओं, गरीबों, युवाओं और किसानों सबका आक्रोश वोट में बदला.”
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“यह सिर्फ एक चुनाव नहीं, 50 साल का पैटर्न टूटा है”
धर्मेंद्र प्रधान ने इस नतीजे को सिर्फ मौजूदा सरकार की हार नहीं, बल्कि पिछले करीब 50 वर्षों की राजनीतिक संस्कृति के टूटने के रूप में बताया. उनके मुताबिक बंगाल पहले 35 साल कम्युनिस्ट शासन और फिर 15 साल टीएमसी शासन में रहा, जहां लोकतंत्र धीरे‑धीरे बंधक बन गया. उन्होंने कहा कि इस चुनाव में बंगाल की जनता ने सीमा सुरक्षा, घुसपैठ, रोजगार, सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दों पर एक स्पष्ट फैसला दिया है.
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