- ममता बनर्जी ने 2011 में सिंगुर आंदोलन के दौरान 26 दिनों तक भूख हड़ताल कर वामपंथी शासन का अंत किया था
- टीएमसी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे, जिसमें शिक्षक भर्ती घोटाला और मवेशी तस्करी मामले शामिल हैं
- स्थानीय स्तर पर पार्टी के सिंडिकेट राज और कट मनी की वसूली से आम जनता का भरोसा कमजोर हुआ है
Mamata Banerjee Defeat Reasons: पश्चिम बंगाल की राजनीति में दशकों तक अपरास्त और दिग्विजयी मानी जाने वाली ममता बनर्जी आज अपनी साख की सबसे बड़ी लड़ाई हारती नजर आ रही हैं. अप्रैल 2026 के चुनावी समर में उमड़ी बदलाव की लहर ने 'दीदी' के उस अभेद्य दुर्ग को हिला दिया है, जिसे कभी अजेय माना जाता था. यह महज एक चुनावी शिकस्त नहीं, बल्कि उस 'स्ट्रीट फाइटर' छवि के ढहने की दास्तान है जिसने बंगाल के जनमानस पर वर्षों तक राज किया. जाहिर है, जब पतन इतना बड़ा है तो वजहें भी गहरी होंगी. भ्रष्टाचार के आरोपों से लेकर आंतरिक बगावत तक, 'दीदी' के किले में सेंध लगाने वाली उन तमाम वजहों का हम विश्लेषण करेंगे, लेकिन उससे पहले उस 'फाइटर' की फ्लैशबैक कहानी जान लेते हैं, जिसकी हार की पटकथा आज लिखी जा रही है."
जब 18 साल की लड़की ने हिला दी थी देश की सियासत
बात शुरु से शुरु करते हैं. 5 जनवरी 1955 को कोलकाता के एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार में जन्मी ममता बनर्जी ने छात्र राजनीति से ही अपने तेवर साफ कर दिए थे. उनके 'फाइटर' होने की पहली गूंज 20 जनवरी 1975 को सुनाई दी, जब आपातकाल के दौरान महज 18 साल की ममता जयप्रकाश नारायण (JP) की कार के बोनट पर कूद गईं. इस एक घटना ने उनका नाम पूरे देश में चमका दिया. यही वजह थी कि 1984 में कांग्रेस ने उन्हें दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी के खिलाफ मैदान में उतारा. दुनिया तब दंग रह गई जब इस युवा लड़की ने सोमनाथ जैसे धुरंधर को पटखनी देकर 'जायंट किलर' का खिताब अपने नाम किया. यहीं से ममता के उस आक्रामक सफर का आगाज हुआ, जिसने आगे चलकर देश की सियासत को कई बार हिलाकर रख दिया.

संसद में नरमुंड और जॉर्ज का पकड़ा कॉलर
1984 की जीत के बाद ममता ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. साल 1998 में उनकी राजनीति का वो चेहरा दिखा जिसने पूरे देश को सन्न कर दिया. बंगाल में वामपंथी हिंसा के खिलाफ आवाज उठाते हुए ममता ने संसद के भीतर मेज पर मानव खोपड़ियां और हड्डियां बिखेर दीं. वो बताना चाह रही थीं कि बंगाल में वामपंथी हिंसा किस कदर खतरनाक हो चुका है. यह सत्ता को हिलाने वाला एक ऐसा 'शॉक ट्रीटमेंट' था जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी. इसी दौर में महिला आरक्षण बिल पर बहस के दौरान उनका गुस्सा इस कदर फूटा कि उन्होंने तत्कालीन केंद्रीय मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस का कॉलर पकड़ लिया. इन घटनाओं ने साफ कर दिया कि ममता वो फाइटर हैं जो अपनी बात मनवाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं.
26 दिनों का अनशन और सिंगुर की वो आग
लेकिन ममता बनर्जी के 'अजेय-दुर्ग' की नींव पड़ी साल 2006 में, सिंगुर आंदोलन के दौरान. टाटा नैनो प्लांट के लिए जमीन अधिग्रहण के खिलाफ ममता कोलकाता की सड़क पर लगातार 26 दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठी रहीं. गिरते स्वास्थ्य और डॉक्टरों की चेतावनी के बावजूद वह डिगी नहीं. उनके इस अदम्य साहस ने 34 साल पुराने वामपंथी शासन की चूलें हिला दीं और 2011 में वह पहली बार बंगाल की सत्ता के शिखर पर पहुंचीं.
अब तक आप समझ गए होंगे कि आखिर क्यों ममता बनर्जी को 'फाइटर' और उनकी राजनीति को 'अजेय' माना जाता रहा है. लेकिन सवाल यही है कि जो दुर्ग 34 साल के कम्युनिस्ट शासन से नहीं ढहा, वो आज महज 15 साल में ही क्यों दरक गया? आज चुनावी नतीजे जो संकेत दे रेह हैं उससे ये सवाल उठना लाजमी है कि आखिर वो 'फाइटर' क्यों फेल हो गई? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता की जो आक्रामकता कभी उनकी ताकत थी, वही अब उनके खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) का कारण बन गई है. भ्रष्टाचार के आरोप, संदेशखाली जैसी घटनाएं और रोजगार के मुद्दों ने उनकी उस 'रक्षक' वाली छवि को चोट पहुंचाई है.

भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप
तृणमूल कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार के आरोप रहे. शिक्षक भर्ती घोटाला (SSC Scam) में पूर्व मंत्री पार्थ चटर्जी की गिरफ्तारी और उनके करीबियों के पास से करोड़ों की नकदी बरामद होने ने पार्टी की छवि को गहरा धक्का पहुंचाया. इसके अलावा मवेशी तस्करी मामले में अनुब्रत मंडल और राशन घोटाले में ज्योतिप्रिय मल्लिक जैसे कद्दावर नेताओं की गिरफ्तारी ने जनता के बीच यह संदेश दिया कि भ्रष्टाचार निचले स्तर तक फैला हुआ है.
सिंडिकेट राज और 'कट मनी' का दीमक
बंगाल के जमीनी हालात इस कदर बिगड़े कि भवन निर्माण से लेकर सरकारी ठेकों तक में टीएमसी के स्थानीय 'सिंडिकेट' का दखल अनिवार्य हो गया. आलम यह था कि बिना तय कमीशन दिए आम आदमी के लिए घर की एक ईंट लगाना भी दूभर हो गया. राहत राशि और आवास योजनाओं में 10 से 25 प्रतिशत तक 'कट मनी' की वसूली ने सीधे तौर पर गरीब जनता के हक पर डाका डाला. हालांकि ममता बनर्जी ने खुद सार्वजनिक मंचों से कार्यकर्ताओं को यह पैसा लौटाने की नसीहत दी थी, लेकिन तब तक इस कमीशनखोरी ने 'माटी और मानुष' के भरोसे को भीतर से खोखला कर दिया था.
बीजेपी की 'घेराबंदी' और आक्रामक रणनीति
बीजेपी ने बंगाल को सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि एक 'मिशन' के तौर पर लिया. 'बूथ स्तर' तक माइक्रो-मैनेजमेंट और केंद्र सरकार के कद्दावर मंत्रियों की फौज ने दीदी के गढ़ में चौबीसों घंटे घेराबंदी जारी रखी. बीजेपी ने ममता बनर्जी के 'मुस्लिम तुष्टिकरण' के नैरेटिव को इतनी मजबूती से स्थापित किया कि हिंदू मतों का एक बड़ा हिस्सा लामबंद हो गया. साथ ही, केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता ने टीएमसी के 'फाइनेंशियल और चुनावी तंत्र' की कमर तोड़ दी, जिससे दीदी इस बार अपनी पुरानी आक्रामकता नहीं दिखा सकीं.
संदेशखाली, आरजी कर और असुरक्षित 'दीदी' का किला
ममता बनर्जी का सबसे मजबूत आधार महिलाएं रही हैं, लेकिन संदेशखाली और फिर आरजी कर अस्पताल की वीभत्स घटना ने इस भरोसे की जड़ें हिला दीं. एक तरफ संदेशखाली में शेख शाहजहां और उसके समर्थकों पर महिलाओं के उत्पीड़न और जमीन हड़पने के आरोप लगे, तो दूसरी तरफ आरजी कर मेडिकल कॉलेज में महिला डॉक्टर के साथ हुई दरिंदगी और उसके बाद प्रशासनिक लीपापोती के आरोपों ने पूरे देश को झकझोर दिया. 'मां, माटी, मानुष' का नारा देने वाली सरकार जब अपनी ही बेटियों की सुरक्षा में विफल रही. इससे महिला मतदाताओं का वो बड़ा हिस्सा छिटक गया जो कभी दीदी का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच हुआ करता था.
पार्टी के भीतर आंतरिक कलह और बगावत
चुनाव से ठीक पहले और टिकिट वितरण के दौरान टीएमसी के भीतर पुराना बनाम नया (Old vs New Guard) की लड़ाई सतह पर आ गई. पार्टी के कई पुराने वफादारों ने अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव और कार्यशैली पर सवाल उठाए. सुवेंदु जैसे कई अहम नेताओं का पार्टी छोड़ना या निष्क्रिय हो जाना सांगठनिक कमजोरी का कारण बना, जिसका सीधा असर बूथ मैनेजमेंट पर दिखा. जाहिर है "कलकत्ता की सड़कों पर जिस 'स्ट्रीट फाइटर' ने खून बहाकर वामपंथ के अभेद्य किले को ढहाया था, आज उसी की सत्ता भ्रष्टाचार और सिस्टम की खामियों के बोझ तले दब गई. 2026 के ये नतीजे गवाह हैं कि सियासत में जब संघर्ष की जगह सत्ता का अहंकार ले लेता है, तो 'जायंट किलर' भी मात खा ही जाता है."
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