शनिवार को एक खबर आई...जिसने हर संवेदनशील इंसान को झकझोर दिया. हुआ ये था कि राजस्थान के सांचौर में 3 साल का मासूम अपनी मां की आंखों के सामने स्कॉर्पियो के नीचे आ गया. पूरी घटना CCTV में कैद हुई है...जिसके मुताबिक स्कॉर्पियो बच्चे को कुचलता रहा और मां चीखती रही...जब तक कुछ हो पाता बच्चा इस दुनिया को अलविदा कह चुका था. लेकिन सवाल सिर्फ सांचौर का नहीं है. पिछले महीनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से थार, स्कॉर्पियो और दूसरी बड़ी SUV से जुड़े ऐसे कई हादसे सामने आए हैं, जिनमें कहीं बच्चों की जान गई, कहीं राहगीर कुचले गए तो कहीं ओवरस्पीडिंग ने पूरे परिवार उजाड़ दिए. सवाल उठ रहा है कि आखिर सड़क पर बढ़ती 'रौब वाली ड्राइविंग' पर लगाम कौन लगाएगा?
थार वाले ने दिखाई पिस्तौल
अब एक उदाहरण से बात शुरू करते हैं. तारीख थी 20 सितंबर. गाजियाबाद के वसुंधरा स्थित एक अपार्टमेंट में मैं कुछ पड़ोसियों के साथ खड़ा था. तभी एक थार वहां पहुंची. चालक ने किसी का पता पूछा, जो उसे बता दिया गया. लेकिन आगे बढ़ते ही लोगों ने उससे अनुरोध किया कि गाड़ी बाहर खड़ी कर दें, क्योंकि संकरी सड़क पर थार खड़ी होने से रास्ता बंद हो जाएगा. मगर बात अनुरोध से विवाद तक पहुंच गई. चालक ने साफ कहा कि गाड़ी यहीं खड़ी होगी. बहस बढ़ी तो उसने कमर के पीछे खोंसी रिवॉल्वर निकालकर सामने रख दी. कुछ मिनट पहले तक जो लोग सामान्य बातचीत कर रहे थे, वे अचानक खामोश हो गए. बाद में एक पड़ोसी ने कहा, "समस्या गाड़ी की नहीं है, समस्या उस सोच की है जिसमें कुछ लोग सड़क को अपनी जागीर समझने लगते हैं." यही वह मानसिकता है जो आज देशभर में बहस का विषय बन रही है. क्योंकि जब सड़क पर कानून से ज्यादा रौब बोलने लगे, तब हादसे सिर्फ दुर्घटनाएं नहीं रह जाते, वे सामाजिक समस्या बन जाते हैं. आगे बढ़ने से पहले देश भर में हाल में हुए ऐसे ही हादसों पर निगाह डाल लेते हैं

समस्या गाड़ी नहीं, मानसिकता है
देखा जाए तो सड़क सुरक्षा एक्सपर्ट्स लगातार कहते रहे हैं कि थार, स्कॉर्पियो, फॉर्च्यूनर या दूसरी बड़ी SUV अपने आप में खतरनाक नहीं हैं. असली समस्या उस मानसिकता की है, जिसमें वाहन को सिर्फ आने-जाने का साधन नहीं, बल्कि सड़क पर ताकत, दबदबा और वर्चस्व दिखाने का हथियार मान लिया जाता है. ऊंची सीटिंग, ज्यादा पावर और विशाल आकार वाली गाड़ियां कई बार चालकों के भीतर ऐसा आत्मविश्वास पैदा कर देती हैं, जो लापरवाही में बदल जाता है. नतीजा यह होता है कि ओवरस्पीडिंग, गलत ओवरटेक, स्टंटबाजी और हिट एंड रन जैसे मामले बढ़ने लगते हैं. आगे बढ़ने से पहले देश में होने वाले सड़क हादसों के आंकड़ों पर भी निगाह मार लेते हैं.

भारत के जाने-माने ऑटो विशेषज्ञ हॉर्मजद सोराबजी कई मौकों पर कह चुके हैं कि सड़क पर सबसे बड़ी चुनौती वाहन नहीं, बल्कि चालक का व्यवहार है. उनके मुताबिक आधुनिक गाड़ियों में सुरक्षा फीचर्स लगातार बढ़े हैं, लेकिन यदि चालक नियमों को महत्व नहीं देता तो कोई तकनीक हादसा नहीं रोक सकती. इसी तरह सड़क सुरक्षा मामलों पर लंबे समय से काम कर रहे रोहित बलूजा भी कहते हैं कि भारत में बड़ी समस्या "स्पीड की सामाजिक स्वीकार्यता" है. लोगों को लगता है कि तेज चलाना ड्राइविंग स्किल का प्रमाण है, जबकि हकीकत में यही सोच सबसे ज्यादा जान लेती है.
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बड़ा सवाल: चालान काफी हैं या अब सख्ती की जरूरत?
सांचौर के 3 साल के मासूम की मौत हो या हाल के महीनों में देशभर से सामने आए थार, स्कॉर्पियो और दूसरी SUV से जुड़े हादसे, लगभग हर घटना के बाद एक ही बहस छिड़ जाती है. क्या सिर्फ एफआईआर दर्ज कर देना और कुछ हजार रुपये का चालान काट देना पर्याप्त है? क्या बार-बार ओवरस्पीडिंग, खतरनाक ड्राइविंग या हिट एंड रन में पकड़े जाने वालों का लाइसेंस लंबे समय के लिए निलंबित या रद्द होना चाहिए?यही वजह है कि कई विशेषज्ञ सिर्फ चालान की जगह कड़े लाइसेंस प्वाइंट सिस्टम, अनिवार्य ड्राइविंग काउंसलिंग, दोहराने वाले आरोपियों के लाइसेंस निलंबन और हिट एंड रन मामलों में सख्त कानूनी कार्रवाई की वकालत करते हैं. क्योंकि हादसों के बाद SUV का बोनट तो बदल जाता है, लेकिन जिन घरों के चिराग बुझते हैं, वहां की जिंदगी कभी पहले जैसी नहीं हो पाती.
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