- तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में पहली बार चुनाव लड़ रही विजय की पार्टी टीवीके ने 109 सीटों पर बढ़त बनाई है
- सत्ताधारी डीएमके केवल 61 सीटों पर सीमित नजर आ रही है और मुख्यमंत्री एमके स्टालिन हार गए हैं
- कोलाथुर सीट पर टीवीके के वीएस बाबू ने मुख्यमंत्री स्टालिन को 8,795 वोटों से पराजित किया है
तमिलनाडु में जो हुआ, उसकी शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी टीवीके ने हैरान कर दिया है. पहली बार चुनाव लड़ रही टीवीके तमिलनाडु की 234 में से 109 सीटों पर आगे चल रही है. सत्ताधारी डीएमके 61 सीटों पर सिमटती दिख रही है. तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव में एक्टर विजय की ऐसी आंधी चली कि बड़े-बड़े नेता अपनी साख नहीं बचा पाए.
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन भी हार गए हैं. कोलाथुर सीट डीएमके का गढ़ रही है. यहां से स्टालिन तीन बार से विधायक थे. परिसीमन के बाद 2011 में इस सीट पर पहली बार चुनाव हुए थे और उस वक्त स्टालिन ने AIADMK के सैदाई दुरईसामी को 2,734 वोटों से हराया था. 2016 और 2021 में जीत का अंतर कहीं ज्यादा बड़ा था. 2016 में स्टालिन ने 37,730 और 2021 में 70,384 वोटों से जीत हासिल की. यह दिखाता है कि कोलाथुर किस तरह से स्टालिन और डीएमके का गढ़ थी.
लेकिन इस बार पासा पलट गया. कोलाथुर सीट से टीवीके के वीएस बाबू ने स्टालिन को 8,795 वोटों से हरा दिया.
हराने वाले पुराने साथी
जिस वीएस बाबू ने स्टालिन को हराया है, वह कभी उनके ही साथी थे. 2011 के विधानसभा चुनाव में डीएमके ने स्टालिन को थाउजेंड लाइट्स विधानसभा से हटाकर कोलाथुर में भेजा.
कोलाथुर में स्टालिन जीत भले ही गए लेकिन यहां उनका मुकबला उम्मीद से कहीं ज्यादा कड़ा रहा. खासकर उस व्यक्ति के लिए जिसे पार्टी के अगली पीढ़ी के बॉस के तौर पर तैयार किया जा रहा था. स्टालिन के चुनाव प्रचार की कमान जिस व्यक्ति ने संभाली थी, उसका नाम था- वीएस बाबू.
2011 तक वीएस बाबू जिला प्रभारी थे. लेकिन उस चुनाव में स्टालिन के कड़े मुकाबले के लिए वीएस बाबू को ही जिम्मेदार ठहराया गया. नतीजा ये हुआ कि डीएमके ने वीएस बाबू को उनके पद से हटा दिया और उनकी जगह पीके शेखर बाबू को पार्टी का उत्तरी चेन्नई जिला प्रमुख बनाया गया.
#WAYCJ | TVK leader VS Babu defeats Tamil Nadu CM MK Stalin to win the Kolathur constituency seat in the state assembly elections 2026. pic.twitter.com/BM7HkFHURd
— ANI (@ANI) May 4, 2026
AIADMK और फिर TVK आए
2006 में वीएस बाबू ने डीएमके की टिकट पर पुरासवलकम सीट से चुनाव जीता. वीएस बाबू कई सालों तक स्टालिन और डीएमके के बड़े नेता रहे. लेकिन 2011 में जिस तरह से उन्हें उनके पद से हटाया गया, वह उनके लिए आहत करने वाला था.
पद से हटने के बाद भी कई साल तक वीएस बाबू डीएमके में रहे लेकिन जून 2016 में वह उसे छोड़कर AIADMK में आ गए. फरवरी 2026 में वह AIADMK को छोड़कर विजय की पार्टी TVK में आ गए.
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विजय ने द्रविड़ियन द्वंद्व को तोड़ दिया
विजय की पार्टी 'तमिलगा वेट्री कज़गम' (TVK) इस चुनाव में एक ऐसे अप्रत्याशित दावेदार के तौर पर उतरी, जिसका मुकाबला द्रविड़ियन राजनीति की दो बड़ी ताक़तों - DMK और AIADMK से था. यह एक ऐसा राज्य है जहां पिछले छह दशकों से किसी भी दूसरी पार्टी को वोट नहीं मिला था. आखिरी बार ऐसा 1962 में हुआ था, जब के. कामराज के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी ने जीत हासिल की थी. उसके बाद से, DMK और AIADMK ही बारी-बारी से चुनाव जीतती रही हैं और सरकारें बनाती रही हैं.
मुख्यमंत्री MK स्टालिन और उनकी पार्टी 'द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम' (DMK) को व्यापक रूप से इस चुनाव का सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा था.
इसकी मुख्य वजह यह थी कि इस पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में जबरदस्त जीत हासिल की थी. 2019 में 38 सीटें और 2024 में सभी 39 सीटें. इसके अलावा, 2021 के विधानसभा चुनावों में भी उन्होंने AIADMK को बुरी तरह हराया था, और कुल 234 विधानसभा सीटों में से 159 सीटों पर जीत दर्ज की थी.
वहीं दूसरी ओर, 'ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम' (AIADMK) - जो दिसंबर 2016 में अपनी कद्दावर नेता जे. जयललिता के निधन के बाद से ही नेतृत्वविहीन हो गई थी - ऐसा लग रहा था कि वह अभी भी खुद को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रही है. इस दौरान, पूर्व मुख्यमंत्री एडप्पादी के. पलानीस्वामी के नेतृत्व कौशल पर भी कई सवाल उठ रहे थे.
लेकिन, इसके बावजूद यह माना जा रहा था कि कमज़ोर पड़ चुकी AIADMK भी विजय और उनकी पार्टी TVK के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती साबित होगी.
ऐसा लग रहा था कि DMK के लिए लगातार दूसरी बार सत्ता में आने का रास्ता पूरी तरह साफ हो चुका है. पिछले हफ्ते मुख्यमंत्री स्टालिन का आत्मविश्वास देखते ही बन रहा था, जब उन्होंने कहा था: "हमारी जीत में कोई शक नहीं है. मैं यह बात किसी 'एग्जिट पोल' के आधार पर नहीं कह रहा हूं, बल्कि अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के उत्साह और भावनाओं को देखकर कह रहा हूं."
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