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पश्चिम बंगाल में बीजेपी की 'शांत सुनामी' जिसमें ममता बनर्जी तृणमूल बह गई, ऐसे लिखी गई जीत की पटकथा

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी 200 से अधिक सीटें जीतती हुई नजर आ रही है. यह इस राज्य बीजेपी की अब तक की सबसे बड़ी जीत है. इस जीत के कारणों की समीक्षा कर रहे हैं अजीत कुमार झा.

पश्चिम बंगाल में बीजेपी की 'शांत सुनामी' जिसमें ममता बनर्जी तृणमूल बह गई, ऐसे लिखी गई जीत की पटकथा
नई दिल्ली:

पश्चिम बंगाल हमेशा से ऐसा स्थान रहा है जिसे किसी एक ताकत, विचारधारा या एक ही कहानी में समेटा नहीं जा सकता है. वहां का माहौल ही अलग है, जहां एक साथ कविता और नीतियां, विरोध और आस्था साथ-साथ चलते हैं. इसलिए जब बीजेपी बंगाल के चुनाव में बड़ी जीत हासिल करती है, तब ऐसा लगता है कि उसका प्रभाव पूरे राज्य में तेजी से फैल रहा है. शुरू में लोग इसे राजनीति के सामान्य कारणों से जोड़ते हैं, जैसे गठबंधन, रणनीति और रैलियों का असर. लेकिन भारत में राजनीति सिर्फ रणनीति तक सीमित नहीं होती, यह लोगों के माहौल और सोच (क्लाइमेट) का भी हिस्सा होती है.

बदलाव के लिए बड़ा जनादेश

इस बड़े बदलाव में बीजेपी ने बंगाल चुनाव में 200 से अधिक सीटें जीतती हुई नजर आ रही है. यह एक बहुत बड़ा बदलाव है, क्योंकि पहले तक पार्टी बंगाल की राजनीति में गहराई से जगह नहीं बना पाई थी. विपक्ष के कई नेताओं का मानना था कि बीजेपी सिर्फ हिंदी पट्टी की पार्टी है और वह 'हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान' तक ही सीमित रहेगी, इसलिए बंगाल में वह कभी स्थायी नहीं बन पाएगी. लेकिन अब एक बड़ी लहर आई है. यह सिर्फ चुनावी जीत नहीं, बल्कि लोगों की सोच में बदलाव भी है. इसे एक 'शांत सुनामी' भी कहा जा सकता है.

NDTV के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, बीजेपी का वोट शेयर 2021 के 38 फीसदी से बढ़कर 2026 में करीब 47 फीसदी हो गया है, यानी करीब आठ फीसदी की बढ़ोतरी. वहीं, टीएमसी जो पहले बहुत मजबूत थी, उसकी सीटें 2021 में 215 से घटकर करीब 85 रह गई हैं. उसका वोट फीसदी भी 48 फीसदी से घटकर 42.75 फीसदी हो गया है. यह सिर्फ हार नहीं है, बल्कि सत्ता और समर्थन का एक बड़ा बदलाव है.

यह संख्या (आंकड़े) अपने आप में ठंडे लगते हैं, लेकिन जब ये एक पैटर्न बनाते हैं, तब बदलाव इतना बड़ा होता है कि जमीन हिलती हुई महसूस होती है. यह लोगों के मूड और सोच में आए बदलाव को दिखाती है, जिसे सीधे-सीधे मापा नहीं जा सकता है.

दिल्ली में बीजेपी के राष्ट्रीय मुख्यालय में पश्चिम बंगाल और असम में मिली पार्टी की जीत का जश्न मनाती एक महिला कार्यकर्ता.

दिल्ली में बीजेपी के राष्ट्रीय मुख्यालय में पश्चिम बंगाल और असम में मिली पार्टी की जीत का जश्न मनाती एक महिला कार्यकर्ता.

बंगाल में भगवा लहर क्यों आई? 

बंगाल में बीजेपी की इतनी बड़ी जीत क्यों हुई? इसका पहला और सबसे बड़ा कारण था सत्ता विरोधी लहर. लगातार तीन कार्यकाल तक तृणमूल कांग्रेस सिर्फ सरकार नहीं रही, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई. उसकी उपलब्धियां लोगों को याद रहीं, लेकिन कमियां और अधूरे वादे भी बार-बार सामने आते रहे. लोकतंत्र में समय के साथ यही होता है, जो पहले स्थिरता लगता है, वही बाद में ठहराव जैसा महसूस होने लगता है. जो पहले प्रगति लगता है, वह धीरे-धीरे सिर्फ निराशा को संभालने जैसा दिखने लगता है.

मतदाता हमेशा इसलिए पार्टी नहीं बदलते कि उन्हें नई पार्टी से बहुत प्यार हो गया है, बल्कि कई बार इसलिए बदलते हैं क्योंकि वे पुरानी व्यवस्था और कहानी से थक चुके होते हैं. दूसरा बड़ा कारण था चुनाव के दौरान भारी संख्या में केंद्रीय सुरक्षा बलों की मौजूदगी. जब लोगों को लगता है कि डर और दबाव को नियंत्रित किया जा सकता है, तो भय की जगह उम्मीद ले लेती है.यह चुनाव सिर्फ इस बात पर नहीं था कि कौन अपनी बात कहेगा, बल्कि इस पर भी था कि क्या अपनी बात कहना और वोट देना सुरक्षित होगा.

भारत जैसे देश में, जहां राजनीति और व्यक्तिगत जीवन अक्सर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं, सुरक्षा की भावना वोटिंग के फैसले को बदल देती है. जो लोग पहले हिचकिचा रहे थे, वे आगे आए, इस भरोसे के साथ कि उनका वोट सच में मायने रखता है. इसके बाद जो नजर आया, वह बड़ी संख्या में मतदाताओं का मतदान केंद्रों पर पहुंचना था, लगभग एक सामूहिक भागीदारी जैसा दृश्य. मतदाताओं की अंदरूनी खुशी मतदान के आंकड़ों में दिखी. 23 अप्रैल को पहले चरण में 93.16 फीसदी मतदान हुआ, जो अब तक का सबसे ज्यादा था. दूसरे चरण में 29 अप्रैल को दक्षिण-पूर्व बंगाल की 142 सीटों पर 91 फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ. पूरे राज्य में औसतन 92 फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ. यह सिर्फ राज्य ही नहीं, बल्कि पूरे देश का सबसे ज्यादा मतदान था.

बीजेपी पश्चिम बंगाल के चुनाव में 200 से अधिक सीटें जीतती हुई नजर आ रही है.

बीजेपी पश्चिम बंगाल के चुनाव में 200 से अधिक सीटें जीतती हुई नजर आ रही है.

बीजेपी को मिला महिलाओं का साथ

इस बार लोकतंत्र एक रस्म से कम और एक जरूरी प्रतिक्रिया जैसा ज्यादा लगा, जैसे पूरा समाज एक साथ आगे बढ़ रहा हो क्योंकि उसे लगा कि यह समय बहुत अहम है.मतदान के पीछे सिर्फ रणनीति नहीं, बल्कि एक बड़ा बदलाव भी था. 2021 में ज्यादातर महिलाओं ने टीएमसी का समर्थन किया था, लेकिन 2026 में उन्होंने अपना रुख बदल दिया. महिलाओं ने महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे पर, खासकर 2024 में आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना के बाद हुए बड़े विरोध प्रदर्शनों के कारण.

इतिहास बताता है कि दुखद घटनाएं सीधे वोट में नहीं बदलतीं, लेकिन वे लोगों की सोच बदल देती हैं. जब लोगों को लगता है कि सरकार सुरक्षा देने में असफल रही है, तो वे सिर्फ नीतियों के लिए नहीं, बल्कि सम्मान के लिए भी वोट करते हैं. बीजेपी ने अपने प्रचार में शिकायत के बजाय वादे की भाषा अपनाई, 'परिवर्तन' से 'सोनार बंगला' तक.'सोनार' सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि यह विश्वास है कि बंगाल फिर से आगे बढ़ सकता है और रुकी हुई उम्मीदों से बाहर निकल सकता है.

बीजेपी ने किन मुद्दों को दी हवा

प्रधानमंत्री मोदी ने टीएमसी के 15 साल के शासन को 'महा जंगलराज' बताते हुए कानून-व्यवस्था, लापरवाही और आर्थिक ठहराव के मुद्दे उठाए. बीजेपी ने डबल इंजन सरकार का वादा किया, जिससे उद्योग बढ़ें, नौकरियां बनें और युवाओं को मौके मिलें. सीमावर्ती इलाकों में 'घुसपैठ' (बांग्लादेश से अवैध लोगों का आना) भी बड़ा मुद्दा रहा, क्योंकि वहां के लोगों के लिए यह रोजगार, पहचान और सुरक्षा से जुड़ा सवाल है. शहरों में भी लोगों की समस्याओं को मुद्दा बनाया गया. कोलकाता की खराब सड़कों और ट्रैफिक (लगभग 17.4 किमी/घंटा की गति) को लेकर सरकार पर सवाल उठाए गए.

यहां दोनों पार्टियों के प्रचार में साफ फर्क दिखा. टीएमसी ने निराशा पर जोर दिया, जबकि बीजेपी ने उम्मीद और बदलाव की बात की. निराशा लोगों से सहने को कहती है, जबकि उम्मीद उन्हें कुछ करने के लिए प्रेरित करती है. बीजेपी को एसआईआर (मतदाता सूची संशोधन) का भी फायदा मिला. इससे लोगों का भरोसा बढ़ा कि चुनाव निष्पक्ष हैं.

पश्चिम बंगाल में बीजेपी की इस जीत के साथ ही ममता बनर्जी के 15 साल के शासन का अंत हो गया है.

पश्चिम बंगाल में बीजेपी की इस जीत के साथ ही ममता बनर्जी के 15 साल के शासन का अंत हो गया है.

इन सब कारणों सत्ता विरोध, थकान, बदलाव की उम्मीद ने मिलकर एक खामोश लेकिन मजबूत लहर पैदा की. इस जीत के बाद बीजेपी का प्रभाव गुजरात से लेकर असम तक फैल गया. असम में उसने लगातार तीसरी बार जीत हासिल की है. बंगाल के लोग हमेशा समझदार माने जाते हैं, उन्हें प्रभावित करना आसान नहीं होता है. अगर यहां इतना बड़ा बदलाव आया है, तो इसका मतलब है कि लोगों ने सिर्फ पार्टी नहीं, बल्कि भविष्य के लिए नई सोच चुनी है. भारत में कोई भी लहर सिर्फ लहर नहीं होती, बल्कि यह बताती है कि समाज अब क्या सहन कर सकता है और किसके लिए अब इंतजार नहीं करना चाहता. इस बार बंगाल ने शांत तरीके से, बड़ी संख्या में और पूरी स्पष्टता के साथ बदलाव को चुना है.

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