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लोकसभा और विधानसभा सीटों के परिसीमन का काम अगले साल शुरू होने की संभावना है. उम्मीद की जा रही है कि इससे तमिलनाडु और दक्षिण भारत के दूसरे राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या में बदलाव हो सकता है. इस संभावित नुकसान को देखते हुए तमिलनाडु में सत्तारूढ़ डीएमके ने विरोध शुरू कर दिया है. हालांकि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने दक्षिण भारत के राज्यों को आश्वस्त करते हुए कहा है कि 2026 के बाद होनी वाली जनगणना के आधार पर होने वाले परिसीमन में दक्षिण भारत के किसी भी राज्य की सीटें कम नहीं होंगीं. उन्होंने साफ किया कि कम जनसंख्या के बाद भी परिसीमन में दक्षिण भारत के राज्यों में लोकसभा की सीटें भी उत्तर भारत के राज्यों के अनुपात में ही बढ़ाई जाएंगी.शाह के आश्वासन के बाद भी परिसीमन को लेकर दक्षिण भारत का भय कम नहीं हुआ है. आइए जानते हैं कि क्या है परिसीमन, यह कब कराया जाता है, इससे बदलता क्या है और दक्षिण भारत के राज्यों का डर कितना जायज है.
परिसीमन पर तमिलनाडु की सीटें कम होने की आशंका के बाद मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने अगले हफ्ते मंगलवार को सर्वदलीय बैठक बुलाई है. स्टालिन की पार्टी डीएमके को लगता है कि जनसंख्या नियंत्रण पर मिली उसकी सफलता की वजह से लोकसभा में तमिलनाडु की सीटें कम हो जाएंगी. उसे लगता है कि उत्तर भारत जहां जनसंख्या तेजी से बढ़ी है, वहां लोकसभा की सीटों में बेतहाशा बढ़ोतरी होगी. इससे लोकसभा में तमिलनाडु समेत दक्षिण भारत की आवाज कमजोर पड़ेगी. डीएमके का कहना है कि यह मामला पूरे तमिलनाडु से जुड़ा हुआ है, इसलिए इस मामले पर राजनीतिक दलों को आगे आकर इस पर अपनी बात रखनी चाहिए.
Union Home Minister Amit Shah targets Tamil Nadu government over delimitation
— NDTV (@ndtv) February 26, 2025
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परिसीमन आयोग क्या है?
परिसीमन से आशय लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमा का निर्धारण करने की प्रक्रिया से है.परिसीमन के जरिए ही लोकसभा और विधानसभाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए सीटों को आरक्षित किया जाता है. परिसीमन के लिए एक आयोग का गठन किया जाता है. इस आयोग को परिसीमन आयोग के नाम से जाना जाता है. भारत में अब तक चार बार परिसीमन आयोग का गठन किया गया है. साल 1952 में परिसीमन आयोग अधिनियम, 1952 के तहत, 1963 में परिसीमन आयोग अधिनियम, 1962 के तहत, 1973 में परिसीमन अधिनियम, 1972 और 2002 में परिसीमन अधिनियम, 2002 के तहत. परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून के तहत जारी किया गया है. इन्हें किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है. ये आदेश राष्ट्रपति की ओर से किसी नियत तारीख से लागू किए जाते हैं. इसके आदेशों की प्रतियां लोकसभा और राज्य विधानसभा के पटल पर रखी जाती हैं, लेकिन उनमें किसी तरह का संशोधन नहीं किया जा सकता है.
संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के तहत हर जनगणना के बाद लोकसभा और विधानसभा की सीटों की संख्या और उनकी सीमा का निर्धारण किया जाता है. यह काम जनगणना के आंकड़ों के आधार पर किया जाता है.इस समय संसद और विधानसभाओं में सीटों की संख्या 1971 की जनगणना पर आधारित है. इसलिए लोकसभा में सीटों की संख्या 543 और राज्य सभा में सीटों की संख्या 250 ही है.
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परिसीमन और एससी-एसटी आरक्षण
साल 2001 की जनगणना के आधार पर 2007 में पूरे हुए परिसीन के बाद लोकसभा एससी-एसटी के लिए आरक्षित सीटों की संख्या बदल गई. इस समय लोकसभा में अनुसूचित जाति (एससी) के लिए 84 और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए 47 सीटें आरक्षित हैं. इससे पहले लोकसभा में एससी के लिए 71 और एसटी के लिए 41 सीटें आरक्षित थीं.
अगली जनगणना के बाद लोकसभा और विधानसभा सीटों का परिसीमन होना है. इससे राज्यसभा की सीटों संख्या में भी बदलाव होगा. भारत में अंतिम जनगणना 2011 में कराई गई थी. अगली जनगणना 2021 में प्रस्तावित थी. लेकिन कोरोना महामारी की वजह से वह नहीं हो सकी.सरकार ने हालांकि अभी यह नहीं बताया है कि अगली जनगणना कब होगी. सरकार ने पिछले साल अक्टूबर में रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त मृत्युंजय कुमार नारायण की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति को अगस्त 2026 तक के लिए बढ़ा दिया था. इसके बाद कयास लगाए जाने लगे थे कि सरकार 2025 में जनगणना का काम शुरू कर सकती है. इसके 2026 तक चलने का अनुमान लगाया गया था. राजनीतिक विश्लेषकों को उम्मीद है कि परिसीमन का काम 2028 में शुरू हो सकता है. इसी परिसीमन के बाद संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को आरक्षण भी दिया जाना है. इसलिए इसी परिसीमन में महिला सीटों का भी आरक्षण तय किया जाएगा.
भारत में परिसीमन का इतिहास
भारत में 1976 तक परिसीमन की कार्रवाई हर जनगणना के बाद होती थी. इसमें लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा में सीटों की संख्या में बदलाव होता था. ऐसा 1951, 9161 और 1971 की जनगणना के बाद तक हुआ. लेकिन देश में लगे आपातकाल के दौरान हुए 42वें संविधान संशोधन के बाद संसद और विधानसभाओं में सीटों को 2001 तक के लिए स्थिर कर दिया गया. इसका मकसद यह था कि अधिक जन्मदर वाले राज्य संसद और विधानसभा में अपनी सीटों को गंवाए बिना परिवार नियोजन की योजनाओं को लागू कर सकें. साल 2001 की जनगणना के बाद हुए परिसीमन में लोकसभा और विधानसभा की सीटों की सीमा तो बदली लेकिन उनकी संख्या में बदलाव नहीं हुआ.ऐसा दक्षिण के राज्यों के विरोध की वजह से हुआ था. वहीं साल 2001 में हुए 84वें संविधान संशोधन के बाद 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक के लिए परिसीमन को रोक दिया गया.
साल 1951 की जनगणना के आधार पर हुए परिसीमन के बाद लोकसभा में सीटों की संख्या 494 हो गई थी. इसमें प्रति सीट जनसंख्या का अनुपात 7.3 लाख प्रति सीट रखा गया था. वहीं 1961 की जनगणना के आधार पर हुए परिसीमन में सीटों की संख्या 522 हो गई. इसमें प्रति सीट जनसंख्या का अनुपात 8.4 लाख प्रति सीट रखा गया था. वहीं 1971 की जनगणना के बाद हुए परिसीमन के बाद लोकसभा में सीटों की संख्या 543 हो गई थी. इसमें प्रति सीट जनसंख्या का अनुपात 10.1 लाख प्रति सीट रखा गया था. इसके बाद 2001 की जनगणना के आधार पर हुए परिसीमन में लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाएं और एससी-एसटी को मिलने वाला आरक्षण में बदलाव तो हुआ, लेकिन सीटों की संख्या में कोई बदलाव नहीं हुआ.
दक्षिण भारत की चिंता कितनी जायज
तमिलनाडु समेत दक्षिण भारत के राज्य अपनी कम जनसंख्या दर की वजह से चिंतित हैं. उन्हें डर है कि अगर सरकार ने जनसंख्या के आधार पर ही परिसीमन करवाया तो उन्हें उत्तर भारत के राज्यों की तुलना में सीटों का नुकसान उठाना पड़ सकता है. दरअसल दक्षिण भारत में जनगणना की वृद्धि उत्तर भारत की तुलना में कम है. इसी की ध्यान में रखते हुए तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने 25 फरवरी को एक ट्वीट किया. इसमें उन्होंने लिखा कि परिसीमन से केवल तमिलनाडु को ही नुकसान नहीं होगा, बल्कि इसका असर पूरे दक्षिण भारत पर पड़ेगा. उन्होंने कहा है कि एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया से उन राज्यों को प्रताड़ित नहीं करना चाहिए जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया है, विकास किया और राष्ट्र के विकास में योगदान दिया है. हमें एक निष्पक्ष, पारदर्शी और न्यायसंगत नजरिए की जरूरत है जो संघवाद को सही मायने में कायम रखे.
Delimitation isn't just about Tamil Nadu—it affects all of South India. A democratic process should not penalise states that have successfully managed population growth, led in development, and made significant contributions to national progress. We need a fair, transparent, and… pic.twitter.com/h1QW6LQK0b
— M.K.Stalin (@mkstalin) February 25, 2025
परिसीमन के बाद लोकभा में अपने सीटों की संख्या कम होने की आशंका तमिलनाडु बहुत पहले से जता रहा है. सितंबर 2023 में संसद में महिला आरक्षण पर बहस हुई थी.इसमें डीएमके की कनिमोझी ने एमके स्टालिन के हवाले से कहा था कि अगर परिसीमन जनसंख्या के आधार पर हुआ तो इससे दक्षिण भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा. उन्होंने कहा था कि तमिलानाडु के लोगों के मन में यह भय है कि उनकी आवाज कमजोर पड़ जाएगी.
दक्षिण भारत की चिंता का कारण क्या है
सरकार ने परिसीमन की दिशा में अभी कोई कदम नहीं उठाया है. इसके बाद भी दक्षिण भारत के राज्य अभी से सीटें कम होने की आशंका जता रहे है. हालांकि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने उन्हें यह कहकर आश्वस्त करने की कोशिश की है कि परिसीमन से किसी राज्य की सीटें कम नहीं होंगी.उन्होंने कहा है कि कम जनसंख्या के बाद भी परिसीमन में दक्षिण भारत के राज्यों में लोकसभा की सीटें भी उत्तर भारत के राज्यों के अनुपात में ही बढ़ाई जाएंगी. शाह दक्षिण भारत के राज्यों को आश्वस्त तो कर रहे हैं. लेकिन पीएम नरेंद्र मोदी एक अलग ही चिंता जता चुके हैं. पीएम मोदी ने तीन अक्तूबर 2023 को तेलंगाना में आयोजित एक रैली में कहा था कि दक्षिण भारत के राज्यों को 100 लोकसभा सीटों का नुकसान हो सकता है. उन्होंने यह बात कांग्रेस के 'जितनी आबादी, उतना हक' के नारे पर हमला करते हुए कही थी. कांग्रेस जाति जनगणना के समर्थन में यह बात कह रही है. पीएम मोदी ने कांग्रेस को अल्पसंख्यक और दक्षिण भारत के राज्यों का विरोधी बताया था.
I will keep working for the welfare of the poor. pic.twitter.com/iJXRo4ybwl
— Narendra Modi (@narendramodi) October 3, 2023
संसद के नए भवन को मई 2023 में राष्ट्र को समर्पित किया गया था. संसद के नए भवन में लोकसभा में 888 सदस्यों और राज्यसभा में 384 सदस्यों के बैठने की व्यवस्था है. इसलिए परिसीमन में लोकसभा के सदस्यों की संख्या 888 से अधिक नहीं होने का अनुमान है.
कितना हो सकता है लोकसभा की सीटों में बदलाव
साल 2026 तक भारत की जनसंख्या एक अरब 41 करोड़ होने का अनुमान है. ऐसे में अगर सरकार जनसंख्या प्रति सीट के अनुपात के फार्मूले को अपनाती है और जनसंख्या अनुपात को 10.1 लाख से बढ़ाकर 20 लाख कर देती है तो लोकसभा में 750 से अधिक सीटें हो जाएंगीं. इस फार्मूले पर तमिलनाडु को दो सीटों का फायदा हो सकता है. लेकिन इस फार्मूले से दक्षिण भारत के केरल को एक सीट का नुकसान हो सकता है. केरल में अभी लोकसभा की 20 सीटें हैं, जो परिसीमन के बाद घटकर 19 हो सकती हैं. वहीं दक्षिण भारत में इसका सबसे अधिक फायदा कर्नाटक को मिल सकता है. कर्नाटक में अभी लोकसभा की 28 सीटें हैं. परिसीमन के बाद कर्नाटक में लोकसभा के सीटों की संख्या 36 हो सकती है.
वर्तमान में लोकसभा में दक्षिण भारत के राज्य तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक की कुल 129 सीटें हैं. लोकसभा की 543 सीटों में दक्षिण भारत की प्रतिनिधित्व करीब 24 फीसदी का है. वहीं अगर 20 लाख जनसंख्या प्रति सीट का फार्मूला अपनाया गया तो 750 सदस्यों वाली लोकसभा में दक्षिण भारत के राज्यों की 144 सीटें हो जाएंगी. यह करीब 19 फीसदी होगा. जबकि वर्तमान लोकसभा में दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व करीब 24 फीसदी है. इस तरह दक्षिण भारत के प्रतिनिधित्व में पांच फीसदी की गिरावट आएगी. वहीं इसके उलट उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक बढ़ोतरी देखी जा सकती है. वहां लोकसभा सीटों की संख्या 80 से बढ़कर 128 हो सकती है. उत्तर प्रदेश में अभी भी लोकसभा की सबसे अधिक 80 सीटें हैं. वहीं बिहार में लोकसभा के सीटों की संख्या 40 से बढ़कर 70 हो जाएंगी. इसी तरह मध्य प्रदेश के सीटों की संख्या 29 से बढ़कर 47 हो जाएगी. महाराष्ट्र में लोकसभा सीटों की संख्या 25 से बढ़कर 44 हो सकती है.
लोकसभा में दक्षिण भारत का कम होता प्रतिनिधित्व ही, तमिलनाडु और दक्षिण भारत के दूसरे राज्यों की चिंता का प्रमुख कारण है. यही कारण है कि स्टालिन की बात का तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों के नेताओं ने समर्थन किया है. लेकिन उनकी आशंका सही साबित होती हैं या गलत इसके लिए हमें तबतक का इंतजार करना होगा, जब तक कि सरकार परिसीमन आयोग का गठन नहीं कर देती है और उसकी रिपोर्ट नहीं आ जाती है.
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