- तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में विजय की पार्टी TVK ने 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी का स्थान प्राप्त किया है.
- राज्यपाल ने टीवीके को सरकार बनाने का न्योता नहीं दिया है, जिससे राजनीतिक विवाद और संवैधानिक बहस छिड़ी है.
- हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब हंग एसेंबली में राज्यपाल ने ऐसे फैसले लिए हो. जानिए पहले कब-कब ऐसा हुआ?
Tamil Nadu Govt Formation: तमिलनाडु में नई सरकार के गठन को लेकर गजब की खींचतान मची है. अभिनेता से राजनेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कषगम (TVK) ने 108 सीटों पर जीत तो हासिल कर ली, लेकिन बहुमत का आंकड़ा हासिल नहीं कर सके. दो बार राज्यपाल से मिलने से बाद भी उन्हें सरकार बनाने का न्योता नहीं दिया गया. इस बीच अब चर्चा है कि 50 साल की सियासी लड़ाई को भूलकर DMK और AIADMK सरकार बना सकती है. इस बीच राज्यपाल द्वारा सबसे बड़ी पार्टी को सरकार नहीं बनाने का न्योता दिए जाने को लेकर भी कई तरह की चर्चाएं चल रही है.
सरकार गठन के लिए नहीं बुलाए जाने पर बंटी है एक्सपर्ट की राय
हालांकि सरकार गठन के लिए आमंत्रित किए जाने में कथित देरी पर संवैधानिक कानून विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है. कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि राज्यपाल को यह जानने का अधिकार है कि प्रथम दृष्टया TVK के पास बहुमत है या नहीं. वहीं, कुछ अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि राज्यपाल के पास विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी TVK को सरकार गठन के लिए आमंत्रित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.
तमिलनाडु में 108 सीटों पर जीत कर टीवीके सबसे बड़ी पार्टी
TVK तमिलनाडु की 238 सदस्यीय विधानसभा के लिए हाल में संपन्न चुनावों में 108 सीट पर जीत के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. 5 सीट जीतने वाली कांग्रेस ने भी TVK के समर्थन की घोषणा की है. हालांकि, पार्टी के पास अकेले दम पर सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्या बल (118 सदस्यों का समर्थन) अभी भी नहीं है.

तमिलनाडु में किस पार्टी को कितनी सीटें मिली.
TVK प्रमुख विजय ने पिछले 24 घंटे में राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर से दो बार मुलाकात कर सरकार बनाने का निमंत्रण देने का अनुरोध किया है. हालांकि, टीवीके को अभी तक सरकार गठन का निमंत्रण नहीं दिया गया है.
गोवा विधानसभा चुनाव (2017)
हंग एसेंबली के मामले में गोवा का यह उदाहरण भारतीय राजनीति का सबसे चर्चित उदाहरण है. तब गोवा में कांग्रेस 17 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, जबकि भाजपा के पास केवल 13 सीटें थीं. लेकिन तत्कालीन राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने कांग्रेस को न्योता देने के बजाय भाजपा को सरकार बनाने के लिए बुलाया, क्योंकि भाजपा ने क्षेत्रीय दलों (MGP और GFP) के साथ मिलकर बहुमत का जादुई आंकड़ा पेश कर दिया था.

मणिपुर विधानसभा चुनाव (2017)
2017 में ही गोवा की ही तरह मणिपुर में भी राज्यपाल ने सबसे बड़ी पार्टी को दरकिनार किया गया. तब कांग्रेस 28 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी और भाजपा के पास 21 सीटें थीं. तब की राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला ने भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को सरकार बनाने का मौका दिया, यह तर्क देते हुए कि उनके पास स्थिरता और संख्या बल अधिक है.
कर्नाटक विधानसभा चुनाव (2018)
कुल 224 में से BJP ने 104 सीटें जीतीं, लेकिन कांग्रेस और JD(S) ने बहुमत का आंकड़ा पार करने के लिए चुनाव के बाद तुरंत गठबंधन का ऐलान कर दिया. राज्यपाल ने BJP (सबसे बड़ी पार्टी) को सरकार बनाने का न्योता दिया. BJP को सदन में बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय दिया गया. येदियुरप्पा ने CM पद की शपथ ली. 19 मई 2018 को, फ्लोर टेस्ट से ठीक पहले, उन्होंने यह मानते हुए इस्तीफा दे दिया कि उनके पास बहुमत के लिए ज़रूरी संख्या नहीं है.
मेघालय विधानसभा चुनाव (2018)
तब मेघालय में कांग्रेस 21 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी. राज्यपाल ने 19 सीटों वाली एनपीपी (NPP) को भाजपा और अन्य दलों के समर्थन के आधार पर सरकार बनाने का न्योता दिया.
दिल्ली विधानसभा चुनाव 2013:
दिल्ली विधानसभा के लिए 2013 में हुए चुनावों में आम आदमी पार्टी ने पहली बार शिरकत किया और 28 सीटों पर काबिज हो गई. बीजेपी 32 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी और कांग्रेस केवल 7 सीटों पर सिमट गई. सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी BJP के दिल्ली में सरकार बनाने से इनकार करने के बाद, AAP ने सरकार बनाई.
झारखंड विधानसभा चुनाव 2005:
राज्यपाल सैयद सिब्ते रज़ी ने शिबू सोरेन (JMM) को सरकार बनाने का न्योता दिया. बहुमत के दावों में संदेह होने के बावजूद, राज्यपाल ने शिबू सोरेन को झारखंड के CM के तौर पर शपथ दिलाने का फैसला किया. राज्यपाल ने सोरेन को अपना बहुमत साबित करने के लिए 20 दिन का समय दिया.
उस समय, राज्य के प्रभारी BJP नेता राजनाथ सिंह ने कहा था, "यह राज्यपाल द्वारा जनता के जनादेश का अपमान है." शिबू सोरेन मार्च 2005 में CM बने, लेकिन उनका कार्यकाल मुश्किल से 10 दिन ही चला. वह विधानसभा में अपना बहुमत साबित नहीं कर पाए.
बाद में, BJP के नेतृत्व वाले गठबंधन ने सरकार बनाई.
जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव 2002:
राज्यपाल ने पार्टियों को गठबंधन की संभावनाएं तलाशने और बहुमत का समर्थन साबित करने के लिए समय दिया. बाद में, उन्होंने चुनाव के बाद बने उस गठबंधन (PDP + कांग्रेस + अन्य का समर्थन) को सरकार बनाने का न्योता दिया, जो सदन का विश्वास हासिल कर सकता था.
बिहार विधानसभा चुनाव 1967:
1967 में, बिहार में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी. महेश प्रसाद के कांग्रेस विधायकों के नेता चुने जाने के बाद, कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने इसका विरोध किया. लगभग 32 विधायकों ने धमकी दी कि अगर महेश प्रसाद CM बनते हैं, तो वे पार्टी छोड़ देंगे. इसके बाद, तत्कालीन राज्यपाल अनंतशयनम आयंगर ने महेश प्रसाद को सरकार बनाने का न्योता नहीं दिया. जब कांग्रेस सरकार बनाने में नाकाम रही, तो दूसरी पार्टियों ने इसे एक अवसर के रूप में देखा और गठबंधन बनाने के लिए एक साथ आ गईं.

एस.आर. बोम्मई केस (1994) और सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश
हंग एसेंबली की स्थिति में राज्यपाल का सरकार बनाने के लिए न्योता देने के मामले में एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ का मामला कई चीजें क्लियर करता है. एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ मामला राज्यपाल के अधिकारों और अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर सबसे बड़ा संवैधानिक फैसला है.
- बहुमत का परीक्षण (Floor Test): इस केस में अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी सरकार के बहुमत का फैसला राजभवन के ड्राइंग रूम में नहीं, बल्कि विधानसभा के पटल (Floor of the House) पर होना चाहिए.
- राज्यपाल की भूमिका: राज्यपाल केवल एक 'सुविधा प्रदाता' (Facilitator) है, न कि राजनीतिक निर्णयों का निर्णायक. अगर कोई चुनाव पूर्व या चुनाव बाद गठबंधन स्पष्ट बहुमत का दावा करता है, तो राज्यपाल को उसकी स्थिरता देखनी चाहिए.
- न्यायिक समीक्षा: बोम्मई फैसले ने यह स्थापित किया कि राज्यपाल की सिफारिश पर राष्ट्रपति शासन लगाने या सरकार बनाने के न्योते के निर्णय की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की जा सकती है.
तमिलनाडु के मामले में क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
संवैधानिक कानून विशेषज्ञ और वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा, “राज्यपाल को यह जानने और टीवीके से प्रथम दृष्टया यह साबित करने के लिए कहने का अधिकार है कि उसके पास बहुमत है या नहीं, फिर चाहे वह बाहरी समर्थन से हो या सरकार के भीतर. सरकार स्थिर होनी चाहिए.” उन्होंने कहा, “सहयोगियों से समर्थन पत्र हासिल करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए. अगर वह असफल होते हैं, तो गतिरोध उत्पन्न हो जाएगा.”
द्विवेदी ने कहा कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो सकता है, इसलिए टीवीके को समर्थन पत्र पेश करने होंगे या सरकार गठन का दावा पेश करते समय समर्थक नेताओं को उनके साथ राज्यपाल के समक्ष उपस्थित होना पड़ेगा.

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष ने अनुचित कदम बताया
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने टीवीके को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित न किए जाने को “अनुचित” बताया. सिंह ने कहा, “राज्यपाल के लिए सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए बुलाना बिल्कुल उचित है, क्योंकि अन्य दो पार्टियों के पास मिलकर भी बहुमत नहीं है. इसलिए अगर सबसे बड़ी पार्टी ने सरकार बनाने का दावा पेश किया है, तो राज्यपाल को उसे मौका देना ही होगा....”
उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि इस मामले में राज्यपाल का सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित न करना बेहद अनुचित है.” वरिष्ठ अधिवक्ता अजीत सिन्हा ने भी सिंह की राय से इत्तफाक जताया. उन्होंने कहा कि विजय को तुरंत सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए.

सिन्हा ने कहा कि टीवीके प्रमुख को 10 से 15 दिनों की निर्धारित समय सीमा के भीतर विधानसभा में अपना बहुमत साबित करना चाहिए.
उन्होंने कहा, “राज्यपाल सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने के लिए बाध्य हैं. सरकार का भविष्य सदन में ही तय किया जाना चाहिए.”
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वरिष्ठ अधिवक्ता विकास पाहवा ने कहा, “राज्यपाल के पास संविधान के अनुच्छेद-164 के तहत काम करते समय उन स्थितियों में बेहद सीमित संवैधानिक अधिकार होते हैं, जहां विधानसभा में किसी भी पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं होता.” उन्होंने कहा कि संविधान के मुताबिक राज्यपाल का मुख्य कर्तव्य यह सुनिश्चित करना है कि एक ऐसी स्थिर सरकार बने, जिसे विधानसभा में बहुमत हासिल हो.
पाहवा ने कहा, “आम तौर पर सबसे बड़ी पार्टी को पहले सरकार बनाने का दावा पेश करने आमंत्रित किया जाता है और फिर उससे उचित समय के भीतर विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए कहा जाता है. हालांकि, संविधान में ऐसा कोई स्पष्ट या यांत्रिक प्रावधान नहीं है, जो राज्यपाल को किसी भी परिस्थिति में हमेशा सबसे बड़ी पार्टी को आमंत्रित करने के लिए बाध्य करता हो.”

एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता अमित आनंद तिवारी ने कहा कि राज्यपाल के लिए किसी पार्टी को केवल इस आधार पर आमंत्रित करना अनिवार्य नहीं है कि वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. उन्होंने कहा, “राज्यपाल यह जांच कर सकते हैं और खुद को संतुष्ट कर सकते हैं कि क्या वह सबसे बड़ी पार्टी सरकार बना सकती है या सदन में बहुमत साबित कर सकती है. यह संतुष्टि राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में आती है और इस विवेकाधिकार पर सवाल नहीं उठाया जा सकता.”
तिवारी ने कहा, “मेरी समझ के हिसाब से टीवीके के मामले में पार्टी ने यह नहीं कहा है कि उसे अन्य विधायकों का समर्थन हासिल है.” उन्होंने कहा कि टीवीके के पास अभी भी पर्याप्त संख्या बल नहीं है, इसलिए राज्यपाल को पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने से पहले खुद संतुष्ट होना होगा.
पाहवा ने कहा कि अगर राज्यपाल के पास इस बात के विश्वसनीय प्रमाण हैं कि सबसे बड़ी पार्टी बहुमत हासिल करने की स्थिति में नहीं हो सकती है, तो वह आमंत्रण से पहले समर्थन के प्रमाण या समर्थन पत्र पेश करने के लिए कहने का वैध तरीका अपना सकते हैं. उन्होंने कहा, “अगर ऐसा कोई कदम सद्भावनापूर्वक और संवैधानिक मापदंडों के भीतर किया जाता है, तो उसे असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता.”
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