स्क्वाड्रन लीडर शमशेर पठानिया भारतीय वायु सेना में एक शीर्ष लड़ाकू पायलट हैं. इन्हें 'पैटी' भी कहा जाता है. 'एयर ड्रैगन्स' नामक एक विशेष इकाई की स्थापना के लिए अन्य विशिष्ट एविएटर्स के साथ वो सेना में शामिल हुए. 'पैटी' 'कोबरा युद्धाभ्यास' के दौरान Su-30MKI विमान उड़ाते हुए कुशलतापूर्वक F-16 के मिसाइल लॉक से बच निकलता है. ये वॉर सीक्वेंस ऋतिक रोशन की 'फाइटर' से है, लेकिन ऐसे असाधारण कौशल भारतीय वायु सेना के रणनीति और लड़ाकू विकास प्रतिष्ठान (TACDE) में विकसित किए जाते हैं, जहां एविएटर्स को सर्वश्रेष्ठ बनने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है.
TACDE ('टैक-डी') भारत के प्रसिद्ध 'टॉप गन' स्कूल के बराबर है, जो शीर्ष लड़ाकू पायलटों और ग्राउंड स्टाफ को तैयार करने के लिए हवाई युद्ध और सामरिक प्रक्रियाओं में वायु सेना के शीर्ष एक प्रतिशत को प्रशिक्षित करने पर ध्यान केंद्रित करता है. अमेरिकी नौसेना के स्ट्राइक फाइटर टैक्टिक्स इंस्ट्रक्टर कोर्स, जिसे टॉप गन के नाम से जाना जाता है, उसके विपरीत, टीएसीडीई की शुरुआत भारतीय वायु सेना के युद्ध सिद्धांत में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए एक परीक्षण कार्यक्रम के रूप में हुई.
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पुरस्कार विजेता वायु सेना इतिहासकार अंचित गुप्ता ने टीएसीडीई के इतिहास के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि इस विशेष इकाई की स्थापना भारत-पाक युद्ध से दस महीने पहले फरवरी 1971 में पंजाब के आदमपुर में लड़ाकू पायलटों, लड़ाकू नियंत्रकों और निर्देशित हथियारों और प्लेटफार्मों के संचालकों के लिए सामरिक और लड़ाकू विकास तथा प्रशिक्षण स्क्वाड्रन (टी एंड सीडी एंड टीएस) के रूप में की गई थी. बाद में 1972 में इसका नाम बदलकर TACDE कर दिया गया.

'टॉप गन' स्कूल में भारतीय एविएटर्स
8 अक्टूबर, 1932 को स्थापित भारतीय वायु सेना ने छह रॉयल एयर फोर्स-प्रशिक्षित पायलटों, 19 वायु सैनिकों और चार वेस्टलैंड वैपिटी आईआईए विमानों के साथ नंबर 1 स्क्वाड्रन का गठन किया. भारतीय पायलटों ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सेवा दी और स्वतंत्रता के बाद, भारतीय वायुसेना ने अपने पायलटों को हवाई युद्ध रणनीति और प्रशिक्षण में प्रशिक्षित करने की जरूरतों को पहचाना.
तीन IAF अधिकारी - एमके जांजुआ, शिव देव सिंह और बीएस दस्तूर - अमरदा में AFT कोर्स में भाग लेने वाले पहले भारतीय बने. इतिहासकार अंचित गुप्ता लिखते हैं, 1945 में रंजन दत्त डे फाइटर लीडर्स स्कूल (डीएफएलएस) के लिए चुने गए पहले भारतीयों में से एक थे.
सीएफई ने आरएएफ के लिए एक 'थिंक टैंक' के रूप में काम किया, जो युद्ध सिद्धांत पर सलाह देता था, डीएफएलएस को शुरुआती 'टॉप गन' संगठन माना जाता था.
टीएसीडीई की स्थापना
टीएसीडीई के शुरू में पायलट अटैक इंस्ट्रक्टर्स (पीएआई) कोर्स शामिल था, जो पायलटों को हवा से जमीन पर हमले में प्रशिक्षित करता था. पूर्व वायु सेना प्रमुख, एयर चीफ मार्शल एसपी त्यागी, जिन्होंने पीएआई कोर्स किया था, उन्होंने ब्लू स्काईज़ पॉडकास्ट पर उल्लेख किया था कि "पीएआई टीएसीडीई का पूर्ववर्ती था, जो न केवल हथियारों पर बल्कि शिक्षण पर भी ध्यान केंद्रित करता था." वो IAF के इतिहास में सबसे कम उम्र के PAI थे. पाठ्यक्रम में पायलटों को हवा से जमीन पर हथियार पहुंचाने का प्रशिक्षण दिया गया, जबकि विदेशों में, जैसे सीएफई में, हवाई युद्ध रणनीति सिखाई गई.
1 फरवरी 1971 को, T&CD&TS की स्थापना विंग कमांडर एके मुखर्जी की कमान में आदमपुर में मिग-21 और Su-7s के साथ उनके बेड़े में की गई थी. दिसंबर में, यूनिट ने कार्रवाई देखी और जवाबी हवाई मिशन, निषेधाज्ञा और नज़दीकी हवाई सहायता का संचालन किया.

"मैं गौरवशाली का गौरव हूं"
TACDE की स्थापना ऐसे समय में हुई जब भारतीय वायु सेना ने 1965 के युद्ध के दौरान हवाई-जमीन समन्वय और आक्रामक रणनीति पर कुछ कठिन सबक सीखे. भारतीय वायुसेना नेतृत्व ने अपनी रणनीति विकसित करने पर काम किया, जैसे 40,000 की लड़ाई के बजाय निम्न-स्तरीय उड़ान को लाया गया, नई तकनीक के अनुसार प्रतिक्रिया सिद्धांत लागू किए गए और टीएसीडीई जैसे स्कूलों ने भारतीय वायुसेना के स्क्वाड्रनों को शीर्ष एविएटर दिए और वायु सेना ने दो मोर्चों पर आक्रामक रुख अपनाया, ये एक प्रमाण है . TACDE का आदर्श वाक्य है "मैं गौरवशाली का गौरव हूं"
TACDE शुरू में आदमपुर में स्थित था, बाद में 1972 में जामनगर और उसके बाद ग्वालियर चला गया. इसकी सूची में मिग-29, मिराज 2000 और Su-30MKI हैं. पिछले साल जनवरी में Su-30, मिराज-2000H दुर्घटना में एक TACDE पायलट की मौत हो गई थी, और यूनिट के दो अन्य एविएटर घायल हो गए थे. इस घटना में विंग कमांडर हनुमंत राव सारथी की जान चली गई थी.
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