सुप्रीम कोर्ट ने शादी का झूठा वादा कर यौन संबंध बनाने के आरोप में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 के तहत दर्ज FIR को रद्द कर दिया है. अदालत ने कहा कि शिकायत में दर्ज तथ्यों से यह मामला सहमति से बने संबंध का प्रतीत होता है और रिकॉर्ड में ऐसी कोई बात नहीं है जिससे आरोपी की ओर से धोखाधड़ी या छल साबित हो सके.
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ गुजरात हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें FIR रद्द करने से इनकार किया गया था.
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डिजिटल प्लेटफॉर्म से शुरू हुई थी पहचान
मामले के अनुसार आरोपी और महिला की मुलाकात एक डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए हुई थी. दोनों के बीच पहले दोस्ती हुई और फिर प्रेम संबंध विकसित हुए. शिकायत में कहा गया था कि पहली मुलाकात के दौरान आरोपी ने शादी करने की इच्छा जताई थी. इसके बाद फरवरी 2024 में दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने. अप्रैल 2024 में दोनों दो दिन तक एक होटल में भी साथ रहे थे.
कोर्ट बोला- शिकायत में धोखे का आधार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत की सामग्री का विस्तार से अध्ययन करने के बाद कहा कि बयान स्पष्ट रूप से सहमति वाले संबंध को दर्शाते हैं. अदालत को ऐसा कोई तथ्य नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने शुरुआत से ही शादी का झूठा वादा कर महिला को संबंध बनाने के लिए प्रेरित किया था. कोर्ट ने यह भी कहा कि शिकायत में कहीं यह नहीं बताया गया कि पहली बार शारीरिक संबंध शादी के वादे की शर्त पर बनाए गए थे.
मां की असहमति को नहीं माना धोखाधड़ी
महिला का कहना था कि बाद में आरोपी ने यह कहकर शादी से इनकार कर दिया कि उसकी मां इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हैं. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह तथ्य उलटा इस बात की ओर संकेत करता है कि यदि शादी का वादा किया गया था, तो वह अच्छी नीयत से किया गया था. बाद में परिस्थितियां बदल जाने या शादी न हो पाने को अपने आप में धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता.
धारा 69 BNS पर की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि BNS की धारा 69 शादी का झूठा वादा या अन्य छलपूर्ण तरीकों से बनाए गए यौन संबंधों को अलग अपराध मानती है. लेकिन इस धारा को लागू करने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि वादा करते समय आरोपी की शुरू से ही शादी करने की कोई मंशा नहीं थी.
पीठ ने कहा कि केवल बाद में शादी का वादा पूरा न होना इस बात का सबूत नहीं है कि शुरुआत से ही आरोपी का इरादा गलत था. इसी आधार पर कोर्ट ने 20 मई 2025 को गुजरात के वडोदरा स्थित सयाजीगंज पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR को रद्द कर दिया.
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