- बॉम्बे HC के जज दिलीप एस. घुमारे के नक्सली प्रभावित क्षेत्र में ट्रांसफर पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक नहीं लगाई है
- घुमारे के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही चल रही है, जिसके तहत उनका ट्रांसफर किया गया था और SC ने राहत नहीं दी
- सुप्रीम कोर्ट ने घुमारे के आचरण को अनुशासनहीनता बताया और बिना शर्त माफी मांगने की सलाह दी है
बॉम्बे हाई कोर्ट पर चीखने और भड़कने वाले जज के नक्सली इलाके में ट्रांसफर पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया है. जज दिलीप एस. घुमारे पर अवमानना की कार्यवाही चल रही है और इसी के तहत उनका ट्रांसफर हुआ था. इस पर उन्होंने शीर्ष अदालत का रुख किया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने कोई राहत नहीं दी. लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट को इस मामले में अंतिम फैसला सुनाने से रोक दिया है. कोर्ट ने घुमारे की याचिका पर नोटिस जारी करते हुए मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर को तय की है. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने सुनवाई के दौरान घुमारे के आचरण पर कड़ी नाराजगी जताई.
बेंच ने साफ कहा कि किसी न्यायिक अधिकारी को अदालत में जजों पर आवाज उठाने का अधिकार नहीं है. कोर्ट ने कहा कि एक न्यायिक अधिकारी अदालत में जजों पर चिल्ला नहीं सकता. बेंच ने घुमारे के इस तर्क पर भी सवाल उठाया कि 179 स्वीकृत पद नहीं भरे जाने के लिए हाईकोर्ट प्रशासन जिम्मेदार था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी न्यायिक अधिकारी को अदालत से यह कहने का कोई अधिकार नहीं है कि पद नहीं भरने के लिए अदालत ही जिम्मेदार है. ऐसा बर्ताव तो घोर अनुशासनहीनता है. सुप्रीम कोर्ट ने घुमारे के आचरण को घोर अनुशासनहीनता बताया. बेंच ने कहा कि उन्हें अपने शब्दों पर पछताना चाहिए.
कोर्ट ने कहा कि एक न्यायिक अधिकारी को अदालत से यह कहने का कोई काम नहीं है कि पदों को नहीं भरने के लिए अदालत जिम्मेदार है. उन्हें अपने शब्दों पर पछताना चाहिए. यह घोर अनुशासनहीनता है. यहां तक कि एक वरिष्ठ नौकरशाह भी अदालत में अपनी आवाज उठाने की हिम्मत नहीं करता. सुप्रीम कोर्ट ने घुमारे को सलाह दी कि वह बॉम्बे हाईकोर्ट वापस जाएं और बिना शर्त माफी मांगें. बेंच ने कहा, 'हमारी सलाह है कि आप हाईकोर्ट वापस जाएं और बिना शर्त माफी मांगें. हाई कोर्ट आपके अनुरोध पर विचार करे.'
सुप्रीम कोर्ट में घुमारे की क्या थी दलील?
घुमारे की ओर से वरिष्ठ वकील विकास सिंह सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए. उन्होंने हाईकोर्ट की अवमानना कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग की. सिंह ने कहा कि घुमारे पहले ही माफी मांग चुके हैं और इसके बाद उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन किया है. उन्होंने बताया कि घुमारे को तीन महीने की नोटिस अवधि पूरी करनी है और उनका तबादला करीब 1,000 किलोमीटर दूर नक्सल प्रभावित इलाके में कर दिया गया है. सिंह ने अदालत की कार्यवाही की वीडियो रिकॉर्डिंग उपलब्ध कराने की भी मांग की. उनका कहना था कि हाईकोर्ट के आदेश में यह नहीं कहा गया कि घुमारे ने वास्तव में चिल्लाया था बल्कि उनके व्यवहार को 'चिल्लाने की सीमा तक पहुंचने वाला' बताया गया था.
‘1100 पद स्वीकृत, सिर्फ 385 भरे गए'
विकास सिंह ने दलील दी कि घुमारे ने सिर्फ यह तथ्य सामने रखा था कि करीब 1,100 पद स्वीकृत किए गए थे, लेकिन केवल 385 पद भरे गए हैं. उन्होंने कहा कि नियुक्तियों की प्रक्रिया हाईकोर्ट को आगे बढ़ानी थी.इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के सामने भी कुछ कठिनाइयां होती हैं. बेंच ने घुमारे के हलफनामे का भी जिक्र किया और कहा कि उसमें ऐसा प्रतीत होता है कि हाईकोर्ट को ही गलत ठहराया जा रहा है. पूरा विवाद 2013 में आरटीआई कार्यकर्ता विहार दुर्वे की ओर से दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान हुआ. यह मामला महिलाओं और नाबालिग बच्चियों के खिलाफ अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट में पदों के सृजन और नियुक्ति से संबंधित था.
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