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'यह बहुमत की तानाशाही', चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि जो भी पार्टी सत्ता में आती है, वह अपने फायदे के लिए कानून का इस्तेमाल करती है और स्वतंत्र चुनाव आयोग की मांग भूल जाती है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, “यह बहुमत की तानाशाही है." 

'यह बहुमत की तानाशाही', चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के नए नियमों के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की है.
  • सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े नए कानून पर बहुमत की तानाशाही होने की टिप्पणी की.
  • वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति से बाहर करने वाले कानून का विरोध किया.
  • न्यायालय ने कहा कि सत्ता में आने वाली पार्टी अपने फायदे के लिए कानून का दुरुपयोग करती है.
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नई दिल्ली:

देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े नए कानून के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट (SC) ने व्यवस्था के लिए बेहद तल्ख टिप्पणी की है. वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण द्वारा याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "यह बहुमत की तानाशाही है. सत्ता में आने के बाद हर राजनीतिक दल अपना रुख बदल लेता है. यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है." 

चुनाव आयुक्तों की चयन समिति से CJI से बाहर रखने का विरोध

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति से बाहर रखने वाले नए कानून का विरोध किया. उन्होंने कहा कि जब लालकृष्ण आडवाणी विपक्ष में थे, तब उन्होंने भी नियुक्ति प्रक्रिया पर कार्यपालिका के पूर्ण नियंत्रण पर सवाल उठाए थे. 

प्रशांत भूषण ने दलील दी कि जो भी पार्टी सत्ता में आती है, वह अपने फायदे के लिए कानून का इस्तेमाल करती है और स्वतंत्र चुनाव आयोग की मांग भूल जाती है. 

इस पर जस्टिस दत्ता ने टिप्पणी करते हुए कहा, यह चुने हुए लोगों की तानाशाही जैसा है. जो भी सत्ता में आता है, वही काम करता है. यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है. वहीं जस्टिस सतीश चंद शर्मा ने भी कहा कि “यह बहुमत की तानाशाही है." 

'ऐसा कानून होना चाहिए कि आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित हो'

प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया कि संसद को ऐसा कानून बनाना चाहिए था जिसमें कार्यपालिका का दबदबा न हो और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित हो. उन्होंने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, कानून के शासन और संविधान के अनुच्छेद 14 की मूल भावना से जुड़े हैं.

संसद ने इस विषय पर कानून क्यों नहीं बनायाः सुप्रीम कोर्ट

अदालत ने यह भी पूछा कि सुप्रीम कोर्ट से पहले संसद ने इस विषय पर कानून क्यों नहीं बनाया? इस पर भूषण ने जवाब दिया कि हर सरकार ने नियुक्ति प्रक्रिया का फायदा उठाया, इसलिए सुधार नहीं किए गए. 

सुनवाई के दौरान जस्टिस दत्ता ने डॉ. बीआर अंबेडकर पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री का जिक्र करते हुए कहा कि संविधान लागू होने के कुछ वर्षों बाद ही अंबेडकर ने कहा था कि देश में लोकतंत्र सही तरीके से काम नहीं कर रहा है.

विपक्ष के ज्यादातर सदस्यों को सस्पेंड कर दिया गया था

दरअसल चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में चीफ जस्टिस की भूमिका खत्म करने के केंद्र सरकार के कानून पर रोक की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में दूसरे दिन की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ADR की तरफ से वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि इस खास कानून पर बहस के दौरान विपक्ष के ज़्यादातर सदस्यों को सस्पेंड कर दिया गया था. 

AIMIM सांसद ओवैसी ने कहा कि यह कानून अनूप बरनवाल केस में दिए गए निर्देशों के मुताबिक नहीं है. इसपर सरकार का जवाब बस इतना आया कि अनूप बरनवाल फैसले ने हमसे कानून बनाने को कहा और इसलिए हमने कानून बना दिया है. फिर इसे वॉयस वोट से पास कर दिया गया. विपक्ष के 95 सदस्यों को सस्पेंड कर दिया गया. यह एक मज़ाक था.. कोई मतलब की बहस नहीं हुई. मंत्री ने ओवैसी की उठाई गई ज़रूरी आपत्ति का जवाब नहीं दिया.

अगर वे इसे रद्द करने के लिए संविधान संशोधन भी लाते, तो भी यह बेसिक स्ट्रक्चर का उल्लंघन होता. NJAC में अमेंडमेंट को इसलिए रद्द कर दिया गया था क्योंकि यह बेसिक स्ट्रक्चर का उल्लंघन करता था. 

प्रशांत भूषण ने दलील दी कि पार्लियामेंट को ऐसा कानून बनाना था, जिसमें एग्जीक्यूटिव की आवाज़ हावी न हो. सही कानून का मतलब ऐसा कानून नहीं था जो वही कमी वापस लाए जिसे कोर्ट ने अपने फैसले में बार-बार बताया था. इंडिपेंडेंट चुनाव आयोग की ज़रूरत कानून के राज, फ्री और फेयर चुनाव के आर्टिकल 14 के सिद्धांतों पर आधारित थी.

कोर्ट ने पूछा कि पार्लियामेंट ने बरनवाल जजमेंट से पहले कानून क्यों नहीं बनाया? प्रशांत भूषण ने बताया कि हर सरकार ने इसका फायदा उठाया. ताकि वे अपॉइंटमेंट का गलत इस्तेमाल कर सकें। जब ये लोग (BJP) विपक्ष में थे तो शोर मचा रहे थे कि एक इंडिपेंडेंट बॉडी होनी चाहिए, लेकिन जब वे सत्ता में आए, तो उन्होंने इसकी परवाह करना बंद कर दिया.

जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि जो भी सत्ता में आता है, वो वैसा ही काम कर रहा है. यह देश के लिए ठीक नहीं है. मैंने डॉ. अंबेडकर पर BBC का एक वीडियो देखा. संविधान बनने के 3 साल के अंदर ही उन्होंने कहा कि इस देश में डेमोक्रेसी काम नहीं कर रही है. 

मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता ने हल्के अंदाज में बड़ी टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि काश जजों की नियुक्ति में भी इतनी ही तेजी दिखाई जाती, खासकर हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति में. 

यह टिप्पणी उस समय आई जब वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया ने अदालत को बताया कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति बहुत जल्दबाजी में की गई. हंसारिया ने कहा कि 2024 में नए कानून के तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका दाखिल की गई थी, लेकिन सुनवाई से पहले ही केंद्र सरकार ने तेजी से नियुक्ति प्रक्रिया पूरी कर ली. 

उन्होंने अदालत को बताया कि 13 मार्च 2024 को विपक्ष के नेता को करीब 200 नामों की सूची दी गई और अगले ही दिन चयन समिति की बैठक में ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू के नाम चुन लिए गए. हंसारिया ने कहा कि जब सारी शक्ति एक व्यक्ति के हाथ में दे दी जाती है तो यही होता है.

⁠विपक्ष के नेता से यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह एक दिन में इतने सारे नामों की जांच कर लें. इसी पर जस्टिस दत्ता ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जजों की नियुक्ति में भी ऐसी ही तेजी होनी चाहिए.

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