- सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के दोषी व्यक्ति को 22 वर्षों से जेल में रहने के बाद जमानत दी है.
- ओडिशा हाई कोर्ट ने आपराधिक अपील को बिना तथ्य जांचे केवल देरी के आधार पर खारिज कर दिया था.
- शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के रवैये पर चिंता जताते हुए सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने का निर्देश दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने 7 मई को हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को जमानत दे दी, जिसने पहले ही जेल में 22 साल से अधिक का समय गुजार लिया है. इस दौरान शीर्ष अदालत ने ओडिशा हाई कोर्ट के रवैये पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि हाई कोर्ट ने मामले के तथ्यों और मेरिट की जांच किए बिना, सिर्फ देरी को आधार बनाकर उसकी आपराधिक अपील खारिज कर दी थी. न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति उज्ज्ल भुइयां की पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय को इस मामले पर “व्यावहारिक और सहानुभूतिपूर्ण” दृष्टिकोण अपनाना चाहिए था और दोषी को उसकी अपील पर गुण-दोष के आधार पर बहस करने का अवसर देने के लिए देरी को माफ कर देना चाहिए था.
SC ने इस बात पर गौर किया कि दोषी को एक बार भी पैरोल या छुट्टी पर रिहा नहीं किया गया है और कहा कि मामले को उच्च न्यायालय में वापस भेजना और आपराधिक अपील पर गुण-दोष के आधार पर सुनवाई करना व्यर्थ होगा. पीठ ने कहा कि इस मामले के विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, हम आश्वस्त हैं कि याचिकाकर्ता को जमानत पर रिहा कर देना चाहिए. संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए, एक असाधारण मामले के रूप में, हम आदेश देते हैं कि याचिकाकर्ता को जेल अधीक्षक की संतुष्टि के अनुरूप 10,000 रुपये के व्यक्तिगत मुचलके पर जमानत पर रिहा कर दिया जाए.
न्यायालय ने ओडिशा के कोरापुट स्थित जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को उचित प्रतिवेदन तैयार करने में सहायता करे, जिसमें अपराध के समय प्रचलित सजा माफी नीति के अनुसार सजा में छूट की मांग की गई हो. सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसने यह आदेश इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए पारित किया है कि याचिकाकर्ता पिछले 22 वर्षों से सजा काट रहा है, इस दौरान उसे एक बार भी रिहा नहीं किया गया है और जेल में उसका आचरण भी संतोषजनक पाया गया है.
इसमें कहा गया है, “रजिस्ट्री इस आदेश की सूचना वरिष्ठ अधीक्षक, सर्किल जेल, कोरापुट और साथ ही जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, कोरापुट को यथाशीघ्र देगी.”
न्यायालय एक ऐसे व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसने उड़ीसा उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें निचली अदालत द्वारा पारित दोषसिद्धि के फैसले और आदेश के खिलाफ आपराधिक अपील दायर करने में हुई 3,157 दिनों की देरी को माफ करने से इनकार कर दिया गया था और आपराधिक अपील को समय सीमा समाप्त होने के आधार पर खारिज कर दिया गया था.
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