Success Story Bihar: बिहार के नवादा जिले में वारिसलीगंज की खिलाड़ी और बिहार पुलिस में दरोगा आरती कुमार की सक्सेस स्टोरी आपको कभी हार न मानने की प्रेरणा और हिम्मत दे सकती है. आरती ने बचपन में अपना सबसे बड़ा सहारा अपने भाई को खो दिया और अपने खेल को लेकर लोगों के खूब ताने भी सुने. इन तमाम कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने वह कर दिखाया जो हर खिलाड़ी का सपना होता है. अब आरती भारतीय महिला रग्बी टीम का हिस्सा बनकर जापान के आइची-नागोया में 19 सितंबर से 4 अक्टूबर 2026 तक आयोजित होने वाले 20वें एशियन गेम्स में भारत की जर्सी में नजर आएंगी.
राहुल के निधन के बाद माता-पिता ने भी बेटी का हाथ नहीं छोड़ा. उन्होंने समाज की परवाह किए बिना आरती को खेलने का पूरा अवसर दिया. आज बिहार की दो बेटियों का चयन भारतीय महिला रग्बी टीम में हुआ है. आरती के अलावा मुजफ्फरपुर की गुड़िया कुमारी भी इस टीम में शामिल हैं. आरती के लिए यह सिर्फ खेल की उपलब्धि नहीं है, बल्कि उस भाई के सपने का पूरा होना भी है.
तानों का जवाब प्रदर्शन से दिया
राहुल की मौत के बाद आरती जब अभ्यास के लिए मैदान जाती थीं, तो आसपास के कुछ लोग उनका मजाक उड़ाते थे. कोई उन्हें 'दुबईवाली' कहता तो कोई 'बाउंसर'. कुछ लोग तो यहां तक कहते थे कि उनमें 'लड़की वाले संस्कार' नहीं हैं. आरती ने उस वक्त किसी को जवाब नहीं दिया, लेकिन आज खेल में अपने शानदार प्रदर्शन से उन्होंने सबको जवाब दे दिया है. आज वही लोग आरती के खेल की तारीफ करते नहीं थकते.
आरती बिहार के नवादा जिले के वारिसलीगंज स्थित पटेल नगर की रहने वाली हैं. उनके पिता संजय प्रसाद किसान हैं और माँ मंजू देवी गृहिणी हैं. तीन भाई-बहनों में आरती और उनके भाई राहुल थे, जबकि बड़ी बहन अंजलि की शादी हो चुकी है. राहुल के जाने के बाद परिवार के सामने कई मुश्किलें आईं. आरती की माँ मंजू देवी और पिता संजय प्रसाद बताते हैं कि आसपास के लोग बेटी को लेकर तरह-तरह की बातें करते थे, लेकिन उन्हें अपनी बेटी पर पूरा विश्वास था. मंजू देवी कहती हैं कि बेटे की कमी तो कोई पूरी नहीं कर सकता, लेकिन आरती ने उसकी उम्मीदों और अरमानों को जरूर जिंदा रखा है.
एथलेटिक्स से शुरू हुआ था सफर, रग्बी ने बदली पहचान
आरती ने 2017 में भाई राहुल के सहयोग से जिला स्तरीय प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था. लॉन्ग जंप, 100 मीटर और 200 मीटर दौड़ में उन्होंने तीन गोल्ड मेडल जीते. इसके बाद राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में लॉन्ग जंप में गोल्ड और 100 मीटर में सिल्वर मेडल हासिल किया. बाद में एथलेटिक्स के कोच पंकज कुमार ज्योति के माध्यम से उन्हें रग्बी खेल में अवसर मिला. राजगीर में अपनी पहली प्रतियोगिता में वह चौथे स्थान पर रही थीं. इसके बाद हैदराबाद में आयोजित स्कूल गेम्स में उन्होंने गोल्ड मेडल जीता और बेस्ट स्कोरर का खिताब हासिल किया. राष्ट्रीय स्तर पर लगातार बेहतरीन प्रदर्शन के बाद चंडीगढ़ में जूनियर अंडर-18 प्रतियोगिता में उन्हें सिल्वर मेडल मिला. फिर भुवनेश्वर के राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर के लिए उनका चयन हुआ, जहाँ उनके शानदार प्रदर्शन ने भारतीय टीम के दरवाजे खोल दिए.
उज्बेकिस्तान में 12 गोल कर बनी थीं बेस्ट स्कोरर
आरती ने उज्बेकिस्तान के ताशकंद में आयोजित अंडर-18 महिला एशियन रग्बी चैंपियनशिप में भारत के लिए शानदार प्रदर्शन किया था. भारत ने यूएई के खिलाफ मुकाबले में 21-17 से जीत दर्ज की थी. इस पूरे टूर्नामेंट में आरती ने 12 गोल किए और सर्वाधिक गोल करने वाली खिलाड़ी बनीं. भारत ने इस प्रतियोगिता में सिल्वर मेडल जीता था. आरती के इस प्रदर्शन ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई और अब वह एशियन गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी.
रग्बी फुटबॉल एसोसिएशन नवादा के सचिव विक्रम कुमार कहते हैं कि आरती की सफलता में उनके परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है. कठिन परिस्थितियों में भी परिवार ने बेटी को खेलने से नहीं रोका और यही भरोसा आरती को आगे ले गया. उनके जीजा डॉ. लव कुमार और बहन अंजलि का कहना है कि आरती ने तानों का जवाब शब्दों से नहीं, बल्कि अपने खेल से दिया है. वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता राजेश कुमार मुरारी कहते हैं कि आरती ने अपनी इस उपलब्धि से बेटियों को लेकर समाज में बनी पुरानी सोच को चुनौती दी है.
अब भाई की यादें और भारत की जर्सी
आरती ने खेल कोटे से बिहार पुलिस में दरोगा की नौकरी भी हासिल की है. अब उनका अगला पड़ाव एशियन गेम्स है, जिसके लिए वह भारतीय महिला रग्बी टीम के साथ जापान रवाना होंगी. एक किसान की बेटी, जिसने कभी भाई के साथ मैदान तक जाना शुरू किया था, आज उसी मैदान के जरिए अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँच चुकी है. राहुल आज उनके साथ नहीं हैं, लेकिन आरती जब भारत की जर्सी पहनकर मैदान में उतरेंगी, तो उनके साथ उनके भाई का आशीर्वाद और यादें होंगी. जिस भाई ने कभी दुनिया की परवाह न करते हुए अपनी बहन का हाथ थामा था, आज उसी बहन ने साबित कर दिया है कि अगर भरोसा और हौसला मिले तो बेटियां किसी से कम नहीं होतीं.
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