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सोनिया गांधी ने बताया- विदेशी बताकर शरद पवार और संगमा ने विरोध किया तो क्यों आंसू निकल आए

सोनिया गांधी ने अपनी नई किताब 'Belonging: A Journey of Love' को लेकर अंग्रेजी अखबार 'द हिंदू' को इंटरव्यू दिया है. इस दौरान उन्होंने विदेशी मूल के मुद्दे से जुड़े सवाल पर खुलकर बात की है.

सोनिया गांधी ने बताया- विदेशी बताकर शरद पवार और संगमा ने विरोध किया तो क्यों आंसू निकल आए
सोनिया गांधी ने राजनीति से जुड़े कई अहम पहलुओं पर बात की है.
Photo: IANS
नई दिल्ली:

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष और कांग्रेस संसदीय दल की मौजूदा अध्यक्ष सोनिया गांधी की नई किताब 'Belonging: A Journey of Love' इन दिनों सुर्खियों में है, जो जल्द ही मार्केट में आने वाली है. हार्परकॉलिन्स इंडिया द्वारा प्रकाशित इस किताब के बारे में सोनिया गांधी मीडिया से बातचीत कर रही हैं. अंग्रेजी अखबार 'द हिंदू' को दिए गए एक इंटरव्यू में सोनिया ने कई अहम सवालों के जवाब दिए हैं. बातचीत में कई व्यक्तिगत, ऐतिहासिक और राजनीतिक पहलू शामिल हैं. 

इस इंटरव्यू में सोनिया गांधी से कांग्रेस नेताओं शरद पवार, पी.ए. संगमा और तारिक अनवर द्वारा उनकी विदेशी मूल का मुद्दा उठाने और यह कहने पर सवाल पूछा गया कि वह भारत में उच्च पद नहीं संभाल सकतीं. सोनिया गांधी ने इस सभी पहलुओं पर खुलकर बात की. 

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Photo Credit: IANS

सोनिया गांधी से सवाल किया गया- 'आपने कांग्रेस नेताओं (शरद पवार, पी.ए. संगमा और तारिक अनवर) द्वारा आपके विदेशी मूल का मुद्दा उठाने और यह दावा करने पर कि आप भारत में किसी उच्च पद पर नहीं रह सकतीं, अपनी गहरी पीड़ा व्यक्त की. आपने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन पार्टी नेताओं की गुजारिश पर आप पार्टी का हिस्सा रहीं. क्या इस घटना ने आपके इस संकल्प को और पक्का कर दिया कि अगर कभी मौका मिला भी, तो आप प्रधानमंत्री का पद स्वीकार नहीं करेंगी?'

गौर करने वाली बात है कि सोनिया गांधी ने अपनी नई किताब में इसका जिक्र करते हुए लिखा है- "मेरी आंखों में आंसू आ गए थे और मैं मीटिंग से बाहर आ गई. मैं कोई पद या सत्ता पाने के लिए पॉलिटिक्स में नहीं आई थी. इन्हीं साथियों ने मुझे सियासत में आने के लिए कहा था. और वे ही मेरे खिलाफ हो गए थे. मुझे इस बात से दुख नहीं हुआ कि मुझे कोई पद नहीं मिला. दुख इस बात का था कि भारत के प्रति मेरी निष्ठा पर सवाल उठाए जा रहे थे."

सोनिया गांधी ने 'द हिंदू' के सवाल का जवाब देते हुए कहा, "जाहिर है, मुझे दुख हुआ. ये मेरे साथी थे और मुझ पर उनका भरोसा था, लेकिन बाद में पता चला कि उनका मुझ पर कोई भरोसा नहीं था. मुझे यह जानकर गहरा धक्का लगा कि वे आज भी मुझे बाहरी शख्स ही मानते थे. अब पीछे मुड़कर देखती हूं, तो समझ आता है कि शायद उनकी अपनी कुछ वजहें रही होंगी."

उन्होंने कहा कि यह मेरे राजनीतिक जीवन की शुरुआती दौर की बात है, और उस वक्त प्रधानमंत्री बनने का खयाल तो मेरे मन में दूर-दूर तक नहीं था. हां, मैंने इस्तीफा जरूर दे दिया था, लेकिन फिर आत्म-मंथन करने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मैं अपनी निजी भावनाओं की वजह से अपने बड़े मकसद से भटक नहीं सकती. मुझे आगे बढ़ते रहना था.

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