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अकबर नगर तोड़फोड़ केस पीड़ितों की SIR में शामिल करने की मांग पर SC का दखल से इनकार

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि अभी चल रही SIR प्रकिया से उन्हें इस आधार पर बाहर कर दिया गया है कि उनका कोई सटीक पता नहीं है. उन्होंने  मांग की थी कि BLO के पास फॉर्म जमा करने की समयसीमा को बढ़ाया जाए. 

अकबर नगर तोड़फोड़ केस पीड़ितों की SIR में शामिल करने की मांग पर SC का दखल से इनकार
  • सुप्रीम कोर्ट ने लखनऊ के अकबर नगर में तोड़फोड़ के शिकार लोगों की याचिका पर दखल देने से इनकार किया है.
  • याचिकाकर्ताओं के नाम उत्तर प्रदेश की SIR प्रक्रिया में पहचान योग्य पता न होने के कारण मतदाता सूची से हटाए गए.
  • सुप्रीम कोर्ट ने जिला निर्वाचन अधिकारियों को तथ्यों की जांच कर कानून के अनुसार कार्रवाई करने का निर्देश दिया.
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नई दिल्‍ली:

लखनऊ के अकबर नगर इलाके में तोड़फोड़ कार्रवाई के शिकार 91 लोगों की एसआईआर प्रकिया में शामिल होने के लिए दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने दखल देने से इनकार कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो आर्टिकल 32 के तहत याचिका पर सुनवाई नहीं कर सकता है. कोर्ट ने जिला निर्वाचन अधिकारियों से कहा कि वो अपने पास आए ऐसे आवेदनों की जांच करे और कानून सम्मत कार्रवाई करें. साथ ही अदलत ने कहा कि अगर याचिकाकर्ता उनके फैसले से सन्तुष्ट नहीं होते हैं तो वो हाई कोर्ट का रुख कर सकते हैं. 

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि अभी चल रही SIR प्रकिया से उन्हें इस आधार पर बाहर कर दिया गया है कि उनका कोई सटीक पता नहीं है. उन्होंने  मांग की थी कि BLO के पास फॉर्म जमा करने की समयसीमा को बढ़ाया जाए. 

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91 याचिकाकर्ताओं की याचिका पर सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने 91 याचिकाकर्ताओं की याचिका पर सुनवाई की, जिनका दावा है कि लखनऊ के अकबर नगर में उनके मकान ध्वस्त किए जाने के बाद उत्तर प्रदेश की SIR  प्रक्रिया में उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए. वरिष्ठ वकील एमआर शमशाद ने दलील दी कि याचिकाकर्ताओं के नाम वर्ष 2025 में हुए विशेष SIR में भी दर्ज थे.  

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने कहा कि हम तथ्यात्मक जांच के प्रश्न पर हैं. उच्च न्यायालय इस पर विचार कर सकता है. साथ ही अदालत ने आदेश में दर्ज किया कि याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वे लखनरु के अकबर नगर के निवासी हैं. अवैध निर्माण के आधार पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई थी. 

यह मामला उच्च न्यायालय में गया था, जहां पुनर्वास नीति बनाने का निर्देश दिया गया था और उस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा था.

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पहचान योग्‍य पता नहीं होने से हटाए नाम: याचिकाकर्ता

अब दावा किया गया है कि उत्तर प्रदेश की SIR प्रक्रिया में याचिकाकर्ताओं के नाम इस आधार पर हटा दिए गए कि ध्वस्तीकरण के बाद उनके पास कोई पहचान योग्य पता नहीं है. 

यह भी कहा गया कि कई याचिकाकर्ताओं के नाम वर्ष 2002 की मतदाता सूची में दर्ज थे, जबकि बाद में जन्मे व्यक्तियों के नाम बाद की सूचियों में शामिल थे. 

याचिकाकर्ताओं ने बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) के समक्ष गणना प्रपत्र (एन्यूमरेशन फॉर्म) जमा करने की अनुमति देने का निर्देश देने की मांग की थी. 

जिला निर्वाचन अधिकारी तथ्यों की जांच करें: SC

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले की गंभीर तथ्यात्मक प्रकृति को देखते हुए वह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत हस्तक्षेप नहीं करेगा. अदालत ने निर्देश दिया कि जिला निर्वाचन अधिकारी तथ्यों की जांच करें और कानून के अनुसार आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाएं. 

साथ ही स्पष्ट किया गया कि यदि याचिकाकर्ताओं की शिकायत का समाधान नहीं होता है तो वे संबंधित उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है. 

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