- राहुल गांधी की संगरूर रैली से पंजाब विधानसभा चुनाव अभियान की औपचारिक शुरुआत हुई.
- रैली में नशे, गैंगवार और कानून-व्यवस्था के मुद्दे उठाए गए और सिद्धू मूसेवाला के पिता की मौजूदगी ने अपील की.
- पत्रकारों के अनुसार रैली से कांग्रेस में एकजुटता का संदेश गया लेकिन पार्टी अभी भी गुटबाजी से जूझ रही है.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी की संगरूर जनसभा, जिसे 'इंसाफ रैली' नाम दिया गया था, को पंजाब में कांग्रेस के विधानसभा चुनाव अभियान की औपचारिक शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है. इस रैली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे भी शामिल हुए. संगरूर में रैली कर राहुल गांधी ने एक साथ कई राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की. संगरूर मुख्यमंत्री भगवंत मान का निर्वाचन क्षेत्र है और यह पंजाब के मालवा क्षेत्र में आता है, जहां विधानसभा की 117 में से 69 सीटें हैं. मालवा को आम आदमी पार्टी का गढ़ माना जाता है. पिछले विधानसभा चुनाव में AAP ने इस क्षेत्र की 69 में से 66 सीटों पर जीत दर्ज की थी. ऐसे में कांग्रेस के लिए मालवा क्षेत्र का महत्व काफी बढ़ गया है और इसी वजह से राहुल गांधी ने अपने अभियान की शुरुआत यहीं से की है.
राहुल गांधी ने अपने भाषण में नशे की समस्या, गैंगवार और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे उठाए. हालांकि, रैली का सबसे अहम पहलू सिद्धू मूसेवाला के पिता सरदार बलकौर सिंह की मंच पर मौजूदगी और राहुल गांधी द्वारा सिद्धू मूसेवाला की हत्या का जिक्र करना रहा. इसके अलावा राहुल गांधी ने CM भगवंत मान पर व्यक्तिगत टिप्पणी की और आम आदमी पार्टी को बीजेपी की ‘बी टीम' बताया.
राहुल गांधी की रैली का क्या असर पड़ सकता है?
पंजाब की राजनीति पर नजर रखने वाले कुछ वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकारों से एनडीटीवी ने बातचीत की और उनसे पूछा कि संगरूर में राहुल गांधी की रैली का क्या असर पड़ सकता है. वरिष्ठ पत्रकार जगदीप सिंह सिंधू का कहना है कि, “राहुल गांधी की रैली से सकारात्मक संदेश गया है, खासकर पंजाब कांग्रेस में एकजुटता को लेकर. राहुल गांधी ने कानून-व्यवस्था और गैंगस्टरवाद का मुद्दा उठाकर मान सरकार को कठघरे में खड़ा किया है. वहीं, सिद्धू मूसेवाला की हत्या और उनके पिता को मंच पर स्थान देकर उन्होंने पंजाब के सिख समुदाय से भावनात्मक अपील की है. उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि प्रतिभाशाली और बदलाव की बात करने वाले सिख युवाओं को पहले डराया-धमकाया जाता है और बाद में उन्हें खत्म कर दिया जाता है.”
जगदीप सिंधू आगे कहते हैं, “बीजेपी पहले 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की बात करती थी, लेकिन नशा मुक्ति अभियान के बाद उसे यह महसूस हो गया कि उसे गठबंधन की जरूरत है. यही वजह है कि अब केंद्रीय गृह मंत्री ने पंजाब में एनडीए की सरकार बनने की बात कही है. दरअसल, बीजेपी की रणनीति पंजाब में त्रिशंकु विधानसभा जैसी स्थिति पैदा करने की है, ताकि बाद में सरकार गठन में उसकी भूमिका अहम हो सके.”
वहीं पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार रतनदीप धालीवाल का कहना है कि, “राहुल गांधी की रैली का असर जरूर होगा क्योंकि उन्होंने पंजाब के मूल मुद्दों को उठाया है, लेकिन कांग्रेस अब भी गुटबाजी से जूझ रही है. पंजाब की राजनीति में कहा जाता है, ‘कक्का कांग्रेस, कक्का कलेश.' राहुल गांधी को चाहिए कि वे पंजाब कांग्रेस के 250-300 नेताओं की एक बैठक बुलाएं और साफ संदेश दें कि सभी नेता एकजुट हों, अन्यथा जिन्हें जाना है वे अभी पार्टी छोड़ सकते हैं.”
रतनदीप धालीवाल आगे कहते हैं, “कांग्रेस को मुख्यमंत्री पद का चेहरा भी घोषित करना पड़ेगा क्योंकि फिलहाल कई नेता खुद को इस पद का दावेदार मान रहे हैं. टिकट वितरण के समय यही नेता एक-दूसरे के खिलाफ काम कर सकते हैं. मेरे अनुसार परगट सिंह एक बेहतर विकल्प हो सकते हैं, लेकिन अन्य नेताओं की वजह से वे पर्याप्त चर्चा में नहीं आ पा रहे हैं.”
क्यों मजबूत हुआ कांग्रेस का नैरेटिव?
पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार जगतार सिंह भुल्लर का कहना है कि, “नशा और कानून-व्यवस्था ऐसे मुद्दे हैं जो पंजाब के लगभग हर घर को प्रभावित करते हैं. हाल ही में एंटी-ड्रग एक्टिविस्ट झोटा की हत्या और अन्य घटनाओं ने आम आदमी पार्टी को रक्षात्मक स्थिति में ला दिया है. यह रैली कांग्रेस के उस नैरेटिव को मजबूत करती है. साथ ही यह नए प्रदेश अध्यक्ष परगट सिंह के नेतृत्व में हुई पहली बड़ी रैली थी. टिकट के दावेदारों के लिए भीड़ जुटाने की क्षमता दिखाने का यह एक परीक्षण भी था. कांग्रेस आने वाले समय में माझा, मालवा और दोआबा क्षेत्रों में यात्राएं करने की योजना बना रही है.”
वह आगे कहते हैं, “69 सीटों वाले मालवा क्षेत्र में यह रैली AAP की ताकत को सीधी चुनौती है. साथ ही मूसेवाला परिवार के जरिए युवाओं तक पहुंचने की कोशिश भी की गई है. हालांकि कांग्रेस में चन्नी और वॉरिंग खेमों के बीच धड़ेबंदी अब भी मौजूद है. हाईकमान ने एकजुटता पर जोर दिया है, लेकिन यह एकता अभी भी नाजुक है. रैली कांग्रेस को नैरेटिव और मनोबल दोनों स्तरों पर फायदा देती है और मुकाबले को और दिलचस्प बनाती है. लेकिन सीटों में बड़ी बढ़त हासिल करने के लिए उम्मीदवारों का सही चयन, गुटबाजी पर नियंत्रण, लगातार जमीनी मेहनत और वोटों का प्रभावी प्रबंधन जरूरी होगा. यह एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन मंजिल अभी काफी दूर है.”
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि पंजाब में कांग्रेस की पहली लड़ाई विरोधियों से ज्यादा अपने भीतर की चुनौतियों से है. पार्टी को पहले आंतरिक गुटबाजी का समाधान करना होगा और प्रभारी सचिन पायलट इसी दिशा में काम कर रहे हैं. यह भी साफ है कि आगामी चुनाव में कांग्रेस, एनडीए और आम आदमी पार्टी तीनों पूरी ताकत से मैदान में उतरेंगी. ऐसे में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरने की होगी. हालांकि राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यदि कांग्रेस वास्तव में एकजुट हो जाती है, तो यह लक्ष्य उसके लिए असंभव नहीं होगा.
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