- मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अंकिता भंडारी मामले को बेटी के सम्मान और इंसाफ की लड़ाई के रूप में लिया
- पुलिस ने 24 घंटे के अंदर सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा
- न्यायालय ने आरोपियों को सबूतों के आधार पर गैंगस्टर अधिनियम के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई
अंकिता भंडारी... एक नाम जो उत्तराखंड ही नहीं, पूरे देश की बेटी बन गया. एक ऐसी बेटी जो काम करने निकली थी, सपने लेकर निकली थी, लेकिन लौट कर नहीं आई. जिस दिन ये खबर सामने आई, हर मां-बाप की आंख नम थी, हर परिवार ने अपने घर की बेटी में अंकिता को देखा. ऐसे संवेदनशील और दर्दनाक वक्त में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसे सिर्फ एक केस नहीं, एक बेटी के सम्मान और इंसाफ की लड़ाई के तौर पर लिया. सरकार ने पहला संदेश यही दिया- महिलाओं की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं.
घटना सामने आते ही पुलिस को सख्त निर्देश थे, आरोपियों को किसी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा. 24 घंटे के अंदर ही सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. पीड़ित परिवार के लिए ये पहला भरोसा था कि उनकी बेटी की आवाज सुनी जा रही है. मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेष जांच दल SIT बनाई गई. ताकि हर पहलू की बारीकी से, निष्पक्ष जांच हो सके और कोई भी दोषी कानून के शिकंजे से बच न पाए. सबूतों को वैज्ञानिक तरीके से जोड़ा गया ताकि कोर्ट में मजबूत पैरवी हो सके. सिर्फ गिरफ्तारी तक सरकार नहीं रुकी. प्रभावी अभियोजन के लिए सरकारी वकीलों की टीम को मजबूती दी गई, ताकि दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिले. साथ ही पीड़ित परिवार की हर मांग को संवेदनशीलता से सुना गया, उनकी सहायता और सुरक्षा को लेकर सरकार लगातार संपर्क में रही.
दोषियों को उम्रकैद की सजा
मामले की जांच के दौरान सबूतों और गवाहों के आधार पर आरोपपत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया. अभियोजन पक्ष ने न्यायालय में मामले की पैरवी की. आरोपियों के विरुद्ध गैंगस्टर अधिनियम के तहत भी कार्रवाई की गई. मामले में न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई. यह फैसला न्यायालय द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर दिया गया. सरकार की ओर से इस मामले में कानून के अनुरूप कार्रवाई और अभियोजन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया. प्रकरण में जमानत संबंधी न्यायिक आदेशों ने भी अपनी भूमिका निभाई.
परिजनों की भावनाओं और मांगों को दिया सम्मान
अंकिता भंडारी मर्डर केस में प्रदेश सरकार ने पीड़ित परिवार की भावनाओं और मांगों को भी महत्व दिया. परिजनों की मांग के अनुरूप सरकारी अधिवक्ताओं में बदलाव किए गए, ताकि वे अपनी बात और अपेक्षाएं न्यायिक प्रक्रिया के समक्ष रख सकें. इसके साथ ही अंकिता के माता-पिता द्वारा सीबीआई जांच की मांग उठाए जाने पर मुख्यमंत्री ने उनकी मांग पर निर्णय लेते हुए सीबीआई जांच की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया. सरकार का यह रुख दर्शाता है कि संवेदनशील मामलों में केवल प्रशासनिक कार्रवाई ही नहीं, बल्कि पीड़ित परिवार का विश्वास बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है. परिवार की आशंकाओं और मांगों को सुनना तथा कानून के दायरे में उन पर निर्णय लेना शासन की जवाबदेही का हिस्सा है.
परिवार को आर्थिक सहायता और रोजगार
अंकिता के निधन के बाद परिवार को आर्थिक और सामाजिक संबल प्रदान करने के लिए प्रदेश सरकार ने 25 लाख रुपये की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई. इसके अतिरिक्त परिवार के सदस्यों को रोजगार उपलब्ध कराने के कदम भी उठाए गए. सरकार ने इन निर्णयों के माध्यम से यह संदेश दिया कि किसी गंभीर अपराध से प्रभावित परिवार को न्यायिक प्रक्रिया के साथ-साथ जीवन की कठिनाइयों से उबरने में भी सहयोग मिलना चाहिए. अंकिता भंडारी प्रकरण ने महिलाओं की सुरक्षा, अपराधों की जांच और न्यायिक प्रक्रिया को लेकर व्यापक चर्चा को जन्म दिया. ऐसे मामलों में पुलिस जांच, अभियोजन, न्यायालय और शासन की अपनी-अपनी निर्धारित भूमिकाएं होती हैं. सरकार की जिम्मेदारी है कि जांच एजेंसियों को कानून के अनुरूप कार्रवाई के लिए निर्देशित किया जाए, अभियोजन की व्यवस्था प्रभावी रहे और पीड़ित परिवार को आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जाए.
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अंकिता भंडारी का जाना सिर्फ एक खबर नहीं था, एक पूरे प्रदेश के दिल पर लगी चोट थी. एक 19 साल की बेटी, जो अपने परिवार का सहारा बनने निकली थी, जिसके आंखों में नौकरी और भविष्य के सपने थे. जब वो नहीं लौटी, तो सिर्फ उसके माता-पिता नहीं, उत्तराखंड का हर परिवार रोया.ऐसे में सवाल सिर्फ ये नहीं था कि अपराधी कौन है, सवाल ये था कि क्या सिस्टम एक बेटी को इंसाफ दिला पाएगा? क्या उसके माता-पिता को ये भरोसा मिलेगा कि वो अकेले नहीं हैं?मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार ने इसी भरोसे को सबसे पहले पकड़ा.
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