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This Article is From Nov 01, 2025

क्‍या ज्‍यादा आसान है, खुद लड़ना या दूसरों को लड़ाना? प्रशांत किशोर ने NDTV पावरप्‍ले में बताया

NDTV पावरप्‍ले में प्रशांत किशोर ने कहा कि अब जनता को वोट करना है. इस चुनाव में या तो 10 से नीचे या 150 सीटों से ऊपर हम रहेंगे. प्रशांत किशोर ने बिहार की जाति राजनीति पर भी खुलकर अपने विचार रखे.

  • प्रशांत किशोर ने कहा कि बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज ने 243 सीटों में से 238 पर उम्मीदवार उतारे हैं.
  • प्रशांत किशोर ने बिहार में जातिवाद को पूर्वाग्रह बताया और कहा कि यह अन्य राज्यों जितना ही है.
  • जन सुराज के उम्मीदवारों का चयन मेरिट के आधार पर हुआ है और अति पिछड़ों तथा मुसलमानों को उचित भागीदारी मिली है.
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जन सुराज के संयोजक प्रशांत किशोर NDTV पावरप्‍ले में पहुंचे तो उनसे NDTV के सीईओ और एडिटर-इन-चीफ राहुल कंवल ने सवाल किया कि आपकी पहले की भूमिका चुनाव लड़ाने की रही है. आपकी भूमिका में अब कितना बदलाव आया है और प्रतिष्ठा कितनी दांव पर है? क्‍या ज्‍यादा आसान है, खुद लड़ना या दूसरों को लड़ाना? इस पर प्रशांत किशोर ने कहा कि यहां भी चुनाव ही लड़ा रहे हैं. हर चुनाव में प्रतिष्ठा तो दांव पर रहती ही है. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के अपने बीजेपी के 100 से नीचे वाली बात की याद दिलाते हुए कहा कि रिस्क तो रहता ही है. मैं जो अभी देख रहा हूं कि जिन्हें 20 साल से विकल्प की आवश्यकता थी, उन्हें विकल्प मिल गया है. अब जनता को वोट करना है. इस चुनाव में या तो 10 से नीचे या 150 सीटों से ऊपर हम रहेंगे.

प्रशांत किशोर ने कहा कि 243 सीटों पर हमने उम्मीदवार उतारे थे, 4 लोग बीजेपी में चले गए. 1 और चले गए. फिलहाल हम 238 सीटों पर लड़ रहे हैं. इनमें से 160 से 170 सीटों पर त्रिकोणीय लड़ाई होगी. ये तय मान लीजिए.

खुद क्यों नहीं लड़ रहे चुनाव

इस सवाल पर प्रशांत किशोर ने कहा कि मैं अरविंद केजरीवाल की तरह राजनीति नहीं करता हूं, बिहार के सीएम चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, तेजस्वी यादव के खिलाफ चुनाव लड़ता तो लोग कहते कि पिछड़ों के नेता को हराने के लिए लड़ रहे हैं. 14 को जब रिजल्ट आएगा तो जन सुराज को कितनी सीट और कितना वोट आएगा, उससे मेरी सफलता तय की जाएगी या राघोपुर में चुनाव लड़ने से. जनवरी से कैंडिडेट चुनने के लिए प्रक्रिया तय हुई थी.12 हजार लोगों ने मेरे नाम से राघोपुर से आवेदन दे दिया. नहीं लड़ने का फैसला इस बात का था कि समय नहीं है. अगर राघोपुर जाएंगे तो दूसरी जगह देने के लिए समय नहीं होगा. अगर दो दिन-चार दिन भी रह जाता तो दूसरी जगह मैं नहीं पहुंच सकता था. वहां नहीं जा सकता. जो लोग हमारे भरोसे आकर चुनाव लड़ रहे हैं, अगर उनको छोड़कर चुनाव लड़ने जाऊंगा तो उनके लिए सही नहीं होगा. तारापुर में तो महागठबंधन चुनाव ही नहीं लड़ रहा है, जन सुराज ही लड़ रहा है, वहां एक डबल एमडी डॉक्टर चुनाव लड़ रहा है. सम्राट चौधरी के खिलाफ वहां चुनाव लड़ रहा है.

बिहार में जातिवाद पर क्या बोले

खुद के अपर कास्ट होने पर प्रशांत किशोर ने कहा कि आप लोग सबसे बड़ी गलती ये कर रहे हैं. क्या बिहार में दूसरे राज्यों से ज्यादा जातिवाद है? 1984 में कांग्रेस को देश में भारी सफलता मिली तो बिहार में भी मिली. 1989 में वीपी सिंह देश भर में जीत कर आए तो बिहार में भी जीते. 2014 में मोदी जी देश भर में जीते तो बिहार में जीत गए. पुलवामा के नाम पर 2019 में भी जीत गए. तो जब-जब देश में लहर उठी है तो बिहार में भी वो दिखा है. तो बिहार में उतना ही जातिवाद है, जितना महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश में है. ये पूर्वाग्राह है कि बिहार में बहुत जातिवाद है. वहीं, एमवाई (मुस्लिम-यादव) और दूसरी तरफ सब का जो विचार है तो वो 26 प्रतिशत कौन हैं, जिन्होंने इन दोनों गठबंधनों को वोट नहीं दिया. अगर सारे एमवाई ने लालू जी को वोट दिया तो फिर तो उनका वोट प्रतिशत बहुत ज्यादा होता.

जन सुराज को वोट कौन देगा

प्रशांत किशोर ने कहा कि जाति की राजनीति को समझना और जाति की राजनीति को करना दो अलग बाते हैं. जन सुराज के उम्मीदवार भी तो किसी न किसी जाति के हैं. कोई ये नहीं कह रहा कि जन सुराज का नेतृत्व अगड़ा, पिछड़ा या ओबीसी का है. चुनाव का आधार मेरिट है. 1000 लोगों में से 243 ही तो चुनकर आएंगे. मेरा कहना है कि जब लोग जीतकर आएंगे तो उसमें सभी जातियों को उचित भागीदारी मिलेगी. जन सुराज ने इतिहास में पहली बार अति पिछड़ों को इतनी बड़ी संख्या में सीटें दी गईं हैं. इसी तरह मुसलमानों को भी टिकट दिया गया है. हमारा वोटबैंक दोनों गठबंधनों से ऊबे हुए लोग हैं. ये वो लोग हैं, जो बदलाव चाहते हैं. इनकी जाति हो सकती है, लेकिन कॉमन बात ये है कि ये बदलाव चाहते हैं.

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