- इलाहाबाद HC ने पाकिस्तानी नागरिक सबा मसूद को फर्जी दस्तावेज मामले में जमानत दे दी.
- कोर्ट ने कहा अभियोजन धोखाधड़ी या जालसाजी का कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका.
- बचाव पक्ष ने बताया सबा ने 1986 में भारतीय नागरिक से शादी की थी और नागरिकता के लिए 2010-11 में आवेदन लंबित है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब 35 साल से भारत में रहने वाली पाकिस्तानी नागरिक सबा मसूद को फर्जी दस्तावेजों और वोटर आईडी मामले में जमानत दे दी है. जस्टिस कृष्ण पहल की सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा कोई ठोस सबूत या तथ्य पेश नहीं किया जा सका है, जिससे यह साबित हो सके कि याचिकाकर्ता महिला ने भारत में रहने के लिए किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज या जालसाजी का सहारा लिया है.
क्या है पूरा मामला?
मेरठ के दिल्ली गेट थाना इलाके में रुक्साना खान नाम की एक महिला ने सबा मसूद और उनकी बेटी अयमन फरहत के खिलाफ केस दर्ज करवाया. थाने में बीएनएस की धारा 318(4), 336, 338, 340(2), 351(2), 352, 61(2) और विदेशी अधिनियम की धारा 14-खा के तहत एफआईआर दर्ज की गई. शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि सबा मसूद एक पाकिस्तानी नागरिक हैं और अपने पिता, जो कथित तौर पर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के एजेंट थे, उसके प्रभाव में आकर भारत में फर्जी पासपोर्ट और जाली दस्तावेजों के आधार पर अवैध रूप से रह रही हैं.
शिकायत में यह भी कहा गया था कि वह दिल्ली स्थित रक्षा मुख्यालयों और विभिन्न मंत्रालयों में संदिग्ध गतिविधियों के तहत आया-जाया करती थीं. इन गंभीर आरोपों के आधार पर पुलिस ने सबा मसूद के खिलाफ मामला दर्ज किया, जिसके बाद 16 फरवरी 2026 को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.
कोर्ट में सुनवाई के दौरान सबा मसूद के सीनियर एडवोकेट एनआई जाफरी ने बचाव पक्ष की ओर से तर्क रखे. उन्होंने अदालत को बताया कि सबा मसूद का नाम शादी से पहले शबा हनीफ था. उन्होंने 10 नवंबर 1986 को लाहौर में भारतीय नागरिक फरहत मसूद से निकाह किया था. शादी के बाद वे वैध पाकिस्तानी पासपोर्ट और भारतीय अधिकारियों द्वारा जारी दीर्घकालिक वीजा पर भारत आईं और तब से यहीं रह रही हैं.
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कोर्ट में यह भी बताया गाय कि उनके पास 10 मार्च 2027 तक वैध रेजिडेंशियल परमिट और साल 2037 तक का वैध वीजा मौजूद है. बचाव पक्ष ने अदालत के समक्ष दस्तावेज पेश करते हुए कहा कि सबा मसूद ने अपनी पाकिस्तानी नागरिकता को कभी छुपाने की कोशिश नहीं की. उन्होंने भारतीय नागरिकता हासिल करने के लिए नागरिकता नियम 2009 के तहत सितंबर 2010 और नवंबर 2011 में ऑनलाइन आवेदन भी दाखिल किए थे, जो मौजूदा वक्त में सक्षम अधिकारियों के समक्ष विचाराधीन है. यहां तक कि साल 2012 में मेरठ के तत्कालीन जिलाधिकारी ने भी एलआईयू को पत्र लिखकर सबा मसूद को भारतीय नागरिकता प्रदान करने की सिफारिश की थी.
शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए फर्जी वोटर आईडी कार्ड और झूठे पहचान पत्रों के आरोपों को खारिज करते हुए बचाव पक्ष ने कहा कि जिस 'नाज़िया' नाम की महिला के वोटर आईडी का जिक्र एफआईआर में किया गया है, उससे सबा मसूद का कोई संबंध नहीं है. इसके अलावा बेटी के पासपोर्ट और एजुकेशनल डॉक्यूमेंट्स में भी पिता के भारतीय होने की बात साफ तौर से दर्ज है. बचाव पक्ष ने अदालत को यह भी बताया कि शिकायतकर्ता और सबा मसूद के पति के बीच पुराना व्यावसायिक विवाद चला आ रहा है, जिसके चलते रंजिश की वजह से यह झूठी एफआईआर दर्ज कराई गई थी. कोर्ट को बताया गया कि सबा के पति फरहत मसूद को अप्रैल 2026 में अग्रिम जमानत हाईकोर्ट से मिल चुकी है.
वहीं, राज्य सरकार और शिकायतकर्ता के वकीलों ने जमानत का विरोध करते हुए तर्क दिया कि महिला ने अपने वीजा नियमों का उल्लंघन करते हुए देवबंद, मुजफ्फरनगर और अलीगढ़ जैसी जगहों की यात्रा की. इसके जवाब में याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि वह एक पर्दानशीं महिला हैं और केवल अपने बच्चे की शादी के सिलसिले में एक बार देवबंद गई थीं, जो कि किसी भी तरह का गैरकानूनी कृत्य नहीं है.
कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलों को सुनने और पत्रावली पर मौजूद सबूतों को देखने के बाद पाया कि सबा मसूद पिछले 35 से ज्यादा साल से वैध दीर्घकालिक वीजा पर भारत में रह रही हैं. अभियोजन पक्ष उनके द्वारा किसी भी तरह की धोखाधड़ी या जालसाजी किए जाने का कोई प्राथमिक सबूत पेश करने में फेल रहा है. कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि याचिकाकर्ता का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और उनके पति को पहले ही इस मामले में अग्रिम जमानत मिल चुकी है. इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने सबा मसूद को शर्त के साथ जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया.
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