ग्राउंड रिपोर्ट: पर्ची के लिए कतार, डॉक्टर के लिए कतार, दवाओं के लिए कतार... ESIC के अस्पताल को खुद चाहिए उपचार
नोएडा के सेक्टर-24 स्थित ESIC अस्पताल में मरीजों को रजिस्ट्रेशन, डॉक्टर और दवा के लिए घंटों इंतजार करना पड़ रहा है. पढ़िए ये ग्राउंड रिपोर्ट.
साहब हाथ टूटा हुआ है.. फिर भी दो-तीन घंटे से लंबी लाइन में खड़ा हूं. कोई सुनने वाला नहीं है. कोई सिस्टम ही नहीं है... नोएडा के सेक्टर 24 के ESIC अस्पताल में मेरे हाथ में माइक देखते ही अमन कुमार दौड़कर अपना दर्द बताने लगे. बाहर से चमचमाती बिल्डिंग के अंदर की हकीकत देखने के बाद मुझे भी थोड़ी हैरानी हुई. अमन यही नहीं रुके. उनके पास शिकायतों का पुलिंदा था. वो बिना रुके बताते चले गए. पहले रजिस्ट्रेशन, फिर डॉक्टर और फिर एक्स-रे की डेट तो 10-10 दिन बाद की मिलती है. बाहर से जब हम इस अस्पताल में आ रहे थे तो मेरे मन में कई अच्छी बातें उमड़-घुमड़ कर रही थीं. बाहर से शानदार बहुमंजिला इमारत किसी कारपोरेट दफ्तर की तरह लग रहा था. मेन गेट पर मुस्तैद गार्ड आपको तुरंत रास्ता बता रहा था. लेकिन अंदर आने के बाद हकीकत ही कुछ और निकली.
बहरहाल मैं अमन की बात सुनकर खुद को संभालने में जुटा था. हर तरफ नजरें दौड़ाकर वहां की स्थिति का जायजा लेने की कोशिश करने लगा. दरअसल हाल ही में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं श्रम मंत्री मनसुख मंडाविया ने कहा था कि सरकार ESIC के मरीजों को प्राइवेट अस्पतालों में भी इलाज की सुविधा देने पर विचार कर रही है. यह योजना फाइलों से निकलकर जमीन पर कब उतरेगी, यह तो भविष्य के गर्भ में है. लेकिन इस अस्पताल के भीतर बिताए कुछ घंटों ने यह साफ कर दिया कि दिहाड़ी और तनख्वाह से कटने वाले पैसों के बदले मरीजों को प्राइवेट अस्पतालों के विकल्प की इतनी सख्त जरूरत आखिर क्यों है.

अस्पताल का रजिस्ट्रेशन ब्लॉक
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कतारों में शुरू होती है कहानी, मरीजों की कटती दिहाड़ी
अस्पताल में इलाज की पहली सीढ़ी है रजिस्ट्रेशन और यहीं से मरीजों का असली संघर्ष शुरू हो जाता है. रजिस्ट्रेशन वार्ड में पैर रखने की जगह नहीं थी और जो जगह थी वहां भीषण गर्मी और उमस से हाल बेहाल था. पूरे रजिस्ट्रेशन ब्लॉक में एक पंखा तक नहीं था और लोग पसीने से तर-बतर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे.

नोएडा के रहने वाले सुभाष चंद्र
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इस भीड़ में हमारी मुलाकात नोएडा फेज-2 के सुभाष चंद्र से हुई, जिनसे बात करते वक्त गार्ड ने हमें रोकने की कोशिश भी की. सुभाष ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि यहां पहले रजिस्ट्रेशन की लाइन, फिर डॉक्टर की लाइन, फिर दवा की लाइन... इसमें पूरा दिन खराब होता है और दिहाड़ी मारी जाती है. मालिक वैसे ही छुट्टी नहीं देता. यहां आए तो दिनभर की दिहाड़ी गई. उन्होंने कहा कि अगर प्राइवेट अस्पताल में इलाज मिलेगा तो सुकून मिलेगा, कम से कम धूप और बारिश से तो बचेंगे.
ड्यूटी छोड़कर आईं नोएडा की सीमा शर्मा की आंखों में थकान और गुस्सा दोनों था. उन्होंने कहा, 'भूखे-प्यासे सुबह से लाइन में लगे हैं, कोई सुनवाई नहीं. कमाने के लिए ड्यूटी पर जाना पड़ता है, हमारे पास इतना टाइम कहां है? पर यहां बस कोई इधर भेज रहा है, कोई उधर.'

अमन कुमार (बाएं), सीमा शर्मा (दाएं)
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इसी कतार में खोड़ा कॉलोनी के लालाराम भी भूख-प्यास से जूझते मिले. वह दो घंटे से कतार में थे, क्योंकि उन्हें पहले सेक्टर 57 की डिस्पेंसरी भेजा गया था, वहां से पर्चा बनवाकर वह अब यहां धक्के खा रहे थे. सुदेश नाम की एक अन्य मरीज ने अपनी बेबसी जाहिर करते हुए कहा, 'मैं चौथी बार सिर्फ पर्चा बनवाने आई हूं. मजबूरी है, गरीब आदमी हैं, इसीलिए ये धक्के खा रहे हैं.'

राम किशोर (बाएं) और सुभाष चंद्र (दाएं)
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इलाज के नाम पर भटकाव और आधी-अधूरी दवाएं
अस्पताल में दूर-दराज से भी लोग उम्मीद लेकर आते हैं. हापुड़ के पिलखुआ से आए सुभाष चंद्र अपनी शुगर से पीड़ित पत्नी को लेकर पहुंचे थे. उनका दर्द था, '500 रुपये खर्च करके यहां आए हैं. डॉक्टर ठीक से देखते तक नहीं, छूते तक नहीं. बस दूर से दिक्कत पूछते हैं और जल्दी-जल्दी दवा लिख देते हैं. डिस्पेंसरी जाओ तो कहते हैं आधी दवा तो यहां है ही नहीं. इतने बड़े क्षेत्र में बस एक अस्पताल है.'
सांस की बीमारी से जूझ रहे राम किशोर की हालत भी कमोबेश ऐसी ही थी. 15 दिन से उन्हें कोई आराम नहीं मिला था. उन्होंने बताया, 'सेक्टर 12 की डिस्पेंसरी में भी दवा नहीं है. डॉक्टर कहते हैं बाहर से खरीद लो या इंतजार करो. अगर प्राइवेट में इलाज मिले तो बेहतर है, मरीज को तो बस ठीक होने से मतलब है. इलाज चाहे सरकारी में हो या प्राइवेट में'

अस्पताल में मरीजों के बैठने की जगह लगे एसी गर्म हवा फेंक रहे हैं
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अजीबोगरीब आर्किटेक्चर: मरीजों के चेहरे पर AC की गर्म हवा
रजिस्ट्रेशन की अग्निपरीक्षा पार करने के बाद हम ओपीडी की तरफ बढ़े. दोनों ब्लॉक्स के बीच एक गैलरी है, जहां स्टील की कुर्सियों पर मरीज बैठे थे. यहां का नजारा किसी क्रूर मजाक से कम नहीं था. गैलरी में विंडो AC तो लगे थे, लेकिन उनका 'आउटडोर' यानी गर्म हवा फेंकने वाला हिस्सा मरीजों की तरफ था. बाहर की चिलचिलाती धूप से ज्यादा तपिश उस गैलरी में थी. वहां चंद मिनट रुकने पर ही हमारा शरीर पसीने से भीग गया.
इसी भट्टी जैसी गैलरी में बैठे दिल्ली के कोंडली से आए सुदीप कुमार सिंह ने बताया, 'सुबह साढ़े 8 बजे से इंतजार कर रहा हूं, बहुत बीमार हूं पर इमरजेंसी में भर्ती नहीं किया.' उनके दोस्त संतोष कुमार सिंह ने बताया कि वे एक महीने से भर्ती होने के लिए दौड़ रहे हैं. उन्होंने तंज कसते हुए कहा, 'यहां कोई देखने वाला नहीं ह और ऊपर से AC का पंखा भी गर्म हवा फेंक रहा है.'

दिल्ली के कोंडली से आए सुदीप सिंह (बाएं), संतोष कुमार (बीच में) और ग्रेटर नोएडा के अशोक भाटी (दाएं)
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ग्रेटर नोएडा के अशोक भाटी अपनी बेटी के पेट दर्द का इलाज कराने आए थे. उन्होंने कहा, 'AC की इस गर्म हवा में मरीज बैठ ही नहीं सकता. डॉक्टर ने चार टेस्ट लिखे, मशीन न होने की वजह से तीन ही हुए. कहते हैं चौथा बाहर से कराओ. हम अपनी मेहनत की कमाई से पैसे कटवाते हैं, फिर भी न इलाज पूरा मिलता है न दवा.'
नोएडा सेक्टर 68 की पूजा शर्मा सुबह 3 बजे से आई थीं. उनके शब्दों में गहरी निराशा झलक रही थी. हमसे बात करते-करते उनकी आंखों में आंसू तक आ गए. उन्होंने कहा, 'सब नौटंकी है. मरीज खड़ा नहीं हो पा रहा, फिर भी उसे ही पर्चा बनवाने के लिए बुला रहे हैं.' उनके साथ आए रविकुमार ने तो यहां तक कह दिया, 'इससे अच्छा तो इन सरकारी अस्पतालों को बंद करवा दो. इनका एक-एक घंटे का टी-ब्रेक होता है. इमरजेंसी वाले ओपीडी भेजते हैं, ओपीडी वाले इमरजेंसी. हम अपनी सैलरी कटवाते हैं और ये हाल है.'

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खोड़ा की आशा देवी और प्रभाकर ने भी स्टाफ की बदतमीजी और बाहर से दवाइयां लाने की मजबूरी की बात कही. हालांकि इस पूरी भीड़ में सिर्फ एक मरीज, खोड़ा के सुदीप कुमार मिश्रा ऐसे मिले जो यहां की सुविधाओं से पूरी तरह संतुष्ट नजर आए.

ओपीडी वार्ड के दोनों कमरे खाली, न कोई डॉक्टर न ही स्टाफ
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'चाय पर चर्चा' में नदारद डॉक्टर और खाली कुर्सियां
ओपीडी वार्ड का हाल तो और भी बुरा था. बंद दरवाजों के बाहर मरीजों की लंबी कतारें लगी थीं. मरीजों ने बताया कि डॉक्टर चाय पीने गए हैं. जब हमने कैमरा निकाला, तो सिक्योरिटी गार्ड ने फौरन कहानी बदली और कहा, 'डॉक्टर राउंड पर गए हैं.' लेकिन जब हमने पूछा कि 'कहां राउंड पर?', तो गार्ड के होंठ सिल गए.
हम 15-20 मिनट वहीं खड़े रहे. लाइन लंबी होती गई, लेकिन डॉक्टरों का ब्रेक खत्म नहीं हुआ. जब हमने दरवाजा खोलकर देखा, तो अंदर सिर्फ मेज और खाली कुर्सियां देखने को मिलीं. हारकर हमें ही वहां से लौटना पड़ा. वहीं इंतजार कर रहीं राखी सिंह ने कहा, 'हम 11 बजे से लाइन में हैं, डॉक्टर चाय पीने गए हैं.' वहीं नागेंद्र चतुर्वेदी ने निराश होते हुए अपनी बेबसी जताई, 'यह तो पिछले पांच साल से रोज की ही कहानी है.'

अस्पताल की डिस्पेंसरी
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दवा काउंटर पर भी यही हाल
दवाओं के लिए डिस्पेंसरी का हाल भी जुदा नहीं था. एक महीने से एक दवा के लिए भटक रहे शिवम कुमार ने स्टाफ की बदतमीजी की शिकायत की.
वहीं धीर कुमार सिंह ने कहा, 'पूरी दवा कभी नहीं मिलती. कहते हैं चार दिन बाद आना. प्राइवेट नौकरी में बार-बार छुट्टी लेना बहुत मुश्किल होता है. उन्होंने कहा कि उनकी गर्दन की हड्डी में दिक्कत है. हमने तीन-चार महीने पहले दिखाया था. लेकिन उस वक्त डॉक्टर ने कोई ध्यान नहीं दिया. बाद में नौकरी वालों ने भी हमें फैक्ट्री में डाल दिया. इससे परेशानी और बढ़ गई. बहुत दिक्कत में हैं.

डिस्पेंसरी के बाहर खराब पानी की मशीन
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'शोपीस' पानी की मशीन और जंजीरों में कैद गिलास
अस्पताल के संवेदनहीन रवैये का सबसे बड़ा सुबूत डिस्पेंसरी के सामने रखी पानी की मशीन थी. मशीन दिखने में बेहद एडवांस और हाई-टेक थी, लेकिन बटन दबाने पर उसमें से एक बूंद पानी नहीं टपका. मशीन के बगल में दो स्टील के गिलास मोटी जंजीरों से बंधे लटक रहे थे. यह नजारा अपने आप में एक कड़वा सच था. अस्पताल प्रशासन को गिलास चोरी होने का इतना डर है कि उसे जंजीर से बांध दिया, लेकिन चिलचिलाती गर्मी में कतारों में खड़े मरीजों के सूखते हलक की उन्हें कोई फिक्र नहीं है. पानी की वह मशीन सिर्फ एक 'शोपीस' बनकर रह गई है.

अस्पताल की जर्जर छत लटकते तार
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मरीजों का दर्द, खाली कुर्सियां और जंजीरों में बंधे सूखे गिलास... यह ESIC अस्पताल सेक्टर 24 की वह जमीनी हकीकत है, जो सरकार के कागजी दावों की पोल खोल रही है. अगर वाकई सरकार ESIC कार्ड धारकों को प्राइवेट अस्पतालों में इलाज की सुविधा देती है, तो शायद इन जर्जर सरकारी ढांचों में पिसते मरीजों को उनका वो 'सुकून' वापस मिल सके, जिसकी कीमत वे हर महीने अपनी तनख्वाह से चुकाते हैं.