- उत्तराखंड हिमालय क्षेत्र में वर्तमान में लगभग 1290 ग्लेशियर झीलें हैं, जिनकी संख्या और आकार बढ़ रहे हैं.
- NDMA ने 2024 में उत्तराखंड की 13 ग्लेशियर झीलों को अतिसंवेदनशील श्रेणी में रखा, जिनसे अधिक खतरा है.
- लेकिन इस पहचान के दो साल बाद भी अर्ली अलार्म के लिए जरूरी उपकरण अभी तक नहीं लग सके हैं.
नेपाल में आए विनाशकारी जलप्रलय के बाद एक बार फिर हिमालय में मौजूद ग्लेशियर झीलों को लेकर वैज्ञानिकों ने अपनी चिंता जतानी शुरू कर दी है. वैज्ञानिकों की यह चिंता उत्तराखंड के हिमालय क्षेत्र के लिए अधिक संवेदनशील है. क्योंकि केदारनाथ त्रासदी, धराली आपदा, रैणी आपदा, तमक नाले का सैलाब जैसे कई भीषण आपदाएं उत्तराखंड बीते कुछ सालों में झेल चुका है. उत्तराखंड के हिमालय क्षेत्र में सैकड़ों ग्लेशियर झीलें हैं, जिनकी निगरानी पर चर्चाएं तेज हो गई है. उत्तराखंड में मौजूद हजारों ग्लेशियर झीलों में से करीब 426 ग्लेशियर झील ऐसे हैं, इनका आकार 1000 वर्ग मीटर से अधिक है. मौजूदा समय में उत्तराखंड में ग्लेशियरों झीलों की संख्या 1290 है. इसके साथ ही ग्लेशियर झीलों का दायरा भी 8.1% तक बढ़ गया है. वैसे साल 2015 में जब वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी ने स्टडी की थी तो उस दौरान हिमालय क्षेत्र में 1266 ग्लेशयर पाए गए थे.
नेपाल में हिमालय से आए सैलाब ने कितनी भारी तबाही मचाई है कि इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है. शायद यह इस सदी की सबसे भयानक त्रासदी है. हिमालय से निकली सुनामी ने मैदान क्षेत्र में सब कुछ तिनके की तरह उखाड़ दिया और इसकी वजह वैज्ञानिक पिछले लंबे समय से ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन को बता रहे हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं. उसका दायरा कम हो रहा है. ऐसे में ग्लेशियर के मुहाने पर ऐसी झीलें बन रही हैं, जो बेहद खतरनाक है.

राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण (NDMA) ने 2024 में उत्तराखंड राज्य आपदा प्राधिकरण को 13 ऐसी अतिसंवेदनशील और संवेदनशील ग्लेशियर झीलों के बारे में बताया था, जो आज भी खतरा बनी हुई है. लेकिन इन 13 ग्लेशियर झीलों में 5 सबसे ज्यादा खतरनाक है. जिनका आकार काफी बढ़ गया है.
उत्तराखंड की 1200 ग्लेशियर झीलों में से 13 अति संवेदनशील
साल 2024 में NDMA ने ग्लेशियर झीलों की स्टडी के बाद एक रिपोर्ट बनाई थी, इसके अनुसार, उत्तराखंड में मौजूद 1200 ग्लेशियर झीलों में से 13 ग्लेशियर झीलों को अति संवेदनशील और संवेदनशील श्रेणी में रखा था. एनडीएमए ने झीलों को संवेदनशीलता के आधार पर तीन कैटेगरी में रखा था. अति संवेदनशील 5 ग्लेशियर झीलों को A कैटेगरी में, कम संवेदनशील वाले चार झीलों को B कैटेगरी में और कम संवेदनशील 4 झीलों को C कैटेगरी में रखा गया था.
उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग ने अति संवेदनशील श्रेणी में रखे गए पांच ग्लेशियर झीलों के निगरानी का निर्णय लिया था. इसके लिए उत्तराखंड सरकार ने प्रदेश में मौजूद अतिसंवेदनशील और संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की निगरानी के लिए वाडिया इंस्टीट्यूट को नोडल विभाग बनाया गया. ताकि इन सभी ग्लेशियर झीलों का बेहतर ढंग से अध्ययन कराए जाने के साथ ही लगातार मॉनिटरिंग के लिए इक्विपमेंट लगाए जा सके.

उत्तराखंड के ग्लेशियर लेक.
Photo Credit: NDTV
खतरनाक झीलों की हो चुकी स्टडी
साल 2024 से 2026 के बीच चार ग्लेशियर झीलों का अध्ययन कराया गया. जिसमें चमोली जिले में स्थित वसुंधरा ताल का बाथीमेट्री ग्लेशियोलॉजिकल अध्ययन, पिथौरागढ़ जिले में स्थित माबांग झील का ग्लेशियोलॉजिकल अध्ययन, पिथौरागढ़ जिले में स्थित स्यूंतियांक्ति झील का बाथीमेट्री ग्लेशियोलॉजिकल अध्ययन, पिथौरागढ़ जिले में स्थित प्युंगरु झील का बाथीमेट्री ग्लेशियोलॉजिकल अध्ययन कराया जा चुका है.
इन सभी जिलों की लगातार मॉनिटरिंग के लिए इक्विपमेंट्स लगाए जाने हैं, जिसकी जिम्मेदारी वाडिया इंस्टीट्यूट को सौंपी गई है. लेकिन अभी तक इन जिलों में इक्विपमेंट्स नहीं लगाए जा सके हैं.
NDMA ने 2024 में शुरू किया विशेष अभियान
ऐसे खतरों को समय रहते टालने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने साल 2024 में एक विशेष अभियान शुरू किया था. जिसका उद्देश्य वैज्ञानिक अध्ययन, जोखिम आंकलन, न्यूनीकरण उपाय के साथ ही प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित कर संभावित आपदा के प्रभाव को कम किया जा सके. यही नहीं, इस परियोजना के तहत उत्तराखंड राज्य के लिए 30 करोड़ रुपए की परियोजना स्वीकृत की गई.

उत्तराखंड के ग्लेशियर लेक.
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जिसमें केंद्र का अंश 90 फीसदी और राज्य का अंश 10 फीसदी है. इस परियोजना के लिए केंद्र सरकार 27 करोड रुपए देगी और उत्तराखंड सरकार को 3 करोड़ रुपए खुद से वहन करने होंगे. पहले किस्त रूप में भारत सरकार की ओर से 8.10 धनराशि भी प्राप्त हो गई है. बावजूद इसके अभी तक ग्लेशियर झीलों की निगरानी के लिए इक्विपमेंट्स लगाने की प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई है.
उत्तराखंड की अति संवेदनशील ग्लेशियर झीलें
उत्तराखंड की चिह्नित 13 में से 5 झीलें A कैटेगरी में हैं, जो सबसे ज्यादा खतरे की जद में हैं. इनमें से चार झीलें पिथौरागढ़ जिले तो एक चमोली जिले में है. B कैटेगरी वाली 4 झीलों में से 1 चमोली में, 1 टिहरी में और 2 झीलें पिथौरागढ़ में मौजूद हैं. इसके बाद की C कैटेगरी की 4 झीलें उत्तरकाशी, चमोली और टिहरी में मौजूद हैं.
• चमोली : वसुधारा व तीन अन्य
• उत्तरकाशी : केदार ताल
• बागेश्वर : नागकुंड
• पिथौरागढ़: मबांग, पियुग्रू व चार अन्य
• टिहरी : मासुरी ताल
उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों के आंकड़ें
अगर पूरे उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलें के आंकड़ों को देखें टोंस बेसिन में 52 ग्लेशियर झीलें, यमुना बेसिन में 13 ग्लेशियर झीलें, भागीरथी बेसिन में 306 ग्लेशियर झीलें, भीलंगना बेसिन में 22 ग्लेशियर झीलें, मंदाकिनी बेसिन में 19 ग्लेशियर झीलें, अलकनंदा बेसिन में 635 ग्लेशियर झीलें, पिंडारी बेसिन में 7 ग्लेशियर झीलें, गोरी गंगा बेसिन में 92 ग्लेशियर झीलें, धौली गंगा बेसिन में 75 ग्लेशियर झीलें, कुटियांगति बेसिन में 45 ग्लेशियर झीलें रिकॉर्ड की गई हैं.
आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव बोले- निगरानी के लिए क्या काम हो रहा?
आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव सुमन ने बताया कि ग्लेशियर झीलों की निगरानी के साथ-साथ ऐसी व्यवस्थाओं को विकसित किया जा रहा है, जिससे संभावित खतरे की स्थिति में चेतावनी से लेकर राहत एवं बचाव तक की पूरी प्रक्रिया प्रभावी ढंग से काम कर सके. इसके तहत संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की निरंतर निगरानी, अत्याधुनिक सेंसर एवं अर्ली वार्निंग उपकरणों की स्थापना, रियल टाइम डेटा प्राप्त करने की व्यवस्था, आवश्यकतानुसार उपकरणों की संख्या बढ़ाना, चेतावनी के लिए वैकल्पिक संचार माध्यम विकसित करना तथा संभावित प्रभावित क्षेत्रों में स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों की तैयारियों को मजबूत किया जाएगा. संवेदनशील क्षेत्रों में स्थानीय लोगों को भी संभावित खतरों एवं आपदा के समय अपनाई जाने वाली सुरक्षित प्रक्रियाओं के संबंध में जागरूक किया जाएगा.
वाडिया इंस्टीट्यूट के निदेशक ने गिताई समस्याएं
वहीं वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के निदेशक डॉ विनीत कुमार गहलोत ने कहा कि उत्तराखंड राज्य में मौजूद अति संवेदनशील 5 ग्लेशियर झीलों पर स्टडी हुई हैं. लेकिन सबसे बड़ा काम वहां पर अर्ली मॉर्निंग इंस्ट्रूमेंट लगाना बाकी है, जिसकी प्रक्रिया जारी है. साथ ही वहां एक बड़ी समस्या कम्युनिकेशन की है. हालांकि, सैटलाइट कम्युनिकेशन की व्यवस्था की जा सकती है, लेकिन वो काफी अधिक महंगा है. इसके अलावा, वहां की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार, बैटरी पावर की बेहतर सुविधा नहीं मिल पा रही है, जिस वजह से इक्विपमेंट्स लगाने में देरी हो रही है. लेकिन उम्मीद है कि अगले कुछ महीने में इस दिशा में कोई बेहतर काम किया जाएगा.
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