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कैसे बगावत और टूट-फूट ने NSUI को हराया, अगर दो चीजें ठीक होतीं तो DUSU चुनाव में क्लीन स्वीप करती पार्टी!

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संग चुनाव के नतीजों में कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI को बड़ा झटका लगा है. चार सीटों में से एक भी सीट NSUI को नहीं मिली. जिसमें टिकट वितरण एक बड़ी कमी के रूप में सामने आया है.

कैसे बगावत और टूट-फूट ने NSUI को हराया, अगर दो चीजें ठीक होतीं तो DUSU चुनाव में क्लीन स्वीप करती पार्टी!
NSUI का सेल्फ गोल
  • दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव के नतीजों में NSUI को बड़ा झटका लगा है.
  • NSUI का DUSU के रिजल्ट में सूपड़ा साफ हो गया और एक भी सीट नहीं मिली.
  • इस नतीजों को NSUI का सेल्फ गोल माना जा रहा है, क्योंकि टिकट वितरण में कमी नजर आई है.
नई दिल्ली:

दिल्ली विश्विद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव में कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई का खाता नहीं खुला, लेकिन उसके बागी उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने 13000 से ज्यादा वोटों से उपाध्यक्ष पद पर जीत दर्ज कर सबको चौंका दिया. वहीं ABVP ने तीन सीटें जीती. जिसमें अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव का पद शामिल है. अगर दिल्ली छात्र संघ चुनाव में कांग्रेस पार्टी केवल दो चीजें ठीक कर लेती तो उसका DUSU चुनाव में परचम लहरा सकती थी. पहला, शौकीन को अपना आधिकारिक कैंडिडेट घोषित करना और दूसरा गोपाल चौधरी की जगह विशेष यादव को तवज्जो देना. लेकिन पार्टी ने शीर्ष नेतृत्व ऐसा कर पाने में असफल रही. नतीजे सबके सामने है. 

दो सीटों पर करीबी रहा मुकाबला 

चुनावों में अध्यक्ष और संयुक्त सचिव पद पर मुकाबला बेहद नज़दीकी रहा. संयुक्त सचिव और उपाध्यक्ष पद पर NSUI तीसरे स्थान पर रही. संयुक्त सचिव के पद पर उसके बागी दूसरे नंबर पर रहे तो उपाध्यक्ष पद पर NSUI के उम्मीदवार को नोटा से भी कम वोट मिले. चुनाव नतीजों से साफ हो गया कि NSUI ने टिकट बांटने में बड़ी गलती की. अगर संगठन एकजुट होकर चुनाव लड़ता तो मुकाबला दो-दो की बराबरी पर छूटता, या इससे भी बड़ी सफलता मिल सकती थी. लेकिन नतीजों में NSUI पूरी तरह से साफ हो गई. 

क्यों अहम था DUSU इलेक्शन 

इस बार का DUSU चुनाव दिलचस्प था. दरअसल, नीट पेपर लीक के खिलाफ जंतर मंतर पर हुए ऐतिहासिक आंदोलन और शिक्षा-रोजगार के मुद्दे पर मोदी सरकार के खिलाफ नेता विपक्ष राहुल गांधी के आक्रामक अभियान की वजह से कैंपस में माहौल बीजेपी समर्थित छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के लिए आसान नहीं था. डूसू चुनाव से ठीक पहले विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास एक प्राइवेट हॉस्टल की इमारत ढह गई जिसमें कुछ छात्रों की मौत हो गई. लेकिन इन सब के बावजूद डूसू चुनाव में एनएसयूआई खाली हाथ रह गई. डूसू चुनाव के नतीजों के कुछ घंटे बाद ही राहुल गांधी ने इंदौर में 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम को संबोधित किया. लेकिन चर्चा में तो 'डूसू की गूंज' रही. 

कन्हैया कुमार के फैसले पर उठे सवाल 

नतीजों के बाद एनएसयूआई के प्रभारी कन्हैया कुमार के फैसलों पर सवाल उठाए जा रहे हैं. कन्हैया बीते तीन सालों से कांग्रेस के छात्र संगठन के प्रभारी हैं. सूत्रों के मुताबिक पार्टी आलाकमान ने उनसे डूसू चुनाव की पूरी रिपोर्ट तलब की है. सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर एनएसयूआई ने कुल्हाड़ी पर पैर क्यों मारा? मजबूत नेताओं का टिकट आखिर किसने और क्यों काटा?

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दीपांशु ने उपाध्यक्ष पद के लिए मांगा था टिकट 

एनएसयूआई के मुताबिक दीपांशु शौकीन को अध्यक्ष पद पर चुनाव लड़ने को कहा गया था, लेकिन वो इसके लिए तैयार नहीं थे. उन्होंने संगठन के शीर्ष नेताओं से कहा कि वो अध्यक्ष पद की बजाय उपाध्यक्ष पद पर चुनाव लड़ना चाहते हैं. सूत्रों का दावा है दीपांशु को आशंका थी कि अध्यक्ष पद पर एबीवीपी के उम्मीदवार यश डबास को वो टक्कर नहीं दे पाएंगे. जाट समाज से आने वाले दोनों छात्र नेता दिल्ली के एक ही इलाके से आते हैं. एनएसयूआई के एक उच्च सूत्र ने NDTV से कहा 'इस बार दीपांशु हमारा सबसे दमदार उम्मीदवार था. वो काफी समय से कैंपस में सक्रिय था और एक मजबूत टीम उसके साथ थी. इसी वजह से हम उसे अध्यक्ष पद पर उतार कर उन्हें अपने पैनल का चेहरा बनाना चाहते थे.' 

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आखिरी वक्त में बदले NSUI के समीकरण 

सूत्रों में मुताबिक NSUI ने दीपांशु शौकीन को अध्यक्ष, विजय शंकर मीणा को उपाध्यक्ष, नम्रता चौधरी को सचिव और विशेष यादव को संयुक्त सचिव के पद पर उतारने की रणनीति बनाई थी. लेकिन नाम वापसी से ठीक पहले जब दीपांशु को इसकी जानकारी दी गई तो उन्होंने अध्यक्ष पद पर उतरने से साफ इंकार कर दिया और उपाध्यक्ष पद पर चुनाव लड़वाने के लिए दबाव बनाने लगे. उन्होंने अन्य तीनों पदों से नाम वापस ले लिए. एनएसयूआई प्रभारी कन्हैया कुमार ने इसे विरोधी गुट के साथ मिलीभगत और अनुशासनहीनता मानते हुए दीपांशु को पैनल से बाहर कर दिया और फिर विजय शंकर मीणा का नाम बतौर अध्यक्ष उम्मीदवार तय किया गया. उपाध्यक्ष पद पर वीर चतरथ के नाम पर मुहर लगाई जो पहले पैनल में शामिल नहीं थे. सचिव पद पर नम्रता चौधरी का नाम पहले से फाइनल था.

विशेष यादव की भी बगावत 

अब संयुक्त सचिव के पद पर नया पेंच फंस गया. दरअसल दिल्ली विश्विद्यालय छात्र संघ चुनाव में जाट समुदाय के छात्रों का काफी दबदबा माना जाता है. दीपांशु को पैनल से बाहर करने के बाद जाट वोटों का संतुलन साधने के लिए संयुक्त सचिव पद पर विशेष यादव की जगह गोपाल चौधरी का नाम तय हुआ. इस वजह से विशेष यादव ने भी बगावत कर दी. एनएसयूआई का एक बागी उम्मीदवार (समर्थ बेनीवाल) अध्यक्ष पद पर भी था, लेकिन बाद में किन्हीं कारणों से उन्होंने कोई ख़ास प्रचार नहीं किया. कुल मिलाकर चुनाव प्रचार शुरू होने से पहले ही एनएसयूआई के खेमे में खलबली मच चुकी थी. 

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केसी वेणुगोपाल तक पहुंची जानकारी 

बगावत की खबरें जब कांग्रेस आलाकमान तक पहुंची तो कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने आनन-फानन में बैठक बुलाई. सूत्रों में मुताबिक इस बैठक वेणुगोपाल ने टिकट बंटवारे को लेकर नाराज़गी जताते हुए कहा कि उनसे राहुल गांधी ने जवाब तलब किया है. कन्हैया कुमार उनके निशाने पर रहे. बैठक में सचिन पायलट, दीपेंद्र हुड्डा, एनएसयूआई, यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष तक शामिल थे. कांग्रेस को डूसू में मौका हाथ से फिसलने का एहसास हो चुका था, लेकिन फिर भी नेताओं को पूरा जोर लगाने के निर्देश दिए गए ताकि डैमेज कंट्रोल किया जा सके. 

बैठक में कुछ युवा नेताओं ने यह सुझाव भी दिया कि एनएसयूआई को रणनीति में बदलाव कर बागी उम्मीदवारों यानी दीपांशु और विशेष को अधिकारिक उम्मीदवार घोषित करना चाहिए? लेकिन इस पर खुल कर चर्चा नहीं हुई. उस बैठक में मौजूद एक नेता ने चुनाव ने कहा कि सबने खानापूर्ति की. चुनाव की बजाय 'तथाकथित अनुशासन और अपनी प्रतिष्ठा' बचाने को प्राथमिकता दी गई. 

दीपांशु शौकीन की लहर

दूसरी तरफ़ उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन के पक्ष में कैंपस से लेकर सोशल मीडिया तक जबरदस्त सहानुभूति बढ़ने लगी. दीपांशु ने एनएसयूआई की तरफ से उन्हें अध्यक्ष पद के ऑफर के दावों का भी स्पष्ट तौर पर खंडन किया. दीपांशु की जगह एनएसयूआई ने जिस वीर चतरथ को उपाध्यक्ष उम्मीदवार बनाया था उनके पिता मनीष चतरथ कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता हैं. वो पार्टी मुख्यालय 'इंदिरा भवन' के प्रभारी हैं और उन्हें गांधी परिवार का करीबी माना जाता है. दीपांशु के पिता डीटीसी (दिल्ली परिवहन निगम) में बस कंडक्टर हैं. दीपांशु के समर्थकों ने इस पहलू का खूब प्रचार किया कि 'नेता पुत्र' को टिकट देने की जिद में  एनएसयूआई ने 'जमीनी कार्यकर्ता' की उपेक्षा की है. दूसरी तरफ संयुक्त सचिव के पद पर एनएसयूआई के बागी विदेश यादव को समाजवादी पार्टी की छात्र इकाई ने अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया. उन्होंने भी अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया.

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NSUI ने लगाई ताकत

माहौल को भांपते हुए एनएसयूआई ने पूरी ताकत अध्यक्ष पद पर झोंक दी.आदिवासी समाज से आने वाले उम्मीदवार विजय शंकर मीणा और दलित समाज से आने वाले संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद जाखड़ की जोड़ी को सामाजिक न्याय की राजनीति के तौर पर पेश किया गया. सोशल मीडिया पर मीणा के पक्ष में भी सहानुभूति बढ़ने लगी. मीणा के पक्ष में 'गैर जाट' वोटरों को गोलबंद करने की कोशिश हुई. इन सब की वजह से विजय शंकर अचानक से लड़ाई में आ गए. काउंटिंग के दौरान वो ज्यादातर राउंड में बढ़त बनाए हुए थे. लेकिन अंत में करीब दो हजार वोटों से हार गए. उपाध्यक्ष पद पर जाट एकजुटता की आंधी में दीपांशु शौकीन के सामने एबीवीपी के इशू मौर्य टिक नहीं पाए. एनएसयूआई के वीर चतरथ को नोटा से भी कम वोट मिले. सचिव पर सामान्य मुकाबले में एबीवीपी की रिया छावड़ी ने एनएसयूआई की उम्मीदवार को करीब सात हजार वोटों से हराया.

NSUI का धांधली का आरोप

वहीं संयुक्त सचिव पद पर एबीवीपी, एनएसयूआई और विशेष यादव के बीच त्रिकोणीय मुकाबला हुआ. लगातार पिछड़ने के बाद एबीवीपी के लक्ष्य राज लगभग आखिरी दौर में आगे निकले. विशेष दूसरे और एनएसयूआई के गोपाल तीसरे स्थान पर रहे. हालांकि चुनाव नतीजों के बाद एनएसयूआई ने धांधली के आरोप लगाए लेकिन साफ है कि किस तरह अपरिपक्व फैसलों के चलते एनएसयूआई ने एक लगभग तय क्लीन स्वीप को हार में तब्दील कर लिया. एनएसयूआई नेतृत्व की पकड़ अपने उन छात्र नेताओं पर नहीं थी जिन पर वो दांव लगाने जा रहे थे. साथ ही उन्हें ज़मीनी हकीकत अंदाजा भी नहीं था और शायद वो अति आत्म विश्वास में भी थे. 

NSUI के फैसलों पर उठे सवाल

उठ रहे सवालों पर कन्हैया कुमार के एक करीबी नेता ने कहा कि डूसू चुनाव में पुराने नेताओं और जातीय समीकरणों की लॉबी काम करती है. वो अपने मुताबिक उम्मीदवार और पद तय करने की कोशिश करते हैं. इसी रणनीति के तहत एक लॉबी एबीवीपी के यश डबास को अध्यक्ष और एनएसयूआई से दीपांशु को उपाध्यक्ष बनाना चाहते थी. ऐसी मैच फिक्सिंग सालों से चलती आई है. उन्होंने कहा 'क्या हम इन जातीय-क्षेत्रीय लॉबी के द्वारा तय किए गए, उम्मीदवारों का चुनाव  इलेक्शन संभालने की मशीन बन कर रह जाएं? हम इस बार उनके दबाव में नहीं आए.' इस नेता ने यह भी कहा कि बागी उम्मीदवारों को बिठाने के लिए पार्टी ने बड़े नेताओं को जो काम करना चाहिए था वो नहीं किया गया.' बचाव में दलील जो भी दी जाए लेकिन किसी के पास ठोस जवाब नहीं है कि किस 'अनुभव और मेहनत' के चलते  वीर चतरथ को सीधे डूसू चुनाव में उतार दिया गया ? और जब समय रहते साफ हो गया था कि वो उपाध्यक्ष पद पर बुरी तरह चुनाव हारेंगे तो फिर पार्टी में बड़े नेताओं ने समय रहते 'भूल सुधार' की कोशिश क्यों नहीं की ?

टिकट वितरण में कन्फ्यूजन 

इस एक टिकट की वजह से देश के सबसे बड़े छात्र संघ चुनाव में एनएसयूआई खाली हाथ रह गई. जाहिर है इससे कांग्रेस और राहुल गांधी को झटका तो लगा ही है. आंकड़े बताते हैं कि टिकट बंटवारे में एनएसयूआई नेतृत्व ने व्यावहारिक रूख अपनाया होता तो राहुल गांधी देश की राजधानी से एक बड़ा सियासी संदेश देने का मौका मिल जाता.  एनएसयूआई के प्रभारी कन्हैया कुमार 2015 में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष बने थे. तब वामपंथी एआईएसएफ उम्मीदवार के तौर पर उन्होंने बिना संगठन और संसाधन के केवल अपने भाषण की बदौलत चुनाव जीता था. एनएसयूआई के अध्यक्ष विनोद जाखड़ ने 2018 में राजस्थान विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव एनएसयूआई से बगावत कर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीता था. दोनों नेता छात्र राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी हैं. लेकिन सूत्रों के मुताबिक एनएसयूआई के दोनों अगुआ नेताओं के बीच सब कुछ ठीक नहीं है. टिकट बंटवारे में कन्फ्यूजन और सेल्फ गोल के पीछे इसे सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है. 

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