नेपाल जल प्रलय: प्राकृतिक आपदा से कैसे बेहतर तरीके से लड़ें, भारत को भी भूटान से सीखने की जरूरत

वैसे तो कोई भी देश बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, बड़े निर्माण और अच्छी सड़कें चाहता है, लेकिन भूटान इस अंधे शहरीकरण में पूरी तरह नहीं फंसा है.

नेपाल जल प्रलय: प्राकृतिक आपदा से कैसे बेहतर तरीके से लड़ें, भारत को भी भूटान से सीखने की जरूरत
नेपाल में तबाही और भूटान की मिसाल

नेपाल में जल प्रलय के बाद से हालात विस्फोटक बने हुए हैं. राहत और बचाव कार्य जारी है, लेकिन मृतकों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है. 400 भारतीय भी इस समय लापता बताए जा रहे हैं.

प्राकृतिक आपदा को आने से कभी भी रोका नहीं जा सकता, लेकिन प्राकृतिक आपदा के बाद होने वाले नुकसान को जरूर कम किया जा सकता है. भारत में जब पहाड़ी राज्यों में लगातार कई दिनों तक बारिश होती है तो बाढ़ से लेकर लैंडस्लाइड की समस्या पैदा हो जाती है. कई लोग अपनी जान गंवाते हैं, कई सड़कें खराब हो जाती हैं और कई दिनों के लिए व्यवस्था चरमरा जाती है.

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लेकिन भारत और नेपाल दोनों एक छोटे से देश से काफी कुछ सीख सकते हैं. यह देश भी पहाड़ों में बसा है, यह देश भी प्राकृतिक रूप से कई चुनौतियों का सामना करता है, लेकिन फिर भी यहां हालात कभी विस्फोटक नहीं बनते और व्यवस्था सही बनी रहती है. हम बात कर रहे हैं भूटान की.

भूटान की सीमित जनसंख्या

भूटान ने प्रकृति के साथ ऐसा संतुलन बनाया है कि वहां इस तरह की चुनौती अपेक्षाकृत कम देखने को मिलती है. वर्तमान में भूटान की जनसंख्या करीब 0.79 करोड़ है. वहीं, दूसरी तरफ उत्तराखंड की आबादी 1.23 करोड़ और जम्मू-कश्मीर की 1.58 करोड़ है. हिमाचल प्रदेश की भी जनसंख्या 75.18 लाख दर्ज की गई है. यह बताने के लिए काफी है कि जितनी जनसंख्या भारत के पहाड़ी राज्यों की है, उससे कम लोग भूटान में रहते हैं.

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फ्लैश फ्लड और तेज बारिश की वजह से लैंडस्लाइड का आना एक आम समस्या है, लेकिन पहाड़ों को दरकने से रोका जा सकता है, अगर पेड़ों की कटाई को कम किया जाए. भारत के पहाड़ी राज्यों में कभी निर्माण के नाम पर, तो कभी विकास के नाम पर लगातार पेड़ काटे जाते हैं. बात चाहे उत्तराखंड की हो, हिमाचल प्रदेश की हो या फिर जम्मू-कश्मीर की.

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पेड़ो की कटाई बनी चुनौती

लेकिन यहां भी भूटान ने एक ऐसी नीति अपनाई है कि वहां पेड़ काटने से ज्यादा पेड़ लगाए जाते हैं. ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश में 2020 तक करीब 1.59 मिलियन हेक्टेयर नेचुरल फॉरेस्ट था. अगर इसे कुल लैंड एरिया के हिसाब से देखें, तो यह करीब 29 प्रतिशत बैठता है. लेकिन सिर्फ चार साल बाद, यानी 2024 में, हिमाचल प्रदेश में करीब 572 हेक्टेयर नेचुरल फॉरेस्ट कम हो चुका था. इसे 181 किलोटन CO₂ उत्सर्जन के बराबर माना जा सकता है.

इसी तरह उत्तराखंड की स्थिति देखें तो 2020 में यहां करीब 1.66 मिलियन हेक्टेयर नेचुरल फॉरेस्ट था. इसे हम कुल क्षेत्रफल का करीब 32 प्रतिशत कह सकते हैं. लेकिन इसके चार साल बाद यह संख्या करीब 998 हेक्टेयर कम हो गई. इसे 412 किलोटन CO₂ उत्सर्जन के बराबर कहा जा सकता है.

जम्मू-कश्मीर को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है. उसके मुताबिक, 2020 तक करीब 0.153 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में मौजूद जंगलों में तीन साल के अंदर 112 हेक्टेयर जंगल नष्ट हो गया. इसे 68.8 किलोटन कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन के बराबर माना जा सकता है.

वहीं, अगर भूटान की स्थिति देखें तो वहां हर कीमत पर 60 फीसदी क्षेत्र को हमेशा जंगल बनाए रखने का लक्ष्य है. एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में भूटान के करीब 72 प्रतिशत क्षेत्र में जंगल हैं. ये जंगल करीब 60 लाख टन CO₂ सोखने की क्षमता रखते हैं.

इसके अलावा, भूटान लगातार पेड़ लगाने पर भी जोर दे रहा है. Million Fruit Tree Plantation Project, De-Suung National Service: Million Fruit Trees Plantation और Green Bhutan जैसे प्रोजेक्ट इस समय बड़े स्तर पर चलाए जा रहे हैं. इन योजनाओं के दम पर भूटान में 2,525,000 पेड़ लगाए जा चुके हैं. इसके अलावा, Bhutan Ecological Society भी लगातार पेड़ लगाने पर फोकस कर रही है.

भूटान के विकास का पैमाना

वैसे तो कोई भी देश बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, बड़े निर्माण और अच्छी सड़कें चाहता है, लेकिन भूटान इस अंधे शहरीकरण में पूरी तरह नहीं फंसा है. प्रकृति को बचाने के लिए वह Gross National Happiness के विकास मॉडल को ज्यादा महत्व देता है. ऐसे में सिर्फ आर्थिक वृद्धि पर जोर नहीं दिया जा रहा, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय कल्याण को भी ज्यादा तवज्जो दी जा रही है.

भूटान में एक और ऐसी नीति है, जो उसे दूसरे देशों से अलग करती है. यहां पर्यटकों की एक सीमित संख्या ही आ सकती है. भारत के पहाड़ी राज्यों में देखा जाता है कि गर्मी आते ही परिवार पहाड़ों की तरफ भागते हैं. इस वजह से हिल स्टेशनों पर बेतहाशा भीड़ देखने को मिलती है. बाद में ट्रैफिक जाम लगता है और कई दूसरी तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.

हर पर्यटक से फीस लेता भूटान

लेकिन भूटान में ऐसा नहीं देखने को मिलता. वहां हर पर्यटक पर Sustainable Development Fee लगाया जाता है. भारत के लोगों के लिए यह फीस 1,200 रुपये है, जबकि दूसरे देशों के पर्यटकों से प्रति व्यक्ति 8,300 रुपये तक लिए जाते हैं.

इस नीति की वजह से भूटान में सीमित पर्यटन को बढ़ावा मिलता है और दूसरी तरफ इसी फीस से अच्छा राजस्व भी आता है. इसी नीति को भूटान की ‘High Value, Low Volume' पर्यटन नीति कहा जाता है.

भूटान की इन्हीं नीतियों की वजह से पहाड़ों में बसने के बाद भी वहां प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए बेहतर मैनेजमेंट देखने को मिलता है. वहीं, नेपाल और भारत को लगातार कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.