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12-13 के भाई बहन के सवाल का मेरे पास कोई जवाब न था… नेपाल की वो कहानियाँ जो कैमरा देख न पाया

उस कमरे में जाकर पता चला 170 शव कितने होते हैं? नेपाल की वो कहानियां जो कैमरा देख न पाया. NDTV आपतक नेपाल की वो कहानियां पहुंचा रहा है जिसे कैमरे से दिखा और बता पाना संभव नहीं है.

नेपाल बाढ़ के बाद 10 दिन की ग्राउंड रिपोर्टिंग में रिपोर्टर ने जो देखा और जिसे कैमेरा रिकॉर्ड नहीं कर सका, उसकी कहानी.
NDTV
काठमांडू:

नेपाल में बाढ़ की रिपोर्टिंग करते हुए आज दस दिन हो गए हैं. दस दिन पहले जब मैं कैमरा और माइक लेकर निकला था, तब मुझे नहीं पता था कि अगले दस दिन मुझे ऐसी कहानियों के बीच ले जाएंगे, जिन्हें मैं शायद जिंदगी भर अपने भीतर लेकर चलूंगा. एक रिपोर्टर के लिए आपदा की कवरेज का मतलब होता है—ग्राउंड पर जाना, हालात देखना, लोगों से बात करना और उनकी कहानी दुनिया तक पहुंचाना. लेकिन इन दस दिनों में मैंने महसूस किया कि कुछ कहानियां कैमरे तक पहुंचती हैं और कुछ सिर्फ आपकी आंखों के सामने से गुजरकर आपके भीतर हमेशा के लिए रह जाती हैं.

नेपाल की इस बाढ़ में ऐसी बहुत सी कहानियां थीं. और शायद उनमें से कुछ सबसे ज्यादा दिल दहला देने वाली कहानियां वे थीं, जिन्हें मैं कैमरे पर ला ही नहीं पाया.

पहले दिन से ही तबाही का पैमाना डराने वाला था. सड़कें बह गई थीं. पुल टूट गए थे. घरों की जगह मलबा था. नदी अपने साथ सिर्फ पानी नहीं, लोगों की पूरी जिंदगी बहाकर ले गई थी.

त्रिशूली के राम बहादूर थापा, जिनका पूरा घर बह गया  

त्रिशूली में राम बहादुर थापा से मुलाकात हुई. उनका पूरा घर बह गया था.लेकिन सिर्फ घर ही नहीं गया था. उनके परिवार के कई लोग भी लापता थे. उनके सामने खड़े होकर उनसे बात करना मेरे लिए आसान नहीं था. वह अपने घर के मलबे के सामने खड़े थे, लेकिन उस मलबे में सिर्फ ईंट और पत्थर नहीं थे. उसमें उनकी पूरी जिंदगी थी. घर, सामान, यादें और अपने लोग.

मैं उनसे सवाल कर रहा था, लेकिन अंदर से बार-बार यही लग रहा था कि मैं जिस इंसान से सवाल पूछ रहा हूं, उसने शायद एक ही पल में अपनी पूरी दुनिया खो दी है.

त्रिशूली में एक ही परिवार के 25 लोग बह गए

त्रिशूली में एक और कहानी सामने आई, जिसने मुझे अंदर तक हिला दिया. एक ऐसा घर, जिसमें करीब 25 लोग रहते थे. बाढ़ आई और वे सभी बह गए. पच्चीस लोग. एक ही घर के. ऐसी खबर सुनना ही मुश्किल है. लेकिन उस जगह जाकर उसे अपनी आंखों से देखना उससे कहीं ज्यादा भारी था.

एक घर, जिसमें कभी इतने लोगों की आवाजें होती होंगी. बच्चे होंगे. बुजुर्ग होंगे. रोजमर्रा की जिंदगी होगी. और अब वहां सिर्फ खामोशी थी.

रिपोर्टर के तौर पर हम कई बार आंकड़े बोलते हैं—इतने लोग लापता, इतने शव बरामद, इतने घर तबाह. लेकिन उस घर के सामने खड़े होकर मुझे लगा कि 25 सिर्फ एक संख्या नहीं है. 25 चेहरे हैं. 25 नाम हैं. 25 रिश्ते हैं. 25 परिवारों की यादें हैं. और उन 25 लोगों के पीछे ऐसे लोग हैं जो शायद आज भी जवाब का इंतजार कर रहे हैं.

चितवन में 12-13 साल के छोटे बच्चे मां-पिता को तलाशते मिले

चितवन में भी एक ऐसा दृश्य देखा जिसे भूल पाना मुश्किल है. दो छोटे बच्चे मिले. उम्र करीब 12-13 साल. दोनों के मां और पिता गायब थे. उन बच्चों के पास शायद सबसे बड़ा सवाल यही था—मां और पापा कहां हैं?  उनसे बात करते हुए मेरे पास कोई ऐसा जवाब नहीं था जो उनका दर्द कम कर सके. मैं सिर्फ उनकी कहानी रिकॉर्ड कर सकता था. लेकिन उनकी आंखों में जो डर था, वह कैमरे से कहीं ज्यादा बड़ा था.

इन बच्चों को देखकर मुझे बार-बार यही लगा कि आपदा में सबसे ज्यादा कमजोर कौन होता है? शायद वह बच्चा, जिसे यह भी नहीं पता कि उसके माता-पिता लौटेंगे या नहीं.

चितवन की मॉर्चरी के एक कमरे में रखे थे 170 शव

इसी चितवन में मैंने नदी में जाकर शवों को निकालते हुए कवरेज की.लोग नदी में उतर रहे थे और एक-एक करके शव बाहर निकाले जा रहे थे फिर मैं मॉर्चरी पहुंचा. वहां करीब 170 शव रखे हुए थे. एक साथ इतने शवों को देखना मेरे लिए उन दस दिनों के सबसे भारी पलों में से एक था. हम खबर में कह सकते हैं—170 शव मिले. लेकिन उस कमरे में खड़े होकर समझ आया कि 170 का मतलब क्या होता है. 170 लोग. 170 परिवार , 170 कहानियां. 170 अधूरी जिंदगियां.

सामूहिक दाह संस्कार के दौरान मन में उठते रहे कई सवाल

इसके बाद मास ग्रेव पर गया. जहां उन लोगों को दफनाया जा रहा था, जिनकी पहचान या परिवार तक पहुंचना संभव नहीं हो पाया था. मिट्टी डाली जा रही थी और मेरे सामने सिर्फ एक सवाल था—कितने लोग ऐसे होंगे जिनके घर में आज भी कोई दरवाजे की तरफ देख रहा होगा? कितने लोग फोन का इंतजार कर रहे होंगे? कितने लोग अभी भी मान रहे होंगे कि शायद उनका अपना जिंदा है? यही इंतजार इस बाढ़ की सबसे दर्दनाक तस्वीरों में से एक रहा.

पशुपतिनाथ घाट पर प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार

पशुपतिनाथ के घाट पर कुछ परिवार अपने लापता लोगों का प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार कर रहे थे. शव नहीं था. लेकिन विदाई देनी थी. यह शायद किसी परिवार के लिए सबसे मुश्किल स्थिति होगी—न अपने की आखिरी झलक मिली, न शव मिला, लेकिन फिर भी दिल को समझाना पड़ा कि अब उन्हें विदा करना है. मैंने उस पल को कैमरे में रिकॉर्ड किया. लेकिन सच यह है कि कैमरा उस दर्द का शायद दस प्रतिशत भी नहीं दिखा सकता था.

इन दस दिनों में एक और बात मैंने बहुत करीब से महसूस की. हर कहानी कैमरे के लिए नहीं होती. हम पत्रकार अक्सर चाहते हैं कि जो देखा है, वह दर्शकों को भी दिखे. लेकिन हर इंसान कैमरे के सामने आना नहीं चाहता. और यह उसका पूरा अधिकार है.

कई लोग कैमरा देखते पीछे हट गए 

कई परिवार ऐसे मिले जो टूट चुके थे. वे बात करना नहीं चाहते थे. कैमरा देखते ही पीछे हट जाते थे. कुछ लोग अपने दुख को सार्वजनिक नहीं करना चाहते थे. हमने उनकी इस इच्छा का सम्मान किया. हमने कैमरा नीचे कर दिया. उनकी कहानी हमने स्क्रीन पर नहीं दिखाई. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे कहानियां हमारे साथ नहीं रहीं.

वो कहानियां, जिन्हें मेरी आंखों ने देखा लेकिन कैमरे में रिकॉर्ड नहीं कर सका

कई ऐसी कहानियां हैं जो कैमरे में रिकॉर्ड नहीं हुईं, लेकिन मेरी आंखों ने उन्हें देखा है. किसी मां का रोना.किसी पिता का चुपचाप बैठा रहना. किसी बच्चे का अपने माता-पिता का इंतजार करना. किसी परिवार का मलबे में अपने घर की चीजें तलाशना. किसी ऐसे व्यक्ति का अपने सामने बह चुके घर को देखते रह जाना, जिसके पास अब लौटने के लिए कुछ नहीं बचा था.

इनमें से बहुत कुछ कैमरे पर नहीं आया. लेकिन शायद पत्रकारिता का मतलब सिर्फ हर चीज कैमरे पर दिखाना भी नहीं है. कभी-कभी पत्रकारिता का मतलब यह समझना भी है कि सामने वाला इंसान पहले इंसान है और उसके बाद खबर. उसकी निजता उसकी कहानी से ज्यादा जरूरी है. इसीलिए कई दिल दहला देने वाली कहानियां हमने कैमरे पर नहीं दिखाईं.

लेकिन वे हमारे साथ होटल तक आईं. रात को जब कैमरा बंद हो जाता था, तब भी वे चेहरे सामने आते थे. और शायद यही इन दस दिनों की सबसे बड़ी थकान थी. शरीर की थकान तो आराम करने से चली जाती है. लेकिन आंखों के सामने देखे हुए दर्द की थकान इतनी आसानी से नहीं जाती.

इन सबके बीच कुछ ऐसी कहानियां भी आईं, जिन्होंने उम्मीद जिंदा रखी हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की सुरंग में फंसे दो लोगों का रेस्क्यू. नौ दिन तक बाहर की दुनिया से कटे रहने के बाद जब दोनों को जिंदा बाहर निकाला गया, तो लगा कि इतने दर्द के बीच भी जिंदगी हार नहीं मानती. मैंने उनके परिजनों से बात की. 

उनके चेहरे पर नौ दिनों का डर भी था और उस पल की खुशी भी, जब उन्हें पता चला कि उनका अपना जिंदा है. कबीर महर्जन के परिवार से बात करते हुए मुझे लगा कि शायद इस पूरी त्रासदी में ऐसी खबरें ही हमें संभालती हैं. एक तरफ परिवार अपने लोगों को खो रहे थे. दूसरी तरफ एक परिवार नौ दिन बाद अपने आदमी को वापस पा रहा था.

यही इस आपदा की सच्चाई थी

कहीं उम्मीद खत्म हो रही थी.कहीं उम्मीद बची हुई थी. इन दस दिनों में NDTV की स्क्रीन पर हमने नेपाल की बाढ़ की कई तस्वीरें दिखाईं. हमने त्रिशूली की तबाही दिखाई. लोगों के बह चुके घर दिखाए. चितवन में शवों को नदी से निकालते हुए कवरेज की. 170 शवों वाली मॉर्चरी दिखाई.

मास ग्रेव तक पहुंचे.लापता लोगों के परिवारों की पीड़ा दिखाई. प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार दिखाया. और फिर सुरंग से नौ दिन बाद जिंदा निकले दो लोगों की कहानी भी मिली. लेकिन जो कुछ स्क्रीन पर गया, वह इन दस दिनों में देखी गई पूरी कहानी का सिर्फ एक हिस्सा था. बाकी बहुत कुछ ऐसा था जो कैमरे के पीछे रह गया. और शायद वही हिस्सा मेरे साथ सबसे ज्यादा रहेगा.

10 दिन की रिपोर्टिंग की यादें

आज दसवें दिन जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो मुझे आंकड़े याद नहीं आते. मुझे चेहरे याद आते हैं. राम बहादुर थापा का चेहरा याद आता है. वह घर याद आता है जिसमें 25 लोग रहते थे और फिर एक साथ सब बह गए. चितवन के वे दो बच्चे याद आते हैं, जिनके मां और पिता दोनों लापता थे. नदी में शव निकालते लोग याद आते हैं. 

मॉर्चरी में रखे 170 शव याद आते हैं. मास ग्रेव की मिट्टी याद आती है. पशुपतिनाथ में अपने लोगों का प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार करते परिवार याद आते हैं. और फिर कबीर महर्जन के परिवार का वह चेहरा भी याद आता है, जिसमें नौ दिनों के डर के बाद अपने आदमी को जिंदा पाने की खुशी थी.

इन दस दिनों ने मुझे पत्रकारिता के बारे में भी बहुत कुछ सिखाया है. हम कैमरा लेकर जाते हैं ताकि दुनिया को दिखा सकें कि वहां क्या हो रहा है लेकिन कभी-कभी कैमरा नीचे रखना भी पत्रकारिता का हिस्सा होता है.

कभी किसी के दर्द को दिखाने से ज्यादा जरूरी होता है उसके दर्द का सम्मान करना. कभी किसी की कहानी को दुनिया तक पहुंचाने से ज्यादा जरूरी होता है उसके यह कहने पर रुक जाना कि वह कैमरे पर नहीं आना चाहता. और कभी-कभी कुछ कहानियां खबर नहीं बनतीं वे सिर्फ आपकी याद बनकर रह जाती हैं.

नेपाल की बाढ़ की ये दस दिन की यात्रा मेरे लिए ऐसी ही रही है. मैंने तबाही देखी है.मौत देखी है.इंतजार देखा है. बेबस बच्चे देखे हैं.टूटे परिवार देखे हैं.और उसी के बीच जिंदगी को वापस आते भी देखा है. मैंने लोगों को सब कुछ खोते देखा है और फिर भी दूसरों की मदद करते देखा है. आज दस दिन पूरे हो गए हैं.

लेकिन मुझे लगता है कि इस बाढ़ की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है. योंकि पानी उतर जाने के बाद भी बहुत से लोगों के घर खाली हैं. बहुत से परिवार अपने लोगों का इंतजार कर रहे हैं. और बहुत सी ऐसी कहानियां हैं जो कैमरे में कभी रिकॉर्ड नहीं हुईं. लेकिन वे मेरी आंखों के सामने से गुजर चुकी हैं. और शायद लंबे समय तक मेरे भीतर रहेंगी.

मैं प्रभाकर कुमार, NDTV के लिए नेपाल से रिपोर्टिंग कर रहा हूं. दस दिन हो गए हैं. लेकिन इन दस दिनों ने मुझे एक बात बहुत साफ समझा दी है, हर कहानी कैमरे में नहीं आती. कुछ कहानियां सिर्फ आंखों में आती हैं.और फिर वहीं रह जाती हैं. भगवान से बस यही प्रार्थना है की मुझे भविष्य में फिर कभी ऐसी त्रासदी कवर करने का मौका ना मिले . मुझे केवल हंसते मुस्कुराते चेहरे मिले.
 

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