- नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ में 150 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. 750 से ज्यादा लापता बताए जा रहे हैं.
- ISRO के राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र ने उपग्रह तस्वीरों के जरिए बाढ़ के कारणों का विश्लेषण किया.
- 4.9 तीव्रता के भूकंप से तिब्बत के सर्क ग्लेशियर का टूटना और हिमस्खलन के कारण त्रिशूली नदी में भीषण बाढ़ आई.
नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ की वजह क्या थी? आखिर हिमालय की चोटियों पर ऐसा क्या हुआ कि इतना भयानक जलसैलाब आया? नेपाल के रसुवा क्षेत्र में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड के कारण अभी तक 160 लोगों की मौत हो चुकी है. 750 लोग लापता बताए जा रहे हैं. जिसमें भारत के भी 133 लोग शामिल हैं. इस भीषण बाढ़ की तस्वीरें और वीडियो बुधवार दोपहर बाद से ही सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. जिसे देखकर हर कोई सहम जा रहा है. पुल, होटल, सड़क, टॉवर सब पानी के भीषण वेग में बहती नजर आ रही है. नेपाल में आई इस विनाशकारी बाढ़ भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की प्रमुख इकाई राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) ने शुरुआती सैटेलाइट आधारित रिसर्च किया है. भारतीय और अंतरराष्ट्रीय उपग्रहों से प्राप्त तस्वीरों का उपयोग करते हुए वैज्ञानिकों ने तबाही के पैमाने का आकलन किया और उन घटनाओं को समझने की कोशिश की, जिनके कारण हाल के सालों में हिमालयी क्षेत्र की सबसे भीषण प्राकृतिक आपदाओं में से एक सामने आई.
4.9 तीव्रता से आई भूकंप के कारण टूटा ग्लेशियर
वर्तमान में भारत के 56 उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में सक्रिय हैं. NRSC के शुरुआती विश्लेषण के अनुसार, इस आपदा की शुरुआत तिब्बत के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र में हुई. वैज्ञानिकों का मानना है कि 4.9 तीव्रता के भूकंप ने संभवतः एक सर्क ग्लेशियर (Cirque Glacier) को प्रभावित किया, जिसके बाद उसका एक बड़ा हिस्सा ढह गया. इस घटना से बर्फ और चट्टानों का विशाल हिमस्खलन हुआ, जो तेजी से नीचे घाटी की ओर बढ़ा.
जो भारी मात्रा में पानी, मिट्टी, चट्टानें और मलबा लेकर अचानक नीचे की ओर बहा. इससे त्रिशूली नदी में भीषण बाढ़ आई, जिसने व्यापक तबाही मचाई. सैटेलाइट इमेज की स्टडी कर रहे वैज्ञानिकों का मानना है कि सर्क ग्लेशियर का ढहना और उसके बाद हुआ आइस-रॉक एवलॉन्च इस आपदा की सबसे संभावित वजह है.

बुधवार सुबह 8 बजकर 22 मिनट पर आई थी भूकंप
उल्लेखनीय हो कि भारत के भूकंप निगरानी नेटवर्क ने सुबह 8 बजकर 22 मिनट (भारतीय समयानुसार) 10 किलोमीटर की गहराई पर 4.9 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया था. नेपाल का समय भारत से 15 मिनट आगे है. राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (NCS) के अनुसार, भूकंप का केंद्र 28.076 अक्षांश और 86.494 देशांतर पर था, जो रसुवा क्षेत्र के पास है. हिमालयी क्षेत्र भूकंप के लिहाज से अति संवेदनशील है.
आपदा से पहले और बाद के सैटेलाइट इमेज के आधार पर विश्लेषण
आपदा के प्रभाव और विस्तार को समझने के लिए हैदराबाद स्थित NRSC ने क्विक जियोग्राफिकल असेसमेंट किया. वैज्ञानिकों ने यूरोपीय सेंटिनेल-2 उपग्रह द्वारा 24 अगस्त 2026 को ली गई आपदा-पूर्व तस्वीरों की तुलना ISRO के रिसोर्ससैट-2ए द्वारा 26 अगस्त 2026 को हासिल की गई आपदा के बाद की तस्वीरों से की. इसके अलावा 4 अप्रैल 2026 की रिसोर्ससैट-2ए तस्वीरों की भी नवीनतम चित्रों से तुलना कर भू-भाग में आए बदलावों और नुकसान का आकलन किया गया.

नेपाल में आई बाढ़ की वजह को बताती ISRO की यह रिसर्च इन दो सैटेलाइट तस्वीरों पर आधारित है.
Photo Credit: ISRO
सैटेलाइट इमेज की स्टडी में नदी के बहाव में दिखे बदलाव
आपदा से पहले और बाद के सैटेलाइट इमेज की स्टडी में नदी के बहाव में बड़े बदलाव दिखे. कई हिस्सों में मलबे के जमाव और बाढ़ के संकेत मिले. इन तस्वीरों की मदद से वैज्ञानिकों ने प्रभावित इलाके का मानचित्र तैयार किया और समझा कि पहाड़ी भूभाग में आपदा किस तरह विकसित हुई. यह घटना एक बार फिर प्राकृतिक आपदा प्रबंधन में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी की अहमियत को बताती है.
चक्रवात, भूस्खलन, बाढ़ और जंगल की आग जैसी घटनाओं के कारण को समझने के लिए सैटेलाइट इमेजिंग स्टडी आज की सबसे प्रमाणिक स्टडी मानी जाती है. रसुवा फ्लैश फ्लड के मामले में भी आपदा से पहले और बाद की तस्वीरों की तुलना करके वैज्ञानिकों ने आपदा के कारणों को समझाया है.

US जियोलॉजिकल सर्वे ने भी यहीं बताई वजह
US जियोलॉजिकल सर्वे ने भी यहीं कहाई बताई है. US जियोलॉजिकल सर्वे ने कहा कि नेपाल और तिब्बत में ग्लेशियर के ढहने से भूकंप जैसी हलचल हुई और निचले इलाकों में भयानक असर पड़ा. एजेंसी ने कहा कि भूकंप के तौर पर बताई गई हलचल असल में ग्लेशियर के ढहने और मलबे के बहाव की घटना थी, जिसके कारण बाद में निचले इलाकों में भयानक असर हुआ.
सर्क ग्लेशियर क्या होता है? जिसके टूटने से आई इतनी भीषण आपदा
इस भीषण सैलाब के सेंटर में सर्क ग्लेशियर की भूमिका अहम है. सर्क ग्लेशियर पर्वतों की ढलानों पर कटोरे के आकार में बनते हैं, जहां लंबे समय तक बर्फ जमा होती रहती है. ये ग्लेशियर ऊंचाई वाले क्षेत्रों से आने वाले हिमस्खलनों से भी तैयार होते हैं. जब भौगोलिक या जलवायु संबंधी कारणों से इनकी स्थिरता प्रभावित होती है, तो बर्फ और चट्टान तीजे से नीचे की ओर खिसकता है. इसरो की शुरुआती स्टडी के अनुसार तिब्बत में संभवतः यही प्रक्रिया हुई.
आइस रॉक एवलॉन्च ने पहले नदी के बहाव को रोका, फिर तेजी से नीचे आया मलबा
उपग्रह चित्रों का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों का मानना है कि घटनाक्रम में पहले आइस-रॉक एवलॉन्च हुआ, जिसने नदी को अस्थायी रूप से रोक दिया. इसके बाद पानी जमा होकर एक अस्थायी झील जैसी स्थिति बनी और फिर अचानक अवरोध टूटने से भारी मात्रा में पानी और मलबा तेजी से नीचे की ओर बह निकला. इसी कारण यह पर्वतीय धंसाव विनाशकारी बाढ़ में बदल गया.
इस आपदा ने पूरे हिमालयी क्षेत्र में चिंताएं बढ़ा दी हैं. यहां के नाज़ुक पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र, तीखी ढलानें और विशाल ग्लेशियर नेटवर्क ऐसी परिस्थितियां पैदा करते हैं, जहां भूकंप, भूस्खलन, ग्लेशियर ढहना और फ्लैश फ्लड जैसी घटनाएं एक-दूसरे को प्रभावित कर सकती हैं. इससे इनकी भविष्यवाणी और आपदा प्रबंधन दोनों ही चुनौतीपूर्ण हो जाते हैं.

भारत पर खतरा कम, क्योंकि आपदा का उद्गम स्थल 200 किमी दूर
NRSC का यह शुरुआती आकलन मुख्य रूप से घटना की मैपिंग और वैज्ञानिक समझ पर केंद्रित है, लेकिन क्षेत्र से परिचित कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत पर इसका प्रत्यक्ष खतरा सीमित हो सकता है. आपदा का उद्गम स्थल भारत-नेपाल सीमा से 200 किलोमीटर से अधिक दूर है. इसलिए सबसे गंभीर प्रभाव संभवतः तिब्बत और नेपाल के प्रभावित नदी गलियारों तक ही सीमित रहेंगे. ISRO ने भारत पर संभावित प्रभाव को लेकर कोई औपचारिक टिप्पणी नहीं की है.
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