- बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी को संगठन पदों से हटाया गया है
- भारतीय राजनीति में चुनावी हार के बाद पार्टी में आंतरिक कलह और बागीपन आमतौर पर देखने को मिलता है
- 1977 में इंदिरा गांधी की हार के बाद कांग्रेस पार्टी में नेतृत्व के लिए विद्रोह और विभाजन हुआ था
बंगाल विधानसभा चुनाव (2026) के नतीजों ने न सिर्फ सूबे की सत्ता बदली, बल्कि 'अजेय' मानी जाने वाली ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर एक ऐसे राजनीतिक भूकंप को जन्म दे दिया, जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दे रही है. पार्टी के बागी धड़े द्वारा अचानक 'दीदी' यानी ममता बनर्जी और उनके उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी को सांगठनिक पदों से बेदखल करना, सतही तौर पर भले ही चौंकाने वाला लगे, लेकिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास को करीब से जानने वालों के लिए यह कोई नई बात नहीं है.
असल में, भारतीय राजनीति का एक क्रूर नियम है—यहां वफादारी अक्सर सत्ता की चाशनी से तय होती है. जब तक किसी कद्दावर नेता या 'एकछत्र चेहरे' के नाम पर वोट बरसते हैं, तब तक आंतरिक मतभेदों का लावा दबा रहता है. लेकिन जैसे ही चुनावी मैदान में कोई करारी और अपमानजनक शिकस्त मिलती है, वैसे ही पार्टी को जोड़े रखने वाला 'सत्ता का गोंद' सूख जाता है और कलह का जिन्न बाहर आ जाता है. नेता रातों-रात बागी हो जाते हैं और सालों पुराना सियासी कुनबा ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगता है. आइए, इतिहास के पन्नों को पलटकर देखते हैं कि कब-कब बड़ी चुनावी हार ने देश के सबसे ताकतवर नेताओं के पैरों के नीचे से राजनीतिक जमीन खिसका दी.
'अजेय' इंदिरा के खिलाफ विद्रोह
भारतीय राजनीति में चुनावी हार के बाद बिखराव का सबसे बड़ा और पहला उदाहरण 1977 का है. 21 महीनों के दमनकारी आपातकाल (Emergency) के बाद हुए आम चुनावों में जनता ने इंदिरा गांधी और कांग्रेस को ऐतिहासिक शिकस्त दी. खुद इंदिरा गांधी अपनी सीट हार गईं. सत्ता हाथ से जाते ही पार्टी के भीतर दशकों से दबा असंतोष फूट पड़ा. के. ब्रह्मानंद रेड्डी और वाई. बी. चव्हाण जैसे कद्दावर कांग्रेस नेताओं ने सामूहिक रूप से माना कि आपातकाल की ज्यादतियों के कारण इंदिरा गांधी अब पार्टी के लिए एक राजनीतिक बोझ बन चुकी हैं. उन्होंने इंदिरा के एकछत्र नेतृत्व को चुनौती देते हुए पार्टी पर अपना नियंत्रण मजबूत करना शुरू कर दिया.

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बगावत का अंजाम
सिंडिकेट और सीनियर नेताओं के इस सीधे मोर्चे के कारण जनवरी 1978 में कांग्रेस आधिकारिक तौर पर फिर टूट गई. इंदिरा गांधी ने हार नहीं मानी और कांग्रेस से अलग होकर 'कांग्रेस (I)' (इंदिरा) का गठन किया. अंततः देवराज अर्स और चव्हाण के नेतृत्व वाली पुरानी संस्थागत कांग्रेस हाशिए पर चली गई, लेकिन इस विभाजन ने यह स्थापित कर दिया कि सत्ता जाते ही वफादार भी बागी हो जाते हैं.
जनता पार्टी और तीसरे मोर्चे का उदय-पतन
1977 में इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल करने के लिए धुर-विरोधी विचारधाराओं के लोग एक छतरी के नीचे आए और 'जनता पार्टी' का जन्म हुआ. लेकिन वैचारिक खोखलेपन और शीर्ष नेताओं के अहम के टकराव ने इस महा-गठबंधन को जल्द ही नेस्तनाबूद कर दिया. मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह के बीच प्रधानमंत्री पद की अंतहीन होड़ मची थी. इसी बीच, 'दोहरी सदस्यता' का विवाद उठा—जिसमें जनसंघ पृष्ठभूमि के नेताओं (जैसे अटल बिहारी वाजपेयी और एल.के. आडवाणी) के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ाव पर समाजवादियों ने आपत्ति जताई.

अंजाम क्या हुआ
इस आंतरिक कलह के कारण 1979 में मोरारजी सरकार गिरी और 1980 के मध्यावधि चुनावों में जनता पार्टी को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी. हार के तुरंत बाद यह गठबंधन पूरी तरह बिखर गया. जनसंघ के धड़े ने अलग होकर 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी (BJP) की नींव रखी, जबकि चौधरी चरण सिंह का धड़ा लोकदल बना.
दूसरे मोर्चे का भी यही हश्र (1989-1991)
इसी लोकदल का विलय आगे चलकर 1989 में वी.पी. सिंह, चंद्रशेखर और चौधरी देवीलाल के नेतृत्व में बने 'जनता दल' में हुआ. बोफोर्स घोटाले के रथ पर सवार होकर यह मोर्चा सत्ता में तो आया, लेकिन 1991 के लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद यह कुनबा भी टिक नहीं सका. चुनावी शिकस्त मिलते ही क्षेत्रीय क्षत्रपों ने अपनी राहें अलग कर लीं; मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन मजबूत करने के लिए समाजवादी पार्टी (SP) बनाई, जबकि चौधरी अजीत सिंह ने पश्चिम यूपी के जाट बहुल क्षेत्र में राष्ट्रीय लोक दल (RLD) का निर्माण किया.

जनता दल का पूर्ण विखंडन (1990 के दशक का अंत)
जो जनता दल कभी राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के मुख्य विकल्प के रूप में उभरा था, उसकी नियति में लगातार चुनावी झटकों के बाद बिखर जाना ही लिखा था. 1996 और 1998 के आम चुनावों में जैसे ही जनता दल का केंद्रीय नेतृत्व कमजोर हुआ और सीटें घटीं, वैसे ही इसके भीतर मौजूद प्रांतीय कद्दावर नेताओं ने केंद्रीय कमान को अंगूठा दिखाना शुरू कर दिया. राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी को एकजुट रखने वाला कोई कद्दावर चेहरा नहीं बचा था.
अंजाम क्षेत्रीय ताकतों का उदय
जनता दल का ऐसा विखंडन हुआ कि आज उसका मूल नाम और प्रतीक चिन्ह इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं. इसी राष्ट्रीय पार्टी के मलबे से बिहार की राजनीति को नियंत्रित करने वाली राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और जनता दल यूनाइटेड (JDU) जैसी क्षेत्रीय ताकतों का उदय हुआ.

तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति का बिखराव
द्रविड़ियन राजनीति का इतिहास भी यह दिखाता है कि जब भी किसी करिश्माई सर्वोच्च नेता का अंत होता है या पार्टी लगातार चुनाव हारती है, तो विभाजन अवश्यंभावी हो जाता है. एम. जी. रामचंद्रन ने पार्टी में मतभेदों के बाद अपनी अलग पार्टी बनाई. फिर उनकी भी पार्टी में पहला बिखराव (1987) में ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) के संस्थापक और मुख्यमंत्री एम. जी. रामचंद्रन (MGR) के निधन के बाद हुआ. पार्टी दो गुटों में बंट गई थी—एक धड़ा एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन के साथ था तो दूसरा जे. जयललिता के साथ. हालांकि, जयललिता ने अपने राजनीतिक कौशल से जल्द ही पूरी पार्टी पर नियंत्रण कर लिया.
हालिया संकट (2022-2026)
दिसंबर 2016 में जयललिता के निधन और उसके बाद लगातार विधानसभा व लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद पार्टी ओ. पनीरसेल्वम (OPS) और ई. पलानीस्वामी (EPS) के गुटों में इस कदर बिखरी कि पार्टी का पारंपरिक कैडर और कोर वोटबैंक पूरी तरह छिटक गया.

फिर तख्तापलट और दलबदल
जुलाई 2022 में ही ई. पलानीस्वामी (EPS) गुट ने पार्टी संगठन और चुनाव चिन्ह पर पूरा नियंत्रण कर लिया और ओ. पनीरसेल्वम (OPS) को AIADMK से निष्कासित (Expel) कर दिया. इसके बाद, कानूनी और सांगठनिक रूप से अलग-थलग पड़े OPS ने फरवरी, 2026 को आधिकारिक तौर पर तमिलनाडु की वर्तमान सत्ताधारी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) का दामन थाम लिया, जो कभी उनकी धुर विरोधी हुआ करती थी.
वफादारी सिर्फ सत्ता के साथ
इतिहास के इन पन्नों को पलटने के बाद यह साफ हो जाता है कि क्षेत्रीय, व्यक्ति-केंद्रित या परिवार-संचालित राजनीतिक दलों का ढांचा बेहद नाजुक होता है. इन पार्टियों की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कमजोरी—दोनों एक ही सिक्का हैं, जिसे "एक सर्वमान्य और करिश्माई चेहरा" कहा जाता है. जब तक चुनावी रथ आगे बढ़ता रहता है और सत्ता की चाशनी बनी रहती है, तब तक आंतरिक मतभेद, नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं और असंतोष का लावा भीतर ही दबा रहता है. सारे नेता सत्ता के लाभ के चलते केंद्रीय कमान के सामने नतमस्तक रहते हैं. लेकिन जैसे ही कोई बड़ी चुनावी हार सामने आती है, तो पूरा समीकरण बदल जाता है, पार्टी कैडर और बागी नेताओं को यह साफ लगने लगता है कि "शीर्ष चेहरा" अब वोट दिलाने की अपनी जादुई क्षमता खो चुका है. हारते ही वफादारी के वादे खोखले हो जाते हैं और नेता अपने राजनीतिक भविष्य को बचाने के लिए नए आशियाने या कमान की तलाश शुरू कर देते हैं.
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