- सुप्रीम कोर्ट कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह मस्जिद विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश की याचिका पर सुनवाई करेगा
- हिंदू पक्ष का दावा है कि औरंगजेब ने मथुरा में मंदिर तोड़कर शाही ईदगाह मस्जिद बनवाई थी
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अन्य हिंदू पक्ष को सभी भगवान कृष्ण भक्तों का प्रतिनिधि माना था
सुप्रीम कोर्ट सोमवार को कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह मस्जिद विवाद में एक और हिंदू पक्ष की याचिका पर सुनवाई करेगा. याचिका में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी गई है. कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर विस्तृत सुनवाई की आवश्यकता है. विवाद शाही ईदगाह मस्जिद से संबंधित है, जिसे लेकर हिंदू पक्ष का दावा है कि इसे औरंगजेब ने मंदिर तोड़कर बनवाया था.
इस पक्ष ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें एक अन्य मुकदमे में एक अन्य पक्ष को भगवान कृष्ण के सभी भक्तों का प्रतिनिधि माना गया है. हिंदू पक्ष ने उच्च न्यायालय से अनुरोध किया था कि वह मूल सुनवाई उसी तरह करे जैसे उसने बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि मालिकाना हक विवाद में की थी.

पीड़ित हिंदू पक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा कि विवाद से जुड़े सभी दीवानी मुकदमों को उच्च न्यायालय में स्थानांतरित किए जाने के बाद उनके मुकदमे को मुख्य मामला माना गया, लेकिन उच्च न्यायालय के आदेश में दूसरे पक्ष को सभी श्रद्धालुओं का प्रतिनिधि मानने में त्रुटि हुई.

उन्होंने कहा कि वह (उनके मुवक्किल) मुकदमा दायर करने वाले पहले व्यक्ति थे और उच्च न्यायालय द्वारा इस तरह के विवाद से जुड़े दीवानी मुकदमों में से एक में दूसरे पक्ष को आगे बढ़ाना अनुचित था. दीवान ने आगे कहा कि उच्च न्यायालय ने आदेश पारित कर दिया, जबकि उस पक्ष के आवेदन में ऐसी कोई प्रार्थना नहीं थी.
यह विवाद शाही ईदगाह मस्जिद से जुड़ा है, जिसके बारे में हिंदू पक्ष का दावा है कि मुगल बादशाह औरंगजेब ने मथुरा में भगवान कृष्ण के जन्मस्थान पर एक मंदिर को ध्वस्त कर इसका निर्माण कराया था. मथुरा की एक अदालत में दायर 20 से अधिक दीवानी मुकदमे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिए गए हैं और उनके निर्णय लंबित हैं.

हिंदू पक्ष ने शाही ईदगाह मस्जिद का ढांचा हटाने, भूमि पर पुनः स्वामित्व प्राप्त करने तथा मंदिर के पुनर्निर्माण की मांग को लेकर 18 वाद (मुकदमे) दायर किए हैं. इससे पहले, एक अगस्त 2024 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हिंदू पक्षों द्वारा दाखिल इन मुकदमों की पोषणीयता (सुनवाई योग्य होने) को चुनौती देने वाली मुस्लिम पक्ष की याचिका खारिज कर दी थी.

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि ये मुकदमे न तो समयसीमा, न ही वक्फ अधिनियम, और न ही पूजा स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 से बाधित नहीं हैं. पूजा स्थल अधिनियम, 1991 के तहत 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्वरूप विद्यमान था, उसमें परिवर्तन नहीं किया जा सकता.
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