करीब सवा सौ साल पीछे, साल 1907 के उस दौर में, जब उत्तराखंड के पहाड़ों और जंगलों में मौत साया बनकर घूमती थी. एक ऐसी खौफनाक शैतान, जिसने एक या दो नहीं, बल्कि पूरे 436 इंसानों का शिकार किया. हम बात कर रहे हैं 'चम्पावत की आदमखोर बाघिन' की, इस बंगाल टाइगर का नाम सुनते ही तब लोगों के हलक सूख जाते थे. तारीख थी साल 1907 की एक सुहानी दोपहर. आसमान में बादल छाए थे और ठंडी हवाएं चल रही थीं. चम्पावत के एक छोटे से गांव की तीन महिलाएं हंसती-खिलखिलाती एक घाटी में सूखी पत्तियां और लकड़ियां इकट्ठा करने गईं. एक लड़की अपना काम खत्म करके जैसे ही पेड़ की टहनी से नीचे सरकी, एक भयानक दहाड़ के साथ मौत ने उस पर झपट्टा मार दिया. बाघिन का भारी-भरकम पंजा सीधे उसके पैर पर पड़ा. वो लड़की चीखी, चिल्लाई, खुद को बचाने के लिए दोबारा पेड़ की डाली पकड़ने की कोशिश करने लगी. लेकिन उस ताकतवर बाघिन के आगे उसकी एक न चली. एक झटके में बाघिन ने उसे नीचे खींचा और घने जंगलों की तरफ घसीट ले गई. यह बाघिन का 434वां शिकार था.
इससे पहले नेपाल में उसने करीब 200 से ज्यादा लोगों को अपना शिकार बनाया. जब वहां शिकार करना मुश्किल हुआ, तो सरहद पार कर भारत के कुमाऊं (आज उत्तराखंड में रीजन है) में दाखिल हो गई. यहां भी उसने 200 से ज्यादा जिंदगियां लील लीं. जब एक जगह शिकंजा कसता, वो चुपचाप सरहद पार कर दूसरी तरफ तबाही मचाने लगती. दहशत का आलम यह था कि पूरे के पूरे गांवों में अघोषित 'लॉकडाउन' लग गया.

नेपाली आर्मी भी उतरी, बड़े-बड़े शिकारी आए
सबसे पहले तो इस अकेली शेरनी को मारने के लिए नेपाल की सेना उतार दी गई. जब सेना भी नाकाम रही, तो नामी-गरामी शिकारियों की टोलियां भेजी गईं. सारे विफल हो गए. हर बार वो शेरनी हवा की तरह गायब हो जाती. यकीन करना मुश्किल होता है कि बंदूकों से लैस जवान और जंगलों की खाक छानने वाले खोजी भी उस शेरनी के आगे घुटने टेक बैठे. दहशत का यह मंजर सालों-साल खिंचता चला गया. आखिरकार, साल 1907 में इस कहानी में एंट्री होती है महान शिकारी जिम कॉर्बेट की.
इंसान और बाघ के बीच की वो खूनी जंग
19वीं सदी का वो दौर ऐसा था जब भारत के जंगलों में इंसान और बाघ के बीच वर्चस्व की खूनी जंग चल रही थी. हालात ये थे कि शाम ढलते ही लोग मशालें लेकर समूहों में चलते थे ताकि किसी आदमखोर का निवाला न बन जाएं. वैसे भी, बंगाल टाइगर कुदरत का एक ऐसा अजूबा है जिसकी ताकत का कोई सानी नहीं. इनके जबड़े की ताकत 1,000 पाउंड प्रति वर्ग इंच से भी ज्यादा होती है और इनके कैनाइन (नुकीले दांत) बिल्ली प्रजाति में सबसे लंबे होते हैं. ये अपने से दोगुने वजन के शिकार को मीलों घसीट सकते हैं और 40 मील प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकते हैं. और सबसे बड़ी बात- बाघ कभी अपना अपमान या चोट नहीं भूलते. अगर इन्हें कोई नुकसान पहुंचाए, तो ये चुन-चुनकर बदला लेते हैं.
जब रक्षक बनकर आया एक नौजवान: जिम कॉर्बेट
नेपाल से खदेड़े जाने के बाद इस आदमखोर बाघिन ने चम्पावत और पाली के गांवों में अपना डेरा डाल लिया था. चार सालों से वहां खौफ का राज था. सरकार ने इस पर इनाम रख दिया, बड़े-बड़े शिकारी आए, लेकिन इस बेहद चालाक और शातिर बाघिन के सामने सब नाकाम होकर लौट गए.
तभी एंट्री होती है एक ऐसे नौजवान की, जो आगे चलकर इतिहास का सबसे बड़ा शिकारी बनने वाला था- जिम कॉर्बेट. उस वक्त कॉर्बेट युवा थे, तजुर्बा कम था, लेकिन हौसला फौलादी था. जब उन्हें इस मिशन के लिए बुलाया गया, तो कॉर्बेट ने सबसे पहली शर्त यह रखी कि बाघिन के सिर से इनाम की रकम हटा ली जाए. उनका मानना था कि वह बाघिन कोई जन्मजात राक्षस नहीं है, बल्कि जिंदा रहने के लिए संघर्ष कर रही एक बेबस जीव है. उसे मारना जरूरी था, लेकिन कॉर्बेट पैसों के लिए किसी बेजुबान का शिकार नहीं करना चाहते थे.
पाली गांव में सन्नाटा और दहशत की कहानी
चार दिनों की तपती धूप और घने जंगलों को पार कर जब कॉर्बेट पाली गांव पहुंचे, तो वहां का नजारा देखकर दंग रह गए. गांव के चौराहे पर धूल उड़ रही थी, चारों तरफ सन्नाटा था, जैसे कोई भूतहा कस्बा हो. कॉर्बेट ने हिम्मत नहीं हारी. उन्होंने चौराहे पर आग जलाई और इंतजार करने लगे. धीरे-धीरे सहमे हुए, पीले पड़े चेहरों के साथ ग्रामीण अपनी झोपड़ियों से बाहर आए.
उन्होंने कांपती आवाज में बताया, "साहब. हम चार दिनों से घरों में कैद हैं. उस शैतान ने चम्पावत का रास्ता रोक रखा है. रात भर उसकी दहाड़ें गूंजती हैं. हमारे पास खाने का दाना तक नहीं बचा."
कॉर्बेट तुरंत एक्शन में आए. वो एक ग्रामीण को लेकर उस घाटी में गए, जहां उस युवा लड़की को मारा गया था. वहां उन्हें बाघिन के पंजों के निशान (पगमार्क) मिले, जिससे कॉर्बेट समझ गए कि यह कोई युवा बाघ नहीं, बल्कि एक बूढ़ी बाघिन है, जो अपनी उम्र ढलने के बाद अब इंसानों को आसान शिकार बना रही है. वहां लड़की के अवशेष के रूप में सिर्फ कुछ हड्डियां बची थीं, जिन्हें कॉर्बेट सम्मानपूर्वक गांव वापस लाए ताकि उसका अंतिम संस्कार किया जा सके.
जब शैतान ने दोबारा किया वार
तभी चम्पावत से खबर आई कि उस शैतान ने एक और औरत को उसकी पीठ से दबोचकर जंगलों में खींच लिया है. वो तड़पती रही, मदद के लिए चिल्लाती रही, लेकिन डर के मारे किसी की हिम्मत नहीं हुई कि बाघिन का पीछा कर सके. वहीं कॉर्बेट की मुलाकात एक ऐसी बेबस महिला से भी हुई, जो सदमे के कारण गूंगी हो चुकी थी. महीनों पहले बाघिन ने उसकी बहन को उसकी आंखों के सामने मार डाला था. वो गूंगी बहन बाघिन के पीछे दौड़ी थी, रोई-गिड़गिड़ाई थी कि उसकी बहन को छोड़कर उसे उठा ले जाए, लेकिन बाघिन ने उसकी एक न सुनी.
कॉर्बेट को एक पुख्ता सुराग की जरूरत थी. तभी गांव का एक युवक हांफता हुआ और बुरी तरह डरा हुआ भागा-भागा आया और चिल्लाया- "साहब, शैतान ने फिर हमला कर दिया है."
मौत से आमना-सामना: वो आखिरी जंग
अपनी राइफल थामे जिम कॉर्बेट घने जंगलों और कंटीली झाड़ियों के बीच निकल पड़े. गर्मी इतनी थी कि सांस लेना दूभर था. कॉर्बेट जानते थे कि एक छोटी सी चूक और खेल खत्म. अचानक उन्हें महसूस हुआ कि झाड़ियों में कुछ हलचल हो रही है. बाघिन बिल्कुल उनके करीब थी, उन पर नजर रखे हुए थी और उनका पीछा कर रही थी. कॉर्बेट का दिल तेजी से धड़क रहा था. अगर बाघिन ने झपट्टा मारा, तो राइफल चलाने का मौका भी नहीं मिलेगा. सूरज ढलने लगा था और अंधेरे में बाघिन का मुकाबला करना यानी सीधे मौत को गले लगाना था. कॉर्बेट वापस लौटे और एक नया मास्टरप्लान बनाया.
अगले दिन सुबह, कॉर्बेट ने गांव वालों को एक पहाड़ी की चोटी पर इकट्ठा किया और खुद दूसरी पहाड़ी की ओट में मोर्चा संभाल लिया. योजना यह थी कि इशारा मिलते ही गांव वाले ढोल-नगाड़े, कनस्तर बजाकर और शोर मचाकर बाघिन को घाटी की तरफ खदेड़ेंगे, जहां कॉर्बेट घात लगाए बैठे थे. लेकिन गांव वाले कुछ ज्यादा ही उतावले हो गए. तय जगह से करीब 150 गज दूर ही उन्होंने भयंकर शोर मचाना शुरू कर दिया. कॉर्बेट बेतहाशा दौड़े, ऊबड़-खाबड़ पत्थरों पर पैर फिसलते-फिसलते बचा. सामने से शोर और दहाड़ का वो शोर बढ़ता जा रहा था. कॉर्बेट ऊंची घास में लेट गए.

तभी झाड़ियों को चीरती हुई वो बूढ़ी, लेकिन बेहद रौबदार बाघिन सामने आई. उसके कान पीछे की तरफ खिंचे थे और आंखें गुस्से से लाल थीं. बिना एक पल गंवाए कॉर्बेट ने निशाना साधा और गोली चला दी. पहली गोली उसके पिछले हिस्से पर लगी. बाघिन गुर्राई और भागी. कॉर्बेट ने दूसरी गोली चलाई जो उसके ठीक पीछे पत्थर पर जाकर लगी. अपनी किस्मत को कोसते हुए कॉर्बेट राइफल लेकर उसके पीछे भागे.
सामने एक चट्टान पर बाघिन खड़ी थी, उसकी आंखें पथरा रही थीं और शरीर थक चुका था. लेकिन कॉर्बेट को देखते ही उसने दांत दिखाए और पूरी ताकत से उन पर झपट्टा मारा. कॉर्बेट ने अपनी जिंदगी की सबसे महत्वपूर्ण तीसरी गोली चलाई. गोली सीधे उसके बढ़े हुए पंजे को चीरती हुई निकल गई जो कॉर्बेट का सिर कुचलने ही वाला था. बाघिन जमीन पर गिरी, थोड़ा छटपटाकर चट्टान की ओट में गई और हमेशा के लिए शांत हो गई. दहशत का आखिरकार अंत हो चुका था. जब कॉर्बेट ने उस मृत शेरनी की जांच की, तो जो सच सामने आया उसने पूरी कहानी का रुख ही बदल दिया.
आखिर उसने इंसानों को क्यों मारना शुरू किया?
कॉर्बेट जब उस मृत बाघिन के पास पहुंचे और उसके जबड़े को देखा, तो उनका दिल टूट गया. बाघिन का ऊपर और नीचे का जबड़ा पूरी तरह से टूटा हुआ था. यह किसी इंसान की बेरहमी का नतीजा था. सालों पहले किसी अनाड़ी शिकारी ने उसे गोली मारकर घायल छोड़ दिया था और वह सालों-साल दर्द से तड़पती रही होगी. इस असहनीय दर्द की वजह से वह प्राकृतिक शिकार करने के काबिल नहीं रही थी और जिंदा रहने की कशमकश में उसने इंसानों को अपना निवाला बनाना शुरू किया.

गांव वालों को गुस्से में भर दिया
तभी चारों तरफ से ग्रामीण चिल्लाते हुए दौड़े "शैतान...शैतान" वे गुस्से में बाघिन के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर देना चाहते थे क्योंकि हर परिवार ने अपना कोई न कोई सदस्य खोया था. कॉर्बेट उनके गुस्से को समझते थे, लेकिन उन्होंने ग्रामीणों को रोका और उन्हें समझाया. धीरे-धीरे लोगों का गुस्सा शांत हुआ और वे बाघिन के शव को सम्मानपूर्वक नीचे ले आए.
खामोश महिला बोल पड़ी
इस कहानी का सबसे भावुक पल तब आया जब जिम कॉर्बेट उस बाघिन की खाल (pelt) को लेकर उस गूंगी महिला के पास गए. जैसे ही उस महिला ने अपनी बहन के हत्यारे की मृत खाल को देखा, उसके अंदर का डर गायब हो गया. वह खुशी से चीख पड़ी और पूरे गांव को बुलाने लगी. जो महिला पिछले 12 महीनों से सदमे में एक शब्द नहीं बोली थी, आज वो बोल रही थी. उसके बच्चों की आंखों में अपने मसीहा जिम कॉर्बेट के लिए जो आदर और अचरज का भाव था, उसे कॉर्बेट जिंदगी भर नहीं भूल पाए.

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