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इजरायल पर हमास के हमले ने दुनिया को कितना बदला, भारत पर कितना पड़ा असर

डॉ. श्रीश कुमार पाठक
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अक्टूबर 07, 2026 12:53 pm IST
    • Published On अक्टूबर 07, 2026 12:52 pm IST
    • Last Updated On अक्टूबर 07, 2026 12:53 pm IST
इजरायल पर हमास के हमले ने दुनिया को कितना बदला, भारत पर कितना पड़ा असर

तीन साल पहले सात अक्टूबर की सुबह इजरायल की सीमा पर जो हुआ, उसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी. हमास के लड़ाकों ने गाजा की सीमा बाड़ तोड़ी, इजरायली गांवों, सैन्य ठिकानों और एक म्यूजिक फेस्टिवल पर हमला किया. करीब 1,200 लोग मारे गए और 251 लोगों को बंधक बना लिया गया. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, यह इजरायल का सबसे घातक दिन था. लेकिन सात अक्टूबर की असली अहमियत केवल मौतों की संख्या में नहीं थी. एक ऐसे देश की सुरक्षा व्यवस्था को एक नॉन स्टेट एक्टर ने चौंका दिया, जिसे अपनी खुफिया क्षमता और सीमा सुरक्षा तकनीक पर बहुत भरोसा था. हमास ने केवल हमला नहीं किया, उसने बंधकों को भी अपनी रणनीति का हिस्सा बना लिया. एक सैन्य हमले को उसने कूटनीतिक दबाव में बदल दिया. यहीं से सात अक्टूबर की कहानी बदल गई. इस हमले ने उस धारणा को भी चुनौती दी कि मजबूत सैन्य शक्ति और Deterrence, यानी प्रतिरोधक क्षमता, अपने आप राजनीतिक समाधान की जगह ले सकती है.लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह केवल गाजा तक सीमित नहीं रहा. युद्ध धीरे-धीरे गाजा से बाहर निकलता गया. 24 सितंबर को UNRWA ने स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों के हवाले से बताया था कि युद्ध में अब तक 73,914 फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं.

हमास के हमले के बाद क्या क्या हुआ

संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ और विश्व बैंक के आकलन के अनुसार, गाजा को अगले दस सालों में पुनर्निर्माण के लिए 71.4 अरब डॉलर की जरूरत होगी. लेकिन असली बदलाव सिर्फ गाजा में नहीं हुआ. लाल सागर में हूती हमलों के कारण 2024 की शुरुआत में स्वेज नहर से गुजरने वाला व्यापार करीब आधा रह गया. हिजबुल्लाह के नेतृत्व को भारी नुकसान पहुंचा. सीरिया में बशर अल-असद की सत्ता चली गई. फिर इस साल 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई मारे गए.यह हमला उस समय हुआ जब ओमान की मध्यस्थता में अमेरिका-ईरान बातचीत कर रहे थे. ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया. लेबनान फिर संघर्ष की चपेट में आ गया. यानी सात अक्टूबर को गाजा की सीमा पर शुरू हुई कहानी धीरे-धीरे पूरे पश्चिम एशिया की शक्ति-संरचना को प्रभावित करने लगी. एक सीमा क्षेत्र में हुआ हमला अब केवल दो पक्षों की लड़ाई नहीं था. यह पूरे क्षेत्रीय संरचना का सवाल बन गया.

हमले का भारत पर क्या प्रभाव पड़ा

भारत इसके प्रभाव से अलग कैसे रह सकता था? सात अक्टूबर के कुछ ही दिनों बाद भारत ने इजरायल से अपने नागरिकों को वापस लाने के लिए ऑपरेशन अजय शुरू किया. लेकिन जल्दी पता चल गया कि चुनौती केवल भारतीय नागरिकों को वापस लाने की नहीं है. लाल सागर में जहाजों पर हमलों ने भारतीय व्यापार को प्रभावित करना शुरू किया. वाणिज्य मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक, सामान्य परिस्थितियों में भारत और यूरोप के बीच होने वाले माल व्यापार का करीब 80 प्रतिशत इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है. यानी पश्चिम एशिया में युद्ध का असर सीधे भारत के व्यापार पर पड़ने लगा. 25 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इजरायल की संसद, नेसेट में कहा कि भारत इजरायल के साथ खड़ा है. उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की गाजा योजना का समर्थन किया और एक दर्जन से अधिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए. इनमें इजरायल की ओर से 50,000 और भारतीय नागरिकों को स्वीकार करने की प्रतिबद्धता भी शामिल थी. लेकिन इसके तीन दिन बाद ही ईरान पर हमला हुआ. CITI के अनुमान के अनुसार, भारत की कच्चे तेल की करीब आधी जरूरत होर्मुज से होकर आती है. कतर और संयुक्त अरब अमीरात मिलकर भारत के एलएनजी आयात का 53 फीसद उपलब्ध कराते हैं. सात मार्च को घरेलू LPG सिलेंडर की कीमत 60 रुपये बढ़ाई गई. अप्रैल 2025 के बाद यह पहली घरेलू वृद्धि थी. अब सवाल यह है कि पश्चिम एशिया की राजनीति और भारत की रसोई के बीच इतनी सीधी कड़ी कब बन गई? शायद इसका जवाब सात अक्टूबर के बाद बदलती दुनिया में है.

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Photo Credit: AFP

आज पश्चिम एशिया में अमेरिका केवल एक पक्ष नहीं है. वह शांति प्रक्रिया की संरचना तैयार करने की कोशिश भी कर रहा है. 17 नवंबर 2025 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 13 मतों से ट्रंप की गाजा योजना और Board of Peace का समर्थन किया. चीन और रूस मतदान से दूर रहे. कतर और तुर्किए इस प्रक्रिया में शामिल हैं. कनाडा, फ्रांस और ब्रिटेन ने इजरायली बस्तियों से जुड़े सामान पर प्रतिबंध लगाए हैं. पाकिस्तान ने अमेरिका-ईरान वार्ता की मेजबानी की और जून के समझौते में भूमिका निभाई. इस पूरी तस्वीर में भारत के लिए एक बात साफ है. पश्चिम एशिया में कूटनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं.

क्या गाजा में युद्ध खत्म हो गया

10 अक्टूबर 2025 के युद्धविराम के बाद सभी बंधक वापस आ गए. आखिरी बंधक के अवशेष 26 जनवरी को बरामद किए गए. लेकिन क्या इसका मतलब युद्ध खत्म हो गया? जवाब है नहीं. युद्धविराम का दूसरा चरण अभी भी अटका हुआ है. हमास ने 31 जुलाई को निरस्त्रीकरण के रोडमैप को स्वीकार किया. इजरायल उसका हस्ताक्षरकर्ता नहीं है. खबरों के मुताबिक प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस दस्तावेज को स्वीकार नहीं किया है. स्थिरीकरण बल अभी तैनात नहीं हुआ है. फिलस्तीनी तकनीकी समिति अभी काहिरा में है. इजरायली सैनिक भी सहमत रेखा के आगे मौजूद हैं. ईरान के मामले में भी स्थिति बहुत अलग नहीं है. जून का समझौता कमजोर पड़ा. आठ जुलाई को फिर हमले शुरू हुए. होर्मुज को लेकर कतर के माध्यम से अप्रत्यक्ष बातचीत जारी है. यानी युद्ध रुक सकता है. लेकिन यह जरूरी नहीं है कि इससे संकट टल जाए.

यही वह बिंदु है, जहां अंतरराष्ट्रीय संबंधों का कोई भी छात्र इस पूरे घटनाक्रम को समझने की कोशिश करेगा तो उसे तीन बातों का ध्यान रखना होगा. पहली, किसी बड़े संघर्ष को एक ही कारण से समझना आसान है, लेकिन सही नहीं. सात अक्टूबर को केवल हमास की रणनीति से नहीं समझा जा सकता. इसमें इजरायली राजनीति है, ईरान की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा है और अमेरिका की अपनी रणनीतिक प्राथमिकताएं भी हैं. दूसरी बात, नैतिक स्पष्टता और विश्लेषणात्मक स्पष्टता एक ही चीज नहीं हैं. सात अक्टूबर के नरसंहार की निंदा की जा सकती है और इसके साथ ही युद्ध के अंतिम लक्ष्य, उसकी दिशा और सैन्य कार्रवाई की समानत पर सवाल भी उठाए जा सकते हैं. तीसरी बात शायद सबसे महत्वपूर्ण है. कागज पर लिखा समझौता और जमीन पर लागू समझौता, दोनों अलग-अलग चीजें हैं. यही इस पूरे संकट की असली समस्या है. इसे अंतरराष्ट्रीय संबंधों की भाषा में  Commitment Problem कहा जा सकता है. हमास चाहता है कि पहले इजरायली सेना पीछे हटे और  निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया उसके बाद हो. वहीं इजरायल चाहता है कि पहले हमास निरस्त्र हो और उसके बाद सेना पीछे हटे. और दोनों में से कोई भी पहले कदम उठाने को तैयार नहीं है. यानी सात अक्टूबर का Tactical Surprise धीरे-धीरे Systemic Shock में बदल गया.

गाजा पर इजरायली हमले में तबाह हुए घर के मलबे में खाना बनाता एक फिलस्तीनी नागरिक.

गाजा पर इजरायली हमले में तबाह हुए घर के मलबे में खाना बनाता एक फिलस्तीनी नागरिक.
Photo Credit: AP

अमेरिका, इजरायल और फिलस्तीन के चुनाव महत्वपूर्ण क्यों हैं

अब आगे क्या? तीन तारीखें महत्वपूर्ण हैं. इजरायल में 27 अक्टूबर को चुनाव हैं. अमेरिका में तीन नवंबर को मध्यावधि चुनाव हैं और फिलस्तीनियों के लिए 28 नवंबर को विधायी चुनाव प्रस्तावित हैं. मेरी नजर में फिलहाल यह शांति नहीं, बल्कि एक थामा गया गतिरोध है. युद्ध रुका हुआ है, लेकिन समाधान नहीं आया है. और ईरान वाला मोर्चा दोबारा भड़कने का खतरा अभी खत्म नहीं हुआ है.

इसलिए असली सवाल अब यह नहीं है कि युद्ध किसने जीता. सवाल बदल चुका है. गाजा पर शासन कौन करेगा? उसकी सुरक्षा कौन करेगा? और उसका पुनर्निर्माण कौन करेगा? भारत को भी इसी बदलती तस्वीर के बीच अपनी रणनीति बनानी होगी. ईरान से बातचीत जारी रखनी होगी. खाड़ी देशों से संपर्क बनाए रखना होगा. इजरायल के साथ संबंधों को भी संभालना होगा. ऊर्जा के रणनीतिक भंडार और आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोतों पर ध्यान देना होगा. और India–Middle East–Europe Economic Corridor (IMEC) को भी फिर से गति देने की कोशिश करनी होगी. दिल्ली में आयोजित G20 शिखर सम्मेलन में सात अक्टूबर से ठीक एक महीने पहले घोषित IMEC कभी पश्चिम एशिया को जोड़ने वाले नए आर्थिक गलियारे की उम्मीद था. अब उसी क्षेत्र की अस्थिरता उसके सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौती है. लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे सरल सबक शायद किसी रणनीतिक दस्तावेज में नहीं, भारत की रसोई में दिखाई देता है. हजारों किलोमीटर दूर लड़ी जा रही जंग का असर एक गैस सिलेंडर की कीमत में दिखाई दे सकता है. यानी दूरी अब सुरक्षा कवच नहीं रही.सात अक्टूबर ने केवल इजरायल की सुरक्षा व्यवस्था को ही चुनौती नहीं दी. उसने यह भी दिखा दिया कि आज की दुनिया में कोई भी क्षेत्रीय युद्ध लंबे समय तक क्षेत्रीय नहीं रहता. एक सीमा पर शुरू हुई लड़ाई समुद्र तक पहुंचती है. समुद्र से व्यापार तक. व्यापार से ऊर्जा तक और ऊर्जा से हमारे घर तक. इसलिए तीन साल बाद सात अक्टूबर को याद करने का सबसे महत्वपूर्ण तरीका शायद यह नहीं है कि उस दिन क्या हुआ था. बल्कि यह पूछना है कि उसके बाद पश्चिम एशिया कितना बदल गया. उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या दुनिया अब भी सात अक्टूबर को केवल एक तारीख की ही तरह देख रही है या वह उस दिन को उस बदलाव की शुरुआत के रूप में समझ रही है, जिसका अंत अभी दिखाई नहीं दे रहा.

(डिस्क्लेमर: लेखक दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ से पीएचडी और एमफिल हैं. इस समय वो एमिटी यूनिवर्सिटी के नोएडा कैंपस के एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ में असिस्टेंट प्रोफेसर (सीनियर स्केल) हैं.इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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