एक खूंखार बाघ जिसके नाम से पूरा जंगल कांपता था, लेकिन अपनी मल्लिका के आगे वह एकदम शांत हो जाता था. ये खूंखार बाघ 'उस्ताद' और उसकी मलिका 'नूर' की असल प्रेम कहानी है. एक ऐसी दास्तान जिसमें बेपनाह इश्क था, राजसी गुरूर था, लेकिन किस्मत में लिखी थी एक ऐसी दर्दनाक जुदाई, जिसने पूरे जंगल को रुला दिया. बाघ 'उस्ताद' पर डॉक्यूमेंट्री 'टाइगर 24' भी बन चुकी है. जो अमेजन प्राइम पर उपलब्ध है.
सबसे पहले बात करते हैं जंगल के खूंखार उस्ताद की. साल 2005 में झुमरू (T-20) और गायत्री (T-22) से उस्ताद का जन्म हुआ. अपने पिता की तरह ही वो बेहद खौफनाक और निडर था. रणथम्बौर के जंगलों में उसका ऐसा दबदबा था कि कोई भी दूसरा बाघ उसके इलाके में झांकने से भी डरता था. लगातार नौ सालों तक उस्ताद ने एकछत्र राज किया. जब उसके अपने भाई 'जालिम' ने उसे चुनौती दी, तो उस्ताद ने उसे भी बिना नुकसान पहुंचाए खदेड़ दिया. उसकी चाल में गजब का गुरूर था, जिसे देखकर लोगों ने उसे 'राइजिंग स्टार' का नाम दे दिया था.

टाइगर उस्ताद
हर बादशाह की एक मल्लिका होती है, और उस्ताद की जिंदगी में वो जगह 'नूर' की थी. दोनों हमेशा साथ नजर आते थे. उस्ताद इंसानों से बिल्कुल खौफ नहीं खाता था. वो सफारी जीपों के बीच से सीना तानकर अपना शिकार ले जाता था. दुनिया भर से लोग सिर्फ उसकी एक झलक पाने के लिए मीलों का सफर तय करके आते थे.
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अब नूर की कहानी शुरू होती है?
अब बात करते हैं नूर की. रणथंभौर के सुल्तानपुर इलाके में साल 2009 में बाघिन नूर का जन्म होता है. उसकी मां थी ओल्ड सुल्तानपुर फीमेल (T-14) और पिता थे टी-12, जिन्हें घूड़ा मेल के नाम से भी जाना जाता था. राजसी खून तो नूर की रगों में भी दौड़ रहा था. बड़ी होने पर जब नूर अपनी मां से अलग हुई, तो उसने जोन 1, 2 और 6 को अपना इलाका बनाया और वहां एक रानी की तरह राज करने लगी.
रणथम्भौर का पावर कपल
साल 2011 में नूर की जिंदगी में एंट्री होती है रणथम्भौर के सबसे खूंखार और ताकतवर बाघ टी-24 यानी 'उस्ताद' की. उसके नाम से ही पूरा जंगल कांपता था, लेकिन नूर के सामने आते ही मानो एकदम शांत हो जाता था. ये दोनों रणथम्भौर के 'परफेक्ट कपल' बन गए. कोई भी दूसरा बाघ उस्ताद के इलाके में घुसने की हिम्मत नहीं कर सकता था. नूर अक्सर अपना शिकार उस्ताद के साथ खुशी-खुशी बांटती थी.
इन दोनों के इस अटूट प्यार ने रणथम्भौर को एक नायाब तोहफा दिया, इनके बेटे 'सुल्तान' (T-72) के रूप में. सुल्तान बिल्कुल अपने पिता की तरह निडर और देखने में किसी राजकुमार जैसा लगता था. ये वो सुनहरा दौर था, जब रणथम्बौर आने वाला हर सैलानी बस इसी शाही परिवार की एक झलक पाने को बेताब रहता था.
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उस्ताद को मिली उम्रकैद
लेकिन उस्ताद और नूर के प्यार को नजर लग गई थी. उस्ताद पर आरोप लगा कि उसने चार इंसानों को अपना शिकार बनाया है और वो आदमखोर हो चुका है. पूरे देश में बहस छिड़ गई. कुछ लोग उस्ताद के समर्थन में थे, तो कुछ उसके खिलाफ. मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, लेकिन उस्ताद हार गया. साल 2015 में रणथम्भौर के इस शहंशाह को हमेशा-हमेशा के लिए उदयपुर के सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क की सलाखों के पीछे भेज दिया गया.
अकेली नूर और गायब हो गया बेटा सुल्तान
उस्ताद के जाने के बाद नूर टूट गई. वो हर रोज जंगल में दर्द भरी आवाजें लगाती, इस उम्मीद में कि शायद उसका प्यार लौट आए. लेकिन नूर को कहां मालूम था कि उस्ताद अब कभी वापस नहीं आएगा. मुसीबतें यहीं खत्म नहीं हुईं. उस्ताद के जाते ही, सुल्तान भी अपनी खुद की टेरिटरी तलाशने निकल पड़ा और ऐसा गायब हुआ कि आज तक उसका कोई सुराग नहीं मिला.
चली गई उस्ताद की गद्दी, आ गया नया किंग
अब नूर बिल्कुल अकेली थी और उसके कंधों पर अपने छोटे शावकों की जिम्मेदारी थी. उस्ताद का सिंहासन खाली था और उस पर नजर थी टी-57 यानी औरंगजेब की. औरंगजेब ने उस्ताद के इलाके पर कब्जा कर लिया. हर किसी को लगा कि बाघों की फितरत के मुताबिक, औरंगजेब अब नूर के बच्चों को मार डालेगा ताकि वो अपनी आगे की पीढ़ी बढ़ा सके.
लेकिन यहां कुदरत ने एक और करिश्मा किया. औरंगजेब ने न सिर्फ नूर को अपनाया, बल्कि उस्ताद के उन बच्चों को भी बाप का प्यार दिया. ये वन्यजीवों के इतिहास की सबसे हैरान कर देने वाली घटनाओं में से एक थी.
प्यार के लिए भाई-भाई में जंग
नूर का जादू कुछ ऐसा था कि औरंगजेब का सगा भाई टी-58 (रॉकी) भी नूर को पाना चाहता था. लेकिन औरंगजेब ने अपने प्यार के लिए अपने ही भाई से बगावत कर ली, उसे युद्ध में हराया और नूर हमेशा के लिए उसी की होकर रह गई. आगे चलकर नूर ने नूरी, सुल्ताना जैसे और भी कई शावकों को जन्म दिया, जिन्होंने इस जंगल की शान को बरकरार रखा.
औरंगजेब की साल 2022 में मौत हो गई. और हमारी नूर भी अब बूढ़ी हो चली है. लेकिन अपनी जिंदगी के आखिरी पड़ाव में भी उसने शावकों को जन्म देकर रणथम्भौर की विरासत को जिंदा रखा है.
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