- मुंबई में 1990 के दशक में अंडरवर्ल्ड ने बॉलीवुड को निशाना बनाया था और पुलिस ने उस खौफ को खत्म किया था
- प्रदीप सावंत ने बताया कि 1980 से मुंबई में शूटआउट शुरू हुए और 1995 से गैंग्स ने वसूली का काम शुरू किया था
- गैंगस्टरों का मुख्य उद्देश्य पैसा कमाना था, धर्म के आधार पर लड़ाई की बात सही नहीं मानी जाती है
बॉलीवुड फिर चर्चा में है. साथ में अंडरवर्ल्ड भी. संडे को ही टाइगर श्रॉफ पर लॉरेंस बिश्नोई गैंग के गुर्गों ने जानलेवा हमला किया. इसमें टाइगर तो बच गए पर उनके एक ड्राइवर घायल हो गए हैं. ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या मुंबई में एक बार फिर से गैंग एक्टिव हो गए हैं और क्या फिर से 90 के दशक वाली स्थिति होने वाली है, जिसमें कई गैंग ऑपरेट हो रहे थे और बॉलीवुड उनके निशाने पर था?
साल 1999 में एक फिल्म 'सरफरोश' रिलीज हुई थी. हीरो आमिर खान थे. उनका एसीपी राठौड़ का किरदार काफी चर्चित हुआ था. यह किरदार एक असल जिंदगी के एसीपी प्रदीप सावंत से प्रेरित था. सावंत अब डीसीपी पद से रिटायर हो चुके हैं. 1990 के दशक में जब अंडरवर्ल्ड ने बॉलीवुड को खौफजदा कर रखा था और कई फिल्मी हस्तियां जब गैंगस्टरों की गोलियों का शिकार हो रही थीं, तब मुंबई क्राइम ब्रांच के डीसीपी प्रदीप सावंत की टीम ने ही अंडरवर्ल्ड के उस खौफ को खत्म किया था. सावंत उस समय प्रदीप शर्मा, दया नायक, विजय सालसकर जैसे एनकाउंटर स्पेशलिस्ट पुलिस अधिकारियों के बॉस हुआ करते थे. 90 का वो दौर बॉलीवुड के लिए कितना डरावना था और मुंबई पुलिस के लिए वह कितनी बड़ी चुनौती थी इस बारे में प्रदीप सावंत ने एनडीटीवी के एक्जीक्यूटिव एडिटर जीतेंद्र दीक्षित से बातचीत की.
मुंबई में शूटआउट कब शुरू हुआ था
प्रदीप सावंत ने बताया कि शूटआउट 1980 से ही शूरू हुआ था. मगर, गैंग्स के पास 1992 से इंपोर्टेड वेपन्स ज्यादा आने शुरू हो गए. फिर उन्होंने 1995 से एक्सटोर्शन यानी वसूली करना शुरू किया. दाऊद, छोटा राजन, गवली, अबू सलेम ने पहले अपने-अपने इलाकों के लोगों को भर्ती किया. इनके जरिए मुंबई पर राज करने की कोशिश की, मगर जब पुलिस ने महाराष्ट्र के शूटरों को मारना शुरू किया तब वो यूपी से शूटर लाने लगे. इन सभी गैंग्स का मुख्य मकसद पैसा कमाना था. क्योंकि ये बेहद कमजोर घरों से निकले हुए लोग थे. इनका मकसद किसी भी तरह पैसा कमाना था. जल्द से जल्द पैसा कमाना.

छोटा राजन और दाऊद क्या धर्म के आधार पर लड़ रहे थे
रिटायर्ड डीसीपी कहते हैं कि कौन क्या कहता है और वो क्या सोचकर हत्याएं कर रहा था, इसे हमें सच मानकर नहीं चलना चाहिए. इन सभी का मकसद सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाना था. खुद के पैसे से तो ये कुछ कर नहीं रहे थे. वो जो पैसा आ रहा था, उसी के लिए ये हत्याएं करा रहे थे. इन लोगों ने जो हत्याएं करवाईं, उसका ऑर्डर देते समय उनके दिमाग में क्या चल रहा था, ये सिर्फ वो जानते हैं. बाद में कोई कुछ भी बोले तो उसका कोई मतलब नहीं है.
खबरी कौन होते थे
प्रदीप सावंत ने बताया कि खबरी कई कारण से लोग बनते हैं. कुछ पैसे कमाने के लिए ये काम करते हैं. घर चलाने के लिए या शौक के लिए. कुछ आपसी झगड़ों की वजह से खबरी बनते थे. गैंग्स में भी जलन के कारण लोग खबरी बनते थे. यहां तक की गैंग चलाने वालों के परिवार के लोग भी खबरी होते थे. दूसरे गैंग वाले भी दूसरे गैंग की खबरें देते थे. ऐसे-ऐसे लोग खबरी बनते थे, जिनके बारे में सोचा तक नहीं जा सकता.
जब जज ने छोटा शकील से मांगी मदद
रिटायर्ड डीसीपी ने एक जज का किस्सा बताया. उन्होंने कहा कि माटूंगा के रहने वाले एक जज ने छोटा शकील से मदद मांगी थी. उनका पैसा अटका था किसी के पास. फिर किसी वकील ने छोटा शकील से उनकी बात करा दी. फिर छोटा शकील ने उनका काम किया और फिर उस जज से मदद लेनी शुरू कर दी. लियाकत अली शेख नाम के उस वकील का फोन टैपिंग पर हम कर रहे थे तो उसी में हमें इस जज के बारे में पता चला. उस वकील की भी बाद में छोटा शकील ने हत्या करा दी थी.

भरत शाह क्यों गिरफ्तार हुए थे
प्रदीप सावंत ने बताया कि एक प्रोड्यूसर को छोटा शकील की तरफ से धमकी आई थी. उसने प्रोड्यूसर से 5 करोड़ रुपये मांगे थे. नाजिम रिजवी नाम का एक प्रोड्यूसर पहली बार किसी फिल्म को प्रोड्यूस कर रहा था. ये फिल्म थी सलमान खान की फिल्म चोरी चोरी चुपके चुपके. इस फिल्म के लिए शकील एक्टर-एक्ट्रेसेस-डायरेक्टर को फोन कर के कहता था कि जल्दी करो इस फिल्म को पूरा.क्योंकि वही फिल्म को फाइनेंस कर रहा था. फिल्म जल्दी बनती तो ज्यादा मुनाफा होता.रिजवी को आगे करके शकील ये फिल्म बनवा रहा था.रिजवी का फोन ये शिकायतें मिलने के बाद हमने टैपिंग पर लगाया तो एक दिन अचानक फाइनेंसर भरत शाह ने शकील से बात की. इसमें वो एक प्रोड्यूसर की बात शकील से कर रहे थे. यही उनपर केस भी था कि वो गैंग को पैसे दिलवा रहे थे.
क्या अंडरवर्ल्ड फिर लौटा
टाइगर श्रॉफ सहित बॉलीवड सितारों पर हो रहे हमलों पर प्रदीप सावंत ने कहा कि एक-दो गोली चलने से क्या होना वाला है. इससे ये शहर डरने वाला नहीं है. इस शहर ने शूटआउट देखे हैं. ब्लास्ट देखे हैं. मुझे लगता नहीं कि इसका कुछ ज्यादा असर हो जाएगा. वो केवल कोशिश करेंगे. इस शहर में सक्सेस पाने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है.
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