- आयतुल्लाह खामेनेई की मौत को शिया समुदाय ने हजरत अली की शहादत के समान गंभीर घटना माना है जो रमजान महीने में हुई
- मौलाना कल्बे रूशेद रिज़वी ने बताया कि खामेनेई ने मौत को गले लगाया और अपने लोगों के साथ रहने का संकल्प जताया था
- शिया मुस्लिमों के लिए खामेनी का निधन एक बड़ा नुकसान है क्योंकि शहादत उनकी धार्मिक पहचान और इतिहास का हिस्सा है
ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह खामेनेई का जाना पूरी दुनिया में शिया समुदाय के लिए शोक का विषय है. NDTV संवाददाता अली अब्बास नकवी ने भारतीय उलेमा संसद के अध्यक्ष मौलाना कल्बे रूशेद रिज़वी से इस मसले पर बातचीत की. पढ़िए इस इंटरव्यू के ख़ास हिस्से-
NDTV - अयातुल्लाह ख़ामेनई का जाना कितना बड़ा सदमा है आपके लिए ?
मौलाना कल्बे रूशेद -शिया मुस्लिमों के लिए अल्लाह और पैगम्बर साहब के बाद सबसे पहले हजरत अली ही है जिन्हें वो अपना पहला इमाम मानते हैं.. मोहममद साहब के दामाद हजरत अली ही थे, इनकी शहादत भी रमजान महीने में ही हुई थी, जैसे ही हजरत अली 19 रमजान के दिन सुबह की नमाज पढ़ने इराक की मस्जिद ए क़ूफ़ा में गए तभी नमाज पढ़ने के दौरान ही इब्ने मुलजिम नाम के शख्स ने हजरत अली पर जहर बुझी हुई तलवार सर पर मार दी, दो दिन बाद उनकी शहादत रमजान के महीने में ही हो गई. इसी तरह से 86 साल के अयातुल्लाह खामेनेई की 10 रमजान की सुबह पीछे से हमला करके शहीद कर दिया गया. इसी कारण इसे हजरत अली की शहादत की तरह देखा जा रहा है, जालिम हमेशा पीछे से और रमजान के वक्त में हमला करता है.
NDTV - बातचीत के बीच हमले को कैसे देखते हैं?
कल्बे रूशेद रिज़वी - ये सब लोग झूठे हैं, मक्कार हैं. 12 दिन की जंग से पहले भी इसी तरह दोनों तरफ से बातें करने का ढोंग किया गया. लेकिन उसके बाद भी इन्होंने ईरान पर अटैक कर दिया, यहां दो फाइल है. ये अमेरिका-इजरायल epstine फाइल वाले लोग हैं, जो दूसरों पर सिर्फ जुल्म करते हैं, लेकिन आयतुल्लाह खामेनेई रहीम फाइल वाले थे. उन्होंने दिखा दिया कि वो बंकर में छिपने वालों में से नहीं है, वो अली के शेर हैं, उन्होंने मौत को सीधे गले लगाया और उन्होंने साफ कह दिया था कि मैं 90 मिलियन लोगों को छोड़कर कहीं नहीं जा सकता, मैं उन्हीं के साथ हूं
NDTV - शियाओं के लिए खामनेई का जाना कितना बड़ा नुकसान है?
कल्बे रूशेद रिज़वी - शिया मुस्लिम शहादत पर फक्र महसूस करते हैं, तभी 1400 साल से लेकर आज तक चाहे ईरान में अटैक हो या पाकिस्तान समेत दूसरे मुल्कों में, शिया मस्जिदों में अटैक हो, हमेशा ही शियाओं को टारगेट किया जाता है,1400 साल पहले जहां हजरत अली और फिर उनके बेटे हजरत हसन और हजरत हुसैन जिनकी शहादत इराक के कर्बला में 72 साथियों के साथ हुई हो. साथ ही उनकी नस्ल से इमाम जैनुल आब्दीन, इमाम मोहम्मद बाकीर, इमाम जाफर ए सादिक, इमाम मूसा काजिम, इमाम अली रज़ा, इमाम मोहम्मद तकी, इमाम अली नकी और इमाम हसन असकरी, ये सभी शियाओं के 11 इमाम हैं, जो अब तक शहीद हो चुके हैं और 12वें इमाम मेहदी का शिया लोग अभी इंतजार कर रहे हैं कि वो अभी ग़ैबत में हैं, वो जल्द आएंगे और पूरी दुनिया में शांति लेकर आयेंगे. शिया लोग हजरत अली के चाहने वाले होते हैं , वो इस्लाम के वही रूप पर चलते हैं जो मोहम्मद साहब ने सिखाया, जिसमें हक के साथ खड़े रहना, जालिम के खिलाफ खड़े होना, मजलूम के साथ रहना समेत इंसानियत का रास्ता बताया जाता है.. वहीं चाहे ISIS समेत आतंकी संगठन हमेशा शिया के खिलाफ रहे हैं और ये दुश्मनी 1400 साल से हजरत अली से मोहब्बत करने का सिला शियाओं को मिलता आया है.
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