- भारत ने 2020 में ग्लेशियोलॉजी केंद्र बंद कर हिमालय के ग्लेशियर अध्ययन की संस्थागत क्षमता घटाई है.
- हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों का आकार तेजी से बढ़ रहा है जो भूस्खलन और आपदाओं के खतरे को बढ़ाता है.
- ISRO के अनुसार, भारत में हिमालय के 130 ग्लेशियल झीलें तेजी से बढ़ रही हैं, जिनका असर नदी घाटियों पर पड़ता है.
यह बात तो सोच से परे और यकीन करना मुश्किल है कि जब हिमालय में आपदा का खतरा लगातार बढ़ रहा है, तब भारत ने ग्लेशियर और हिमस्खलन पर शोध करने वाली अपनी अहम संस्थाओं को बंद कर दिया है. ऐसा लगता है कि ग्लेशियर और हिमस्खलन पर होने वाला अध्ययन अब भारत सरकार की प्राथमिकता में रहा ही नहीं है.
हिमालय को अक्सर धरती का 'थर्ड पोल' यानी तीसरा ध्रुव कहा जाता है. यह सिर्फ कहने की बात नहीं है. आर्कटिक और अंटार्कटिका के बाद धरती पर बर्फ और बर्फीले पानी का सबसे बड़ा भंडार हिमालयी क्षेत्र में ही है. कई देशों में फैली यह पर्वत श्रृंखला एशिया की कुछ सबसे बड़ी नदियों को पानी देती है. इन पहाड़ों में बड़ी मात्रा में मीठा पानी जमा है. इसी के नीचे रहने वाले करोड़ों लोग इसपर निर्भर हैं.
लेकिन ऐसे समय में जब जलवायु परिवर्तन की वजह से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, ग्लेशियल झीलों का आकार बढ़ रहा है और पहाड़ों में आपदाएं ज्यादा हो रही हैं. लेकिन भारत ने चुपचाप उन दो संस्थाओं को बंद कर दिया, जिनका काम इन्हीं खतरों को समझना था.
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने 2020 में देहरादून स्थित भारत के इकलौते सेंटर फॉर ग्लेशियोलॉजी को बंद कर दिया. वहीं, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी DRDO ने मनाली स्थित देश की इकलौती समर्पित स्नो एंड एवलॉन्च स्टडी एस्टैब्लिशमेंट यानी SASE को एक नई संस्था में मिला दिया.

स्नो एंड एवलॉन्च स्टडी एस्टैब्लिशमेंट को नई संस्था के साथ विलय कर दिया गया.
नई संस्था का फोकस ज्यादा व्यापक जियोस्पेशल और टेरेन स्टडीज यानी भौगोलिक और पहाड़ी इलाकों के अध्ययन पर है. इससे SASE का मूल और खास मकसद कमजोर हुआ.
इस फैसले ने कुछ परेशान करने वाले सवाल खड़े कर दिए हैं. जिस समय हिमालय में बदलाव और खतरे के संकेत लगातार बढ़ रहे हैं, क्या भारत अपनी क्रायोस्फीयर यानी बर्फीले क्षेत्र से जुड़ी वैज्ञानिक क्षमता को मजबूत करने के बजाय कम कर रहा है?
यह चिंता नेपाल में हाल में हुई भयावह ग्लेशियर से जुड़ी आपदा के बाद और बढ़ गई है. वहां बर्फ, चट्टानों और मलबे का एक विशाल हिस्सा हिमालयी ढलान से नीचे आ गिरा. इसके बाद नीचे के इलाकों में भीषण बाढ़ आई और करीब 1,400 लोगों की जान चली गई. इस घटना ने एक बार फिर दिखाया कि ऊंचाई वाले हिमालयी इलाकों में जलवायु परिवर्तन की वजह से पैदा हो रहे बदलाव कितने खतरनाक हो सकते हैं.
वैज्ञानिक लगातार चेतावनी देते रहे हैं कि बढ़ते तापमान से बर्फबारी के तौर-तरीके बदल रहे हैं, ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, पहाड़ों की ढलानें कमजोर हो रही हैं और ग्लेशियल झीलों की संख्या और आकार बढ़ रहा है. ये बदलाव पूरे हिमालयी क्षेत्र में हो रहे हैं. इसमें भारत भी शामिल है.
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हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं.
चुनौती का पैमाना बहुत बड़ा
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी Geological Survey of India के मुताबिक, भारतीय हिमालय में करीब 9,500 ग्लेशियर हैं. ये जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में फैले हुए हैं. इनकी सही संख्या को लेकर वैज्ञानिक अध्ययन लगातार जारी है, क्योंकि ग्लेशियर लगातार बदलते रहते हैं और जिन इलाकों में ये मौजूद हैं, वहां पहुंचना बेहद मुश्किल है.
सैटेलाइट से मिली तस्वीरों ने इन दूर-दराज के इलाकों को समझने में वैज्ञानिकों की काफी मदद की है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO ने चार दशकों के सैटेलाइट डेटा का अध्ययन किया है और इसमें चिंताजनक तस्वीर सामने आई है.
ISRO ने अप्रैल 2024 में बताया था कि 2016-17 के दौरान 10 हेक्टेयर से बड़े आकार वाली 2,431 ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई थी. इनमें से 676 ग्लेशियल झीलों का आकार 1984 के बाद से काफी बढ़ गया है.

इसरो ने साल दर साल हिमालय में ग्लेशियल झीलों की स्थिति को लेकर सैटेलाइट तस्वीरें जारी की हैं
Photo Credit: ISRO
इन 676 बढ़ती हुई ग्लेशियल झीलों में से 130 भारत में हैं. ये झीलें हिमालय की प्रमुख नदी घाटियों में फैली हुई हैं. इनमें 65 झीलें सिंधु नदी बेसिन, सात गंगा बेसिन और 58 ब्रह्मपुत्र बेसिन में हैं.
इन आंकड़ों को थोड़ा करीब से देखें तो तस्वीर और भी चिंताजनक हो जाती है. ISRO के मुताबिक, इन 676 झीलों में से 601 का आकार पिछले चार दशकों में दोगुने से भी ज्यादा हो चुका है. 10 झीलों का आकार 1.5 से दो गुना के बीच बढ़ा है, जबकि 65 झीलों का आकार करीब 1.5 गुना बढ़ा है.
इनमें से कई झीलें बेहद ऊंचाई वाले इलाकों में हैं. ISRO के अध्ययन के मुताबिक, बढ़ते आकार वाली 314 ग्लेशियल झीलें समुद्र तल से 4,000 से 5,000 मीटर की ऊंचाई पर हैं. वहीं, 296 झीलें 5,000 मीटर से भी ज्यादा ऊंचाई पर स्थित हैं.
ये सिर्फ वैज्ञानिक अध्ययन के आंकड़े नहीं हैं. बढ़ती हुई ग्लेशियल झीलें बड़े खतरे की वजह बन सकती हैं.
सबसे बड़ी चिंता क्या है?
सबसे बड़ी चिंता ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF की है. ऐसा तब होता है जब बर्फ या ढीले मलबे से बने प्राकृतिक बांध अचानक टूट जाते हैं. इसके बाद बड़ी मात्रा में पानी तेजी से नीचे की ओर बहता है. हिमस्खलन, भूस्खलन, भूकंप और तेज बारिश इन प्राकृतिक बांधों के टूटने की वजह बन सकते हैं.
हाल के वर्षों में ऐसी घटनाओं ने अपना खौफनाक असर दिखाया है.
फरवरी 2021 में उत्तराखंड की चमोली आपदा, अक्टूबर 2023 में सिक्किम की दक्षिण ल्होनक झील से आई विनाशकारी GLOF और नेपाल में हाल में हुई त्रासदी इस बात की याद दिलाती हैं कि ऊंचे पहाड़ों से जुड़े खतरे लगातार बढ़ रहे हैं. इन आपदाओं की चपेट में पूरे के पूरे गांव, सड़कें, हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट और दूसरी अहम बुनियादी सुविधाएं आ सकती हैं.

साल 2023 में सिक्किम की तीस्ता नदी में अचानक आई बाढ़
वैज्ञानिकों का कहना है कि ये बदलाव अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि पूरे हिमालय में हो रहे एक बड़े बदलाव का हिस्सा हैं.
देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के पूर्व वैज्ञानिक और दिग्गज ग्लेशियोलॉजिस्ट डॉ. डी.पी. डोभाल ने दशकों तक हिमालय के ग्लेशियरों का अध्ययन किया है. उनका कहना है कि बारिश और बर्फबारी के पैटर्न में बदलाव जलवायु परिवर्तन के सबसे साफ संकेतों में से एक है.
डोभाल के मुताबिक, जिन इलाकों में पहले बर्फ गिरती थी, वहां अब बारिश ज्यादा हो रही है. बर्फबारी की सीमा यानी स्नो लाइन ऊपर खिसक रही है और तेज बारिश की घटनाएं भी ज्यादा हो रही हैं. इन बदलावों का असर ग्लेशियरों, पहाड़ों की ढलानों और ग्लेशियल झीलों की स्थिरता पर पड़ रहा है.
डोभाल ने NDTV से बातचीत में कहा, "जलवायु परिवर्तन की वजह से आजकल ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं. बारिश और बर्फबारी के पैटर्न में बदलाव आया है."
उन्होंने बताया कि अब उन ऊंचाइयों पर भी बारिश देखी जा रही है, जहां पहले बर्फबारी होने की उम्मीद रहती थी. इससे बर्फ तेजी से पिघल रही है और पहाड़ों के ऊंचे इलाकों में अस्थिरता बढ़ रही है.
विडंबना यह है कि जहां वैज्ञानिक चिंता लगातार बढ़ रही है, वहीं इस क्षेत्र में काम करने वाली संस्थागत क्षमता कमजोर हुई है.
भारत ने 2009 में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के तहत सेंटर फॉर ग्लेशियोलॉजी की स्थापना की थी. देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी को इसका नोडल संस्थान बनाया गया था. इसका मकसद बड़ा था. इस सेंटर को हिमालय में ग्लेशियरों पर होने वाले शोध को एक साथ जोड़ने और उसे आगे बढ़ाने का केंद्र बनना था. बाद में इसे ग्लेशियोलॉजी के लिए एक पूरी तरह विकसित राष्ट्रीय संस्थान में बदलने की भी योजना थी.
इस पहल का मकसद एक बड़ी वैज्ञानिक कमी को दूर करना था. हिमालय के ग्लेशियर पानी की सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और जलवायु अध्ययन के लिए बेहद अहम हैं. इसके बावजूद भारत में ग्लेशियरों पर खास तौर पर ध्यान देने वाला कोई समर्पित शीर्ष संस्थान नहीं था.
इस सेंटर ने अहम बेसलाइन डेटा तैयार करने और शोधकर्ताओं की नई पीढ़ी को तैयार करने में मदद की.
डोभाल के मुताबिक, इस कार्यक्रम के तहत 20 से ज्यादा लोगों को प्रशिक्षण दिया गया और करीब 10 शोधकर्ताओं ने पीएचडी की. लंबे समय तक निगरानी के लिए कई महत्वपूर्ण ग्लेशियरों को चुना गया. बेहद मुश्किल पहाड़ी इलाकों में वैज्ञानिक उपकरण लगाए गए और ग्लेशियरों के व्यवहार को व्यवस्थित तरीके से समझने की कोशिश शुरू हुई.
लेकिन 2020 में सेंटर फॉर ग्लेशियोलॉजी को बंद कर दिया गया और उसे उसके मूल संस्थान में मिला दिया गया.
डोभाल के मुताबिक, सेंटर को अचानक बंद कर दिया गया. हमें जून 2020 में एक चिट्ठी मिली. प्रोजेक्ट बंद कर दिया गया है और पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर, सब कुछ वाडिया इंस्टीट्यूट के मुख्य काम में मिला दिया गया है.
जब डोभाल से पूछा गया कि क्या उन्हें उस सेंटर की कमी महसूस होती है, तो उनका जवाब साफ था. उन्होंने कहा, "बिल्कुल. यह मेरे लिए बड़ा झटका है."
संयोग से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के नए सचिव डॉ. उमेश वाघमारे ने NDTV से कहा, "ग्लेशियरों पर कोई नया रिसर्च सेंटर शुरू करने की कोई योजना नहीं है."

कहा जाता है कि 2100 ईस्वी आते आते हिमालय के 70 प्रतिशत ग्लेशियर पिघल चुके होंगे.
कहानी यहीं खत्म नहीं होती.
भारत की स्नो एंड एवलॉन्च स्टडी एस्टैब्लिशमेंट यानी SASE एक और ऐसी विशेष संस्था थी, जिसका काम पहाड़ों से जुड़े खतरों पर शोध करना था.
मनाली में 1969 में स्थापित इस संस्था ने बर्फ, हिमस्खलन और ऊंचाई वाले इलाकों के खतरों पर अहम शोध किया. मुश्किल और बेहद ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात भारतीय सेना के लिए भी इस संस्था की भूमिका अहम थी. खास तौर पर सियाचिन जैसे इलाकों में यह हिमस्खलन की भविष्यवाणी और सुरक्षा से जुड़ी जानकारी देती थी.
नवंबर 2020 में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी DRDO ने SASE का विलय डिफेंस टेरेन रिसर्च लेबोरेटरी के साथ कर दिया. इसके बाद नई संस्था का नाम डिफेंस जियोइन्फॉर्मेटिक्स रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट रखा गया, जिसका मुख्यालय चंडीगढ़ में है.
यह फैसला ऐसे समय में हुआ जब भारत सियाचिन ग्लेशियर पर करीब 5,000 मीटर की ऊंचाई पर पाकिस्तान के साथ दुनिया की सबसे ऊंचाई वाली जंग लड़ रहा है. यहां दुश्मन की गोलियों से ज्यादा जवानों की जान फ्रॉस्टबाइट यानी शरीर के हिस्सों के जम जाने और बर्फ से जुड़ी चोटों की वजह से गई है.
खतरे बढ़ रहे हैं तो हिमालयी संस्थाओं पर ध्यान कम क्यों?
कई वैज्ञानिकों के लिए इन संस्थाओं का बंद होना एक परेशान करने वाला सवाल खड़ा करता है. जब हिमालय से जुड़े खतरे बढ़ रहे हैं, तब विशेष संस्थाओं पर ध्यान क्यों कम किया जा रहा है?
डोभाल का मानना है कि क्षमता कम करने के बजाय इसे बढ़ाने की जरूरत है. उन्होंने कहा, "बिल्कुल, एक राष्ट्रीय केंद्र होना चाहिए. पूरा इलाका बेहद अहम है."
उनका कहना है कि हिमालय को समझने के लिए कई अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों को साथ आना होगा. इनमें जलवायु विज्ञान, भूविज्ञान, भूभौतिकी, जल विज्ञान, रसायन विज्ञान, रिमोट सेंसिंग और सामाजिक विज्ञान शामिल हैं. उन्होंने कहा, "ग्लेशियल साइंस सभी विज्ञानों का मेल है."
डोभाल हिमालयी देशों के बीच ज्यादा अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भी जरूरत बताते हैं. ग्लेशियर देशों की सीमाओं को नहीं पहचानते. नदियां, आपदाएं और जलवायु परिवर्तन के असर भी किसी सीमा में बंधे नहीं हैं.
आज के समय में उनकी यह चेतावनी खास तौर पर अहम है. नेपाल में हाल की आपदा ने एक बार फिर दिखा दिया है कि 7,000 मीटर की ऊंचाई पर होने वाली घटना सिर्फ 7,000 मीटर तक सीमित नहीं रहती. बर्फ के बड़े हिस्से का गिरना, हिमस्खलन और ग्लेशियल झीलों का टूटना तेजी से नीचे की ओर बढ़ सकता है और कई किलोमीटर दूर रहने वाले लोगों और समुदायों को भी अपनी चपेट में ले सकता है.

सिक्किम में GLOF से आई तबाही के बाद की तस्वीर
Photo Credit: PIB
आखिरकार अरबों लोग हिमालय की बर्फ और बर्फ से निकलने वाले पानी पर निर्भर हैं. लेकिन इसी के साथ वे तेजी से बदलते क्रायोस्फीयर यानी हिम और बर्फ से बने इस प्राकृतिक तंत्र से पैदा होने वाले खतरों के भी ज्यादा करीब आ रहे हैं.
हिमालय भारत के सबसे बड़े प्राकृतिक मीठे पानी के टावर बने हुए हैं. लेकिन इसके साथ ही वे भारत की सबसे बड़ी जलवायु संबंधी कमजोरियों में से एक भी बनते जा रहे हैं.
जैसे-जैसे सैटेलाइट तस्वीरों में ग्लेशियल झीलों का बढ़ता आकार, पीछे हटते ग्लेशियर और ऊंचे पहाड़ी इलाकों में बढ़ती अस्थिरता सामने आ रही है, कई वैज्ञानिकों का मानना है कि समय की जरूरत कम विशेष संस्थाएं नहीं, बल्कि और ज्यादा मजबूत संस्थाएं हैं.
दुनिया का थर्ड पोल हमारी आंखों के सामने बदल रहा है. सवाल यह है कि क्या भारत के पास इन बदलावों की रफ्तार के साथ कदम मिलाने के लिए जरूरी वैज्ञानिक ढांचा मौजूद है या फिर अगली आपदा के आने से पहले हमें इसका जवाब ढूंढना होगा?
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