- केदारनाथ त्रासदी में भारी बारिश और चोराबारी झील टूटने से हिमालयी क्षेत्र में भयंकर सैलाब आया था
- ग्लेशियर के पीछे छोड़े गए मोरेन मलबे में चट्टानें और मिट्टी होती हैं, जो आपदाओं में बड़ी तबाही कर सकती हैं
- इसरो के अनुसार हिमालय में बड़ी और तेजी से बढ़ रही 676 ग्लेशियल झीलों की निगरानी सैटेलाइट से की जा रही है
2013 की केदारनाथ त्रासदी भला कौन भूल सकता है. भारी बारिश और केदारनाथ घाटी के पीछे चोराबारी झील के टूटने से इस उच्च हिमालयी इलाके में ऐसा सैलाब आया, जो अपने साथ भारी मात्रा में गाद और बड़ी चट्टानें लेकर उतरा. उन चट्टानों ने कुछ ही घंटों में केदारनाथ के भूगोल को बदल दिया. बड़ी-बड़ी इमारतें मलबे में दब गईं. इस मलबे (मोरेन या हिमोढ़ यानी पत्थरों, बजरी, मिट्टी से भरा मलबा) से जुड़ी एक बड़ी चट्टान सुयोग से केदारनाथ मंदिर के ठीक पीछे रुक गई और उसने मंदिर पर पड़ सकने वाली पानी और मलबे की ताकत को काफी हद तक रोक दिया, लेकिन मंदिर के आसपास और निचले इलाकों में उस मलबे की ताकत ने रामबाड़ा को नक्शे से मिटा दिया और गौरीकुंड में भारी तबाही मचाई. साथ ही आगे सोनप्रयाग और सीतापुर आते-आते नदी का तल कई मीटर ऊंचा उठा दिया.
दरअसल तेजी से पिघल रहे हिमालय के ग्लेशियर जब पीछे हटते हैं, तो भारी मलबा पीछे छोड़ते जाते हैं, उसे ही मोरेंस यानी हिमोढ़ कहते हैं. ग्लेशियर पिघल जाने के कारण इस मलबे पर बर्फ़ की कोई पकड़ नहीं रहती और वो ऐसे ही ऊंचे हिमालय में ग्लेशियरों के मुहाने पर कई किलोमीटर आगे तक बिखरा पड़ा रहता है. इसमें बारीक मिट्टी से लेकर बड़ी-बड़ी चट्टानें तक होती हैं, जो अतिवृष्टि, बड़े हिमस्खलन या भारी भूस्खलन जैसी किसी आपदा में नीचे आने को तैयार रहती हैं और तबाही मचाती हैं.

सवाल है कि GLOF की ऐसी घटनाओं का खतरा कितना बड़ा है और क्या इसका पहले से पता लगाया जा सकता है. तो जवाब है कि खतरा भी बड़ा है और इसका पहले से पता भी लगाया जा सकता है. अकेले सिक्किम हिमालय में ही 300 से ज़्यादा ऐसी ग्लेशियल लेक हैं, जिनमें से 10 को लेकर आशंका जताई जा चुकी है कि वो कभी भी फट सकती हैं.

इन्हीं में से एक थी दक्षिण ल्होनक झील जो बीते कई दशक से पिघल रहे ल्होनक ग्लेशियर के पीछे हटने के बाद बढ़ती जा रही थी. भूवैज्ञानिकों के कई रिसर्च पेपर्स में ये बात सामने आ चुकी थी कि बीते पांच दशक में यहां ग्लेशियर क़रीब दो किलोमीटर पीछे खिसक चुका है और उसके द्वारा छोड़ी गई जगह पर एक झील लगातार बड़ी हो रही थी. इन विशेषज्ञों ने अपनी रिपोर्ट में इस झील के फटने की चेतावनी भी दी थी, जो दुर्भाग्य से अक्टूबर 2023 में सच साबित हो गई.

राहत देने वाली बात ये है कि पूरे हिमालय में ग्लेशियरों के पीछे हटने से बनी झीलों का हमें अब सैटेलाइट की तस्वीरों से ठीकठाक अंदाज़ा हो गया है और सैटेलाइट रिमोट सेंसिंग के ज़रिए उनमें पानी के स्तर की अब निगरानी भी की जा रही है.
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो के 1984 से 2023 तक के डेटा के मुताबिक, पूरे हिमालय में 2431 झीलें ऐसी हैं जो 10 हेक्टेयर से ज़्यादा बड़ी हैं. इनमें 676 झीलें ऐसी हैं जो 1984 के बाद काफ़ी तेज़ी से बढ़ी हैं. इनमें 130 झीलें भारतीय हिमालयी इलाकों में हैं. 65 झीलें सिंधु नदी, 7 झीलें गंगा और 58 झीलें ब्रह्मपुत्र नदी के बेसिन में हैं. 10 हेक्टेयर से बड़ी 676 झीलो में से 601 झीलें दोगुने से ज़्यादा बड़ी हो गई हैं. 10 झीलें डेढ़ से दो गुना तक बड़ी हो गई हैं और 65 झीलें डेढ़ गुना तक बड़ी हो चुकी है.

अगर ऊंचाई के आधार पर देखें तो 10 हेक्टेयर से बड़ी 676 झीलों में से 314 झीलें 4000 मीटर से 5000 मीटर तक की ऊंचाई पर हैं और 296 झीलें 5000 मीटर से भी ज़्यादा ऊंचाई पर हैं. इन झीलों को इनके निर्माण के आधार पर चार वर्गों में बांटा जा सकता है.
- पहला, ऐसी झीलें जिन्हें मोरेन यानी हिमोढ़ ने बांध की तरह रोका हुआ है और सबसे अधिक 307 झीलें ऐसी ही हैं.
- दूसरा Erosion यानी अपरदन द्वारा बनी झीलें, इन झीलों में मिट्टी के कटाव से बनी गहराई में पानी ठहरा हुआ होता है. हिमालय में 265 ग्लेशियल झीलें ऐसी ही हैं.
- तीसरा बर्फ़ द्वारा बांधी गई झीलें जो आठ हैं.
- इसके अलावा अन्य कारणों से बनी ग्लेशियल झीलों की संख्या 96 है.

ख़ास बात ये है कि ग्लेशियरों में बनी और बड़ी हो रही इन झीलों की निगरानी के लिए सिर्फ़ रिमोट सेंसिंग के भरोसे नहीं बैठा जा सकता. इसके लिए इन झीलों तक पहुंचकर ये देखना ज़रूरी है कि उनके कुदरती बांध कितने मज़बूत हैं, उन पर दबाव कितना बढ़ा है और बीते कुछ वर्षों में झीलों के बढ़ने की रफ़्तार कितनी तेज़ हुई है. इन झीलों तक पहुंचना एक दुष्कर काम है. लेकिन सिक्किम की साउथ ल्होनक झील से हुई त्रासदी के बाद केंद्र सरकार और हिमालयी राज्यों की सरकारें अब इन झीलों तक पहुंचकर उनका अध्ययन कर रही हैं.
केंद्रीय जल आयोग ने 2025 तक 2500 ग्लेशियरों की निगरानी का लक्ष्य रखा था . इसके अलावा इन इलाकों में Early warning systems लगाए जा रहे हैं, जो ग्लेशियर या उसकी झील टूटने से होने वाली आपदाओं से सही समय पर आगाह कर सकें.
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