विज्ञापन

नेपाल की त्रासदी तो एक शुरुआत है, 7000 मीटर की ऊंचाई पर पिघलते जा रहे ग्लेशियर; एक्सपर्ट ने डराया

एल्टन वायर्स ने बताया कि पर्माफ्रॉस्ट एक क्रायोस्फीयर ग्लू होता है, आम बोलचाल में इसे बर्फ़ीले इलाकों को जोड़ने वाला गोंद कह सकते हैं. जिसने हजारों सालों से इन बर्फीले चोटियों को एक साथ जोड़े रखा था. लेकिन यह कमजोर हो रहा है.

नेपाल की त्रासदी तो एक शुरुआत है, 7000 मीटर की ऊंचाई पर पिघलते जा रहे ग्लेशियर; एक्सपर्ट ने डराया
नेपाल त्रासदी पर बात करते हुए अमेरिकी वैज्ञानिक एल्टन वायर्स ने ग्लेशियर पिघलने की दिशा में बड़ी चेतावनी दी है.
NDTV

हिमालय में ग्लेशियर ढहने से बाद आई भीषण बाढ़ से नेपाल में जो तबाही मची, उससे हुए नुकसान का सटीक आकलन करना अभी भी मुश्किल है. इस त्रासदी से नेपाल के साथ-साथ चीन और तिब्बत को भी भारी नुकसान पहुंचाया है. भारत सहित दुनिया के 30 से ज्यादा देशों के हजारों लोग इस त्रासदी की जद में आए. नेपाल में मृतकों की संख्या बढ़ते हुए 734 पहुंच चुकी है. अभी भी लापता लोगों की संख्या 2500 है. इस बीच हिमालय की चोटियों पर मौजूद ग्लेशियर की कई सालों से स्टडी कर रहे अमेरिकी रिसर्च साइंटिस्ट एल्टन वायर्स (Alton Byers)  ने ऐसी प्राकृतिक आपदाओं के खतरों को लेकर फिर आगाह किया है. एल्टन वायर्स ने 2015 के भूकंप के बाद नेपाल में तीन ग्लेशियर झीलों पर फील्ड स्टडी की थी. ग्लेशियर स्टडी के क्षेत्र में वायर्स का काम दुनिया भर में बड़ा प्रमाणिक माना जाता है. नेपाल में आज जो हालात है, उसकी चेतावनी उन्होंने दो साल पहले ही दे दी थी. 

Latest and Breaking News on NDTV

2012 से हिमालय की चोटियों पर मौजूद ग्लेशियर की स्टडी कर रहे एल्टन वायर्स

अब अलजरीरा से बातचीत में अमेरिकी रिसर्च साइंटिस्ट एल्टन वायर्स ने इस गंभीर स्थिति के कारण, आगे के खतरे सहित अन्य मुद्दों पर अहम राय दी है. एल्टन वायर्स अमेरिका के कोलोराडो बोल्डर यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कटिक एंड अल्पाइन रिसर्च में फैकल्टी रिसर्च साइंटिस्ट हैं. एल्टन वायर्स ने कहा कि मैं 2012 से ऐसी घटनाओं पर नजर रख रहा हूं. पोखरा के सेती बाढ़ में भी लगभग ऐसी ही तबाही मची थी. तब से ऐसी लगभग दर्जन भर घटनाएं और हो चुकी हैं.

वायर्स ने नेपाल त्रासदी की वजह पर्माफ्रॉस्ट में बदलाव को बताया

अलजजीरा से हुई बातचीत में उन्होंने बताया कि वह जल्द ही नेपाल की स्थिति का जायजा लेने वहां जा रहे हैं. नेपाल में आई बाढ़ की वजह को लेकर एल्टन वायर्स ने कहा, 'मुझे लगता है कि इस तरह की आपदाएं अब और अधिक बढ़ गई हैं. इसका कारण संभवतः पर्माफ्रॉस्ट (permafrost) में बदलाव से जुड़ा है. 'लिटिल आइस एज' के अंत (लगभग 1860) के बाद से दुनिया गर्म हुई है और विशेष रूप से औद्योगिक क्रांति के बाद से हमने वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि देखी है. इस कारण पहाड़ भी गर्म हो गए हैं और यह सबसे पहले ग्लेशियरों के पिघलने, हिमनद झीलों के बनने और हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) के रूप में सामने आया है.

नेपाल बाढ़ पर बात करते अमेरिकी वैज्ञानिक एल्टन वायर्स.

नेपाल बाढ़ पर बात करते अमेरिकी वैज्ञानिक एल्टन वायर्स.

पर्माफ्रॉस्ट क्या होता है? जिसके कमजोर होने से आ रही नेपाल जैसी बाढ़

एल्टन वायर्स ने बताया कि पर्माफ्रॉस्ट एक क्रायोस्फीयर ग्लू होता है, आम बोलचाल में इसे बर्फ़ीले इलाकों को जोड़ने वाला गोंद कह सकते हैं. जिसने हजारों सालों से इन बर्फीले चोटियों को एक साथ जोड़े रखा था. लेकिन यह कमजोर हो रहा है. अब बर्फ और चट्टानों के बड़े-बड़े हिस्से टूटकर गिर रहे हैं. मैंने एम्पायर स्टेट बिल्डिंग के आकार की चट्टानों को टूटकर गिरते देखा है.

उन्होंने आगे कहा कि जब यह गिरता है तो इतनी तेज गति से होने वाले घर्षण से बर्फ़ पिघलती है. यह नीचे जमीन से टकराता है, तूफ़ान जैसी तेज हवाएँ पेड़ों को गिरा देती हैं. यह सब फिर भोटे कोसी नदी में चला गया, नदी का रास्ता रोक दिया और फिर लाखों क्यूबिक मीटर पानी का भयानक बहाव हुआ.

7000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर हो रही हलचल

वायर्स ने चेतावनी देने कहा कि अब 7,000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर मौजूद पर्माफ्रॉस्ट भी प्रभावित हो रहा है. अब उसमें वह मजबूती नहीं रही जो सदियों से विशाल ग्लेशियरों और चट्टानों को थामे रखने में थी. इसलिए अब वे गुरुत्वाकर्षण के प्रति अधिक संवेदनशील हैं, जिसका मतलब है कि आपको एक बड़ा अलगाव देखने को मिलता है, जैसा कि नेपाल में हाल में हुआ. वह मलबा नीचे गिरता है और इसके बाद घटनाओं का एक सिलसिला शुरू हो जाता है, जिसके कारण इस मामले में नीचे की ओर भयानक बाढ़ आई.

Latest and Breaking News on NDTV

नेपाल जैसी आपदाओं की पहले से कैसे दी जाएं चेतावनी?

ग्लेशियर विस्फोट के कारण अभी नेपाल में जो तबाही मची, उसकी आपदा पूर्व चेतावनी को लेकर एल्टन वायर्स ने कहा, हम पूर्वी नेपाल में कंचनजंगा संरक्षण क्षेत्र के साथ काम कर रहे हैं. मूल रूप से हम जिस कार्यक्रम पर काम कर रहे हैं वह बेहतर विज्ञान को सामुदायिक तैयारी योजना (community preparedness plan) के साथ जोड़ता है. इसलिए हम विज्ञान को सुविधाजनक बनाने, ज़रूरी जानकारी जुटाने और स्थानीय लोगों के साथ चर्चा शुरू करने जा रहे हैं कि हमें इसे गंभीरता से लेना शुरू करना होगा. हमें प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों (early warning systems) पर ध्यान देना होगा. हमें जोनिंग (zoning) को देखना होगा—यानी उन क्षेत्रों में निर्माण न करना जो ऐतिहासिक रूप से बाढ़ प्रभावित रहे हैं.

हमें इस पर भी विचार करना होगा कि क्या सेना आकर बढ़ रही झील के जलस्तर को कम करने में मदद कर सकती है? प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों के मामले में मुझे लगता है कि आपका सोचना बिल्कुल सही है, यही भविष्य की दिशा होने जा रही है. दुर्भाग्य से लोगों ने बाढ़ के मैदानी इलाकों में निर्माण किया जिससे भारी तबाही हुई, लेकिन जो इमारतें बची हैं वे वहीं रहेंगी और लोग वहां रहेंगे.

इस प्रकार की बाढ़ को त्रिशूली और प्रभावित अन्य गांवों तक पहुंचने में लगभग एक से डेढ़ घंटे का समय लगता है. यदि आपके पास एक उचित प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली हो, उदाहरण के लिए जापान में होक्काइडो सुनामी मॉडल पर आधारित तरीके, तो यह पर्याप्त समय है. 

यह भी पढ़ें - नेपाल जैसी जलप्रलय भारत में न ला दें उत्तराखंड की ये झीलें? खतरे की पहचान के 2 साल बाद भी नहीं लगे जरूरी उपकरण


 

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Himalayan Glaciers, Himalayan Glaciers Melting, Nepal Flood, Nepal Floods 2026, Nepal Flood Reason
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com