- 2024 लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को भारी नुकसान हुआ, जिससे पार्टी ने अपनी सबसे अहम सीटें गंवाईं
- स्मृति ईरानी को यूपी का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है, जबकि सुनील बंसल को संगठनात्मक जिम्मेदारी दी गई है
- भाजपा ने जाति और समुदाय के संतुलन को ध्यान में रखते हुए यूपी की नई संगठनात्मक टीम का गठन किया है
अगर नामों और पदों की लिस्ट को अलग कर दें, तो बीजेपी की नई संगठनात्मक टीम का एक साफ संदेश है. 2024 लोकसभा चुनाव में यूपी में जो हाल हुआ, वो दोबारा नहीं होने दिया जा सकता. हर अहम नियुक्ति, चाहे वह वापसी हो, प्रमोशन हो या चुपचाप हटाना हो — एक ही राज्य और एक ही याद से जुड़ी है, 2024 की हार. पार्टी को 29 सीटें और अपनी सबसे अहम सीट गंवानी पड़ी थी. जंतर-मंतर पर 'जेन-जी' (Gen Z) के विरोध-प्रदर्शन के बाद, पार्टी अध्यक्ष के तौर पर नितिन नवीन के नेतृत्व के लिए यह पहली असली चुनावी परीक्षा भी है.
मगर एक राज्य का इतना ज्यादा महत्व क्यों है? उत्तर प्रदेश से लोकसभा में 80 सांसद चुनकर आते हैं, जो किसी भी दूसरे राज्य के मुकाबले बहुत ज्यादा है. 2014 से बीजेपी को राष्ट्रीय स्तर पर बहुमत दिलाने में भी इस राज्य की बड़ी भूमिका रही है. संक्षेप में कहें तो, यूपी ही राष्ट्रीय स्तर पर चुनावी गणित तय करता है. और इससे मिलने वाला संकेत साफ है. 2024 में अमेठी में करारी हार के बाद स्मृति ईरानी की वापसी हुई है और उन्हें पार्टी के सबसे बड़े और अहम राज्य उत्तर प्रदेशके लिए राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई है.
उनके साथ सुनील बंसल भी हैं, जिन्हें 2017 में यूपी में बीजेपी की बूथ-स्तर पर जबरदस्त जीत का श्रेय दिया जाता है. उनकी यह वापसी यूपी, पंजाब और उत्तराखंड में होने वाले आगामी चुनावों से पहले हुई है. साथ ही, पार्टी में पीढ़ी और जेंडर के स्तर पर भी बदलाव किए जा रहे हैं. राष्ट्रीय स्तर पर नई टीम में तेरह महिलाएं शामिल हैं और युवाओं तक पहुंचने पर जान-बूझकर जोर दिया जा रहा है. यह कोशिश यूपी के सबसे बड़े और सबसे अस्थिर वोटर समूहों से जुड़ने की है, ताकि विपक्ष के उन पर कब्जा करने से पहले ही उनसे संपर्क साधा जा सके.
यूपी के लिए सोच-समझकर चुने गए ये लोग
यूपी में जिम्मेदारी किसे मिली, इसे ध्यान से देखने पर जाति और समुदाय का गणित साफ समझ आता है. स्मृति ईरानी राष्ट्रीय स्तर की स्टार पावर और अपनी छवि को बेहतर बनाने का अनुभव लेकर आई हैं. सुनील बंसल उस संगठनात्मक मशीनरी को साथ लाए हैं, जिसने कभी राज्य में बड़ी जीत दिलाई थी. बहराइच के मौजूदा सांसद और ब्राह्मण चेहरा हरीश द्विवेदी को महासचिव की जिम्मेदारी दी गई है, ताकि पूर्वी यूपी पर खास ध्यान दिया जा सके. धौरहरा की सांसद रेखा वर्मा नेतृत्व में OBC पहचान और महिला चेहरा, दोनों लेकर आई हैं. और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस-चांसलर तारिक मंसूर, पसमांदा मुस्लिम वोटरों को लुभाने की BJP की धीमी और सोची-समझी कोशिश को आगे बढ़ा रहे हैं.
कुल मिलाकर, यह भारत के सबसे अहम राज्य के लिए बहुत सोच-समझकर तैयार किया गया जातिगत नक्शा है. हरीश द्विवेदी के जरिए ब्राह्मणों तक पहुंचने की कोशिश का मकसद मुख्य रूप से सवर्ण वोट बैंक को मजबूत करना है, खासकर तब जब इस समुदाय के कुछ हिस्सों में दबी-छुपी नाराजगी है. साथ ही, इसका मकसद "चंदा चोरी" वाली उस पुरानी बात का जवाब देना भी है, जिसने आर्थिक गड़बड़ियों के सामने आने के बाद से पार्टी को परेशान कर रखा है. यह समाजवादी पार्टी के PDA फॉर्मूले — पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक — का सीधा जवाब भी है, जिसने 2024 के लोकसभा चुनाव में BJP के गैर-यादव OBC और दलित वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाई है. और मंसूर की लगातार मौजूदगी यह संकेत देती है कि पसमांदा समुदाय तक पहुंचने का प्रयोग — भले ही अब तक उसका फायदा बहुत कम रहा हो — छोड़ा नहीं जा रहा है.
2024 का सबक नजरअंदाज नहीं कर सकती BJP
2024 के लोकसभा नतीजों पर नजर डालें तो साफ पता चलता है कि हालात कितने गंभीर हैं. उत्तर प्रदेश से लोकसभा में 80 सांसद चुनकर आते हैं. 2019 में, अकेले BJP ने इनमें से 62 सीटें जीती थीं. 2024 में यह संख्या घटकर 33 रह गई — यानी 29 सीटों का नुकसान हुआ. सहयोगियों को मिलाकर, राज्य में NDA की कुल सीटें 64 से घटकर 36 रह गईं. समाजवादी पार्टी ने, जो INDIA गठबंधन का हिस्सा होते हुए भी ज्यादातर अपने दम पर चुनाव लड़ी थी, 37 सीटें जीतीं — और इस तरह वह UP की सबसे बड़ी पार्टी बन गई.
वोट शेयर में भी यह गिरावट साफ दिखती है. UP में BJP का वोट शेयर 2019 में लगभग 50 प्रतिशत से गिरकर 2024 में करीब 41 प्रतिशत हो गया, जबकि समाजवादी पार्टी का वोट शेयर 18 प्रतिशत से बढ़कर 34 प्रतिशत हो गया — यानी नौ पॉइंट का बदलाव, जिसने BJP के मजबूत गढ़ को एक कड़े मुकाबले में बदल दिया. यह गिरावट सिर्फ पार्टी की कमजोर सीटों तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि वाराणसी जैसी उसकी सबसे मजबूत सीटों तक भी पहुंच गई.
क्षेत्रवार आंकड़े और भी अहम जानकारी देते हैं. पूर्वी UP के 26 सीटों वाले इलाके पूर्वांचल में, BJP ने सिर्फ 10 सीटें जीतीं — जो 2019 के मुकाबले आठ कम थीं. अवध क्षेत्र में पार्टी को प्रतीकात्मक रूप से सबसे बड़ा नुकसान उठाना पड़ा: फैजाबाद, वह निर्वाचन क्षेत्र जिसमें अयोध्या और राम मंदिर शामिल हैं, वहां समाजवादी पार्टी से 48,000 से ज्यादा वोटों के अंतर से हार का सामना करना पड़ा. जिस मंदिर को राज्य में BJP की सबसे बड़ी चुनावी ताकत माना जा रहा था, वही उसकी सबसे चर्चित हार का केंद्र बन गया. ऐसा लगता है कि इन्हीं नतीजों ने इस फेरबदल की सोच को आकार दिया है. UP की नई टीम सिर्फ मंदिर के प्रतीकों पर निर्भर नहीं है. वह आस्था की राजनीति को जाति-आधारित जमीनी पहुंच और बूथ-स्तर पर संगठन को मजबूत करने की उस कार्यशैली के साथ जोड़ रही है, जिसके लिए बंसल जाने जाते हैं.
नवीन की परीक्षा
बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन के लिए, इन सभी बातों का नतीजा एक बहुत अहम चुनौती के तौर पर सामने आता है. राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर यह उनका पहला बड़ा संगठनात्मक फैसला है. यह फैसला ऐसे राज्य में लिया गया है जहां पिछले राष्ट्रीय चुनाव में बीजेपी के जातियों और समुदायों के गठबंधन में दरारें साफ दिखी थीं. चुनाव में 18 महीने बाकी हैं और टीम तैयार हो चुकी है. देखने वाली असली बात यह होगी कि क्या वे संगठन की मंशा को जमीनी स्तर पर वोटों में बदल पाते हैं या नहीं — खासकर पूर्वांचल और अवध में, जो वे दो इलाके हैं जहां 2024 में बीजेपी को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ था.
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